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जिस पत्थर को पवित्र मानकर पूज रहे थे MP के आदिवासी, वह निकला डायनासोर के युग का दुर्लभ कोरल जीवाश्म

Published: Mon, 10 Aug 2026 09:59 AM (IST)

मध्य प्रदेश के डिंडोरी में बैगा जनजाति जिस पत्थर को पवित्र मानकर पूज रही थी, वह 6.5 करोड़ साल पुराना डायनासोर युग का दुर्लभ कोरल जीवाश्म निकला।

एमपी में मिला दुर्लभ कोरल जीवाश्म।

एमपी में मिला दुर्लभ कोरल जीवाश्म।

डिजिटल डेस्क, भोपाल। मध्य प्रदेश में बैगा जनजाति के लोग सदियों से एक पत्थर की रक्षा करते आ रहे थे क्योंकि वे उसे पवित्र मानते थे। अब विज्ञान ने पता लगाया है कि वह पत्थर इतना खास क्यों था। यह जंगल में बने एक मंदिर में सुरक्षित रखा 6.5 करोड़ साल पुराना राज था।

यह एक ऐसी दुनिया की निशानी है जो अब खत्म हो चुकी है। उत्तरी अमेरिका में टी-रेक्स का राज था और भारत के ज्वालामुखी वाले मैदानों में राजासॉरस नर्मदेन्सिस (Rajasaurus narmadensis) घूमते थे।

घने जंगलों में मिला कोरल जीवाश्म

मध्य प्रदेश के पुरातत्व, अभिलेखागार और संग्रहालय निदेशालय ने हाल ही में डिंडोरी जिले के घने जंगलों में मंदिर जैसी दिखने वाली एक अजीब संरचना की पहचान की है। यह डायनासोर के दौर के आखिर की एक दुर्लभ कोरल (मूंगा) जीवाश्म संरचना है।

डिंडोरी की कम खोजी गई भू-वैज्ञानिक संपदा का दस्तावेजीकरण करने वाली एक टीम ने सबसे पहले उस अनोखी संरचना की तस्वीरें देखीं, जिसकी पूजा बैगा आदिवासी लोग करते थे।

जांच में क्या मिला?

इसकी परतदार और कोरल जैसी बनावट ने कई सवाल खड़े किए। इसके बाद मौके पर जाकर जांच की गई और कई टेस्ट किए गए लेकिन यह पत्थर कहानी का सिर्फ आधा हिस्सा है। एएसआई के पुरातत्वविद् डॉ. मनोज कुमार कुर्मी ने कहा कि इस पत्थर के मंदिर से जुड़ी परंपरा 8,000 से 10,000 साल पुरानी हो सकती है।

आदिवासियों को पता था कि उनके पास कुछ कीमती चीज है और वे उसकी रक्षा कर रहे थे। हालांकि, इस इलाके में इंसानों की मौजूदगी बहुत पुरानी है। डॉ. मनोज कुमार कुर्मी ने कहा, "उस शुरुआती दौर में वास्तुकला के लिहाज से कोई मंदिर नहीं होते थे। लोग प्रकृति की पूजा करते थे जैसे कोई पत्थर, पेड़, पहाड़ या कोई और चीज जिसे वे पवित्र मानते थे और बाद में उसे मंदिर का रूप दे दिया गया होगा।"

6.5 करोड़ साल पहले बदली दुनिया

6.5 करोड़ साल पीछे जाएं तो पृथ्वी एक अलग जगह थी। लगभग 10 किलोमीटर चौड़ा एक क्षुद्रग्रह (asteroid) मेक्सिको के युकाटन प्रायद्वीप से टकराया था। भारत के दक्कन ट्रैप्स में जबरदस्त ज्वालामुखी गतिविधियों के साथ-साथ इसने दुनिया भर में न्यूक्लियर विंटर जैसी स्थिति पैदा कर दी, जिससे लगभग 75% जीव-जंतु खत्म हो गए और डायनासोर का युग समाप्त हो गया। साथ ही छोटे स्तनधारियों के लिए रास्ता खुल गया।

आदिवासियों में थी इस बात की समझ

डिंडोरी की भू-वैज्ञानिक संपदा को रिकॉर्ड करने के काम की अगुवाई करने वाले पुरातत्व विभाग के कमिश्नर मदन कुमार नागरगोजे ने कहा कि हो सकता है कि आदिवासी लोगों के पास चट्टानों की उम्र या बनावट का पता लगाने के लिए वैज्ञानिक उपकरण न रहे हों लेकिन उनमें यह समझने की समझ थी कि उनके पास कुछ कीमती है और वे उसकी रक्षा कर रहे थे।

खास तौर पर कमजोर आदिवासी समूह के तौर पर पहचाने जाने वाले बैगा लोग घने जंगलों वाले जिलों में रहते हैं, जिनमें डिंडोरी भी शामिल है। ये लोग उस इलाके में हजारों गांवों और बस्तियों में बसे हैं जिसे ऐतिहासिक रूप से बैगाचक के नाम से जाना जाता है।

जंगल बैगा लोगों की जिंदगी का अहम हिस्सा हैं। ये उन्हें खाना, दवा और रोजगार देते हैं और साथ ही पीढ़ियों से चली आ रही पारंपरिक जानकारी को भी बचाकर रखते हैं।

डिडोरी में छिपे हैं कई राज

आदिवासी समुदाय के साथ काम करने वाली और डिंडोरी की घोडामाडा गुफाओं में पाषाण युग के रॉक शेल्टर को रिकॉर्ड करने में मदद करने वाली गायनेकोलॉजिस्ट प्रियंका घोष के लिए यह खोज एक ऐसे इलाके की एक और झलक है जो अभी भी अपने राज छिपाए हुए है। उनका कहना है, "डिंडोरी मानव-विज्ञान का खजाना है। एक ऐसा छिपा हुआ संदूक जिसे समझने की जरूरत है।"

डिंडोरी में मिली कुछ चुनिंदा चीजें जल्द ही भोपाल के स्टेट म्यूजियम की एक नई गैलरी में दिखाई जाएंगी।

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