नई दिल्ली [संजय मिश्र]। कमल नाथ सरकार के त्याग पत्र देने के बाद यद्यपि भाजपा ने सत्ता की डोर थाम ली है, लेकिन उसके नेता और संभावित मुख्यमंत्री के लिए भी चुनौती कम नहीं है। एक तो उसकी भावी सरकार को भी एक स्थिर सरकार कहना जल्दबाजी होगी। इसका कारण विधानसभा की कुल सदस्य संख्या के अनुपात में उसके पास बहुमत का न होना है। शेष कार्यकाल तक बहुमत बनाए रखना बड़ी चुनौती होगी। यह सरकार भी कई उन्हीं विधायकों के अंकगणित के सहारे खड़ी हो रही है जिन्होंने अपने स्वार्थ में पंद्रह माह तक कमल नाथ सरकार को परेशान रखा।

एक तरह से अपनी मर्जी से उसे चलाने की कोशिश की। जितना चाहा उतना झुकाया, जब चाहा तब झुकाया। यही कारण है कि कानून व्यवस्था को लेकर हमेशा कमल नाथ सरकार कटघरे में रही। नई सरकार के मुखिया के लिए भी वे कम चुनौती नहीं हैं। नई सरकार बनने का श्रेय हासिल करने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया को संभालकर रखने के लिए भी उन्हें बड़े राजनीतिक कौशल का परिचय देना पड़ेगा। सिंधिया सत्ता में सशक्त हिस्सेदारी चाहेंगे और कांग्रेस के वचन पत्र में शामिल अपने वादों को पूरा करने का दबाव भी बनाएंगे।

वित्तीय संकट के बीच विकास कार्यों को गति देना और कांग्रेस (सिंधिया) के वचन पत्र को महत्व देना लोहे का चना चबाने जैसा है। अतिथि विद्वानों के साथ कर्मचारियों के वेतन-पेंशन, बेरोजगारी भत्ता और किसानों की कर्ज माफी का प्रबंध करना भी बड़ी चुनौती है। पंद्रह माह से सत्ता से दूर भाजपा के कद्दावर नेताओं को एकजुट रखकर 24 सीटों पर  उपचुनाव जितवाना भी आसान काम नहीं है। इन सीटों पर जीत-हार से भी नई सरकार का भविष्य तय होगा। अहम मुद्दा पूर्व की भाजपा सरकार की सामाजिक योजनाओं का भी है। शिवराज की संबल योजना में गरीब के लिए जन्म से लेकर आकस्मिक मौत तक त्वरित सहायता व अंतिम संस्कार के लिए धन उपलब्ध कराने का वादा अब खाली खजाने से कैसे पूरा होगा। प्रतिभावान छात्रों की कॉलेज फीस भरने की मेधावी योजना के लिए 15 सौ करोड़ रुपये कहां से आएंगे।

कन्यादान योजना के लिए कमल नाथ सरकार ने सरकारी मदद की रकम 25 हजार से बढ़ाकर 51 हजार रुपये कर दी, लेकिन बजट की कमी के कारण किसी को पैसा नहीं मिल पा रहा है। विभाग ने साढ़े सात सौ करोड़ रुपये का बजट मांगा है, जिसके लिए नई सरकार को एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ेगा। लगभग ढाई लाख से ज्यादा संविदा कर्मचारियों का नियमितीकरण का मुद्दा भी बड़ा है। बेरोजगारों को चार हजार रुपये प्रतिमाह का भत्ता देने का मुद्दा भाजपा ने ही उठाया है, अब उसकी पूर्ति करने का काम भी नई सरकार का है।

अपनी शिकस्त के लिए खुद कांग्रेस जिम्मेदार :

पिछले पंद्रह माह में ही मध्य प्रदेश के सियासी संग्राम में कांग्रेस मात खा गई। अपनी इस शिकस्त के लिए वह भाजपा को कोस रही है, लेकिन सच यह है कि इसके लिए वह खुद ही जिम्मेदार है। भारतीय राजनीति में मोदी फैक्टर आने के बाद से कांग्रेस को जैसे सांप सूंघ गया है। उसका नेतृत्व सिर्फ इस उम्मीद पर बैठा है कि एक दिन भारतीय जनमानस का मन बदल जाएगा और वह उसकी सभी गलतियों को माफ करते हुए उसे स्वीकार कर लेगा। राज्यों के क्षत्रपों पर उसका जैसे नियंत्रण रह ही नहीं गया है। मध्य प्रदेश का सत्ता संग्राम इसकी बानगी है। यह सच है कि कमल नाथ सरकार अपने ही अहंकार के कारण सत्ता से बाहर हो गई।

यह सोचने वाली बात है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि उसके 22 विधायक एक साथ पार्टी को अलविदा कह गए। इन विधायकों ने प्रकारांतर से भले ही भाजपा की मदद कर दी है, लेकिन उससे अधिक वे कांग्रेस के लिए खाई खोद गए। यह विचारणीय है कि सत्ता का सामर्थ्य होने के बावजूद ऐसा क्या था कि कमल नाथ इन विधायकों को संभाल नहीं पाए और वे विधायक उस ज्योतिरादित्य सिंधिया के पाले में शुरू से अंत तक खडे़ रहे, जिन्हें सरकार पंद्रह माह के अंदर समय-समय पर किनारे लगाती रही। इसे कोई जोड़- तोड़ या फरीद-फरोख्त भले कहे, लेकिन राजनीति में कोई इस तरह अपने नेता के प्रति समर्पण दिखाए, यह भी सामान्य घटना नहीं है।

कमल नाथ और उनके साथी दिग्विजय सिंह लाख कोशिश के बावजूद उन तक पहुंच नहीं पाए। इनमें कई विधायक तो दिग्विजय सिंह के खास भी रह चुके हैं, लेकिन उन्होंने उनसे बात करना तो दूर, मिलना तक मुनासिब नहीं समझा। पूरे घटनाक्रम के लिए वे कमल नाथ से ज्यादा दिग्विजय को जिम्मेदार बता रहे थे। कमल नाथ ने बतौर मुख्यमंत्री अपनी अंतिम प्रेस कांफ्रेंस में 15 महीने के काम की तुलना 15 साल की भाजपा सरकार से कर डाली।

उन्हें अधिकार है कि वे अपनी बात कहें, लेकिन पंद्रह माह की तुलना शिवराज सिंह चौहान की पंद्रह साल की सरकार से करना राजनीतिक बयान के सिवाय कुछ नहीं है। सरकार के पतन के पीछे एक तथ्य यह भी है कि कांग्रेस नेतृत्व अपने क्षत्रपों की व्यूहरचना में खुद ही उलझ गया है। पंद्रह माह में ही दिग्विजय सिंह ने कमल नाथ के साथ मिलकर ऐसी लकीर खींची कि सिंधिया दूर होते गए और नेतृत्व अनजान बने बैठा रहा। इस लड़ाई में किसी ने सबसे अधिक गंवाया है तो कांग्रेस ने और उसके बाद कमल नाथ ने। कमल नाथ ने तो अपनी सत्ता ही गवां दी। इतना होने के बावजूद दिग्विजय ही ऐसे हैं जिन्होंने गंवाया कम, पाया ज्यादा।

(स्थानीय संपादक, नवदुनिया, भोपाल) 

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