मेरठ: नेताओं का मोह छोड़े पुलिस... घटनाओं को दर्ज करना सीखे

पुलिसकर्मी को समझना होगा कि वह व्यक्ति विशेष के सेवक नहीं बल्कि, कानून के रखवाले हैं।

By Nandlal SharmaEdited By: Publish:Fri, 17 Aug 2018 06:00 AM (IST) Updated:Fri, 17 Aug 2018 06:00 AM (IST)
मेरठ: नेताओं का मोह छोड़े पुलिस... घटनाओं को दर्ज करना सीखे

किसी भी समाज के निरंतर विकास के लिए शांति और सुरक्षित वातावरण की जरूरत होती है। हर शासन का प्रथम कर्तव्य है कि वह समाज और देश-प्रदेश को बाहरी और आंतरिक नकारात्मक शक्तियों से मुक्त रखने के लिए समुचित व्यवस्था करे, परंतु वर्तमान परिस्थितियों में अपराध भी कम नहीं। आए दिन होने वाली घटनाओं से भय का माहौल बन रहा है। इन सबके बीच कुछ ऐसे भी लोग हैं, जो समाज को अपराध मुक्त रखने वाली सोच रखते हैं। वह प्रयास भी करते हैं। जनमानस को जागरुक भी करते हैं।

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ऐसी सोच रखने वालों के सुझावों और उनके कार्यों को दैनिक जागरण का 'माय सिटी-माय प्राइड' अभियान के तहत आपसे रू-ब-रू करा रहा है। मेरठ की डिफेंस कॉलोनी में रहने वाले रघुवंश सिंह राणा उन्हीं चुनिंदा शख्सियतों में से एक हैं, जो समाज को अपराध मुक्त बनाने की दिशा में कार्य कर रहे हैं।

आरएस राणा उप्र पुलिस के रिटायर्ड डीआईजी हैं। उनका कहना है कि शहर को अपराध मुक्त रखने बनाने के लिए अपराध और अपराधी के मनोविज्ञान को समझना जरूरी है। यदि अपराधी की मनोवैज्ञानिक प्रवृति का अध्ययन कर उसको मजबूर करने वाली परिस्थितियों को बनने से ही रोक दिया जाए तो समाज को अपराधमुक्त किया जा सकता है।

कानून व्यवस्था में सुधार का कोई मापदंड नहीं है। यदि अपराध हुआ है और वह थाने में गया है तो पुलिस सोचती है कि उसका क्राइम नंबर बढ़ जाएगा। वह हरसंभव प्रयास करती है कि अपराध पंजीकृत ही न हो। क्योंकि, राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण हर पुलिसकर्मी अपनी जान बचाने की कोशिश में लगा रहता है। अपराधी भी जानता है कि यदि उसने दस अपराध भी कर लिए तो पुलिस एक-दो दर्ज करके छोड़ देगी।

सेंस ऑफ सिक्योरिटी तब होगी जब क्राइम बंद होगा। इसमें सबसे ज्यादा फायदा अपराधी को हो रहा है। पुलिस घटनाएं दर्ज नहीं करती है तो शासन के पास पूर्ण आंकड़े नहीं पहुंच पाते, इसलिए जहां थाने या पुलिस की जरूरत है। वहां की जनता को वह दशकों तक नहीं मिल पाते। अधिकारियों का प्रस्ताव शासन में तो जाता था, लेकिन बाबू नुक्ता लगा देता है कि आपराधिक आंकड़े कम होने के कारण प्रस्ताव दशकों तक लंबित पड़ा रहता है।

उन्होंने बताया कि यदि रिकॉर्ड ठीक होगा तो नए थाने भी सृजित होंगे और पुलिसकर्मी भी जल्दी मिलेंगे। अपराध दर्ज न करना पुलिस और समाज दोनों के हित में नहीं है। यदि कोई गलत रिपोर्ट भी दर्ज करा रहा है तो जांच में खत्म कर देना चाहिए, लेकिन उसे दबाना नहीं चाहिए। नेताओं के प्रति पुलिस का ज्यादा झुकाव हो गया है। नेता अपना हित साधता है। उसे कानून व्यवस्था या समाज से मतलब नहीं है।

पुलिसकर्मी को समझना होगा कि वह व्यक्ति विशेष के सेवक नहीं बल्कि, कानून के रखवाले हैं। दूसरा पहलू यह भी है कि उसके सामने भी चुनौती है। यदि वह नेताओं की नहीं सुनता है तो कार्रवाई का डंडा चला दिया जाता है। इस चुनौती से भी पार पाकर समाज को अपराध मुक्त बनाना प्रत्येक पुलिसकर्मी का कर्तव्य है।

यह सुझाव बना सकते हैं बेहतर हालात

- पुलिस को नेताओं का मोह छोड़ना होगा। अपना स्वार्थ साधने के लिए नेता पुलिस का इस्तेमाल करता है। कानून व्यवस्था लचर होने के पीछे नेता का अहम रोल है। पुलिसकर्मी को अपना फर्ज ईमानदारी से निभाना होगा और नेताओं से दूर रहना होगा। यदि ऐसा होता है तो अपराध काफी हद तक कम हो जाएगा।

- पहले कुछ ऐसे अधिकारी थे, जिनकी ईमानदारी की कसम खा सकते थे और पुलिस महकमे के पिलर थे, लेकिन अब किसी अधिकारी के लिए ऐसा कहना संभव नहीं है। अफसर का प्रभाव खत्म हो गया है। इकबाल मिट गया है। उसे कायम करने के लिए ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा से काम करना होगा।

- पुलिस के पास वर्तमान में तमाम संसाधन हैं। पहले की अपेक्षा सर्विलांस सिस्टम भी बेहतर हुआ है। बावजूद इसके, पुलिस का रिएक्शन टाइम सही नहीं हो रहा है। सूचना के घंटों बाद पुलिस मौके पर पहुंचती है, तब तक अपराधी भाग जाता है। रिएक्शन टाइम में सुधार हो तो क्राइम कंट्रोल में मदद मिलेगी।

- न्यायिक व्यवस्था में भी सुधार लाने की जरूरत है। देश न्यायिक अधिकारियों की कमी से जूझ रहा है। एक-एक अदालत में हजारों केस लंबित हैं। मामूली केस पर भी दशकों बाद फैसला हो पाता है। इसके बाद ऊपर अपील की जाती है। एक केस को निपटाने में 30 से 40 साल लग जाते हैं। इसलिए अपराधी बेखौफ होकर अपराध करता रहता है। यदि उसे समय से सजा मिले तो भी अपराध कम हो जाए।

- मैं पुलिस से पहले फौज में रहा हूं। मेरा मानना है कि एक पुलिसकर्मी को सैनिक की तरह काम करना चाहिए। अपनी ड्यूटी ईमानदारी से करेंगे और बगैर भेदभाव फर्ज को अंजाम देंगे तभी समाज को अपराध मुक्त बनाया जा सकता है। हालांकि, घरेलू हिंसा जैसे मामले न कभी रुके हैं और न कभी रुकने की संभावना है। समाज को भी नकारात्मक सोच पीछे छोड़कर सकारात्मकता अपनानी होगी।

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