संतान के लिए कल्याणकारी व्रत अहोई अष्टमी

व्रत एवं त्योहारों की दृष्टि से कार्तिक मास की महिमा अतुलनीय है। इसी महीने के कृष्णपक्ष की अष्टमी को स्त्रियां अपनी संतान की लंबी आयु के लिए अहोई अष्टमी का व्रत रखती हैं।

By Edited By: Publish:Mon, 03 Nov 2014 11:30 AM (IST) Updated:Mon, 03 Nov 2014 11:30 AM (IST)
संतान के लिए कल्याणकारी व्रत  
अहोई अष्टमी

विजयादशमी 3 अक्टूबर

शरद पूर्णिमा 7 अक्टूबर

करवा चौथ 11 अक्टूबर

अहोई अष्टमी 15 अक्टूबर

धनतेरस 21 अक्टूबर

दीपावली 23 अक्टूबर

गोवर्धन पूजा 24 अक्टूबर

भैया दूज 25 अक्टूबर

छठ पूजा 29 अक्टूबर

व्रत एवं त्योहारों की दृष्टि से कार्तिक मास की महिमा अतुलनीय है। इसी महीने के कृष्णपक्ष की अष्टमी को स्त्रियां अपनी संतान की लंबी आयु के लिए अहोई अष्टमी का व्रत रखती हैं।

व्रत का विधान

सदियों से ऐसी मान्यता प्रचलित है कि अहोई अष्टमी का व्रत रखने से संतान के जीवन में सुख-समृद्धि आती है। दीपावली के ठीक आठ दिन पहले माताएं अपनी संतान के कल्याण का संकल्प लेकर यह व्रत रखती हैं। दिन भर का उपवास रखने के बाद वे अहोई माता की पूजा करती हैं। पूजन के लिए बाजार में अहोई माता की तसवीर मिल जाती है। कुछ स्त्रियां अपने घर की दीवार पर गेरू से अहोई माता का चित्र उकेर कर उनकी पूजा करती हैं। पूजन के लिए अहोई माता की तसवीर के सामने एक पटरा रखकर उस पर जल से भरा कलश रखें। रोली-चावल से माता की पूजा करें। मीठे पुए या आटे के हलवे का भोग लगाएं। कलश पर सतिया बना लें और हाथ में गेहूं के सात दाने लेकर अहोई माता की कथा सुनें। पहली बार मां बनने वाली स्त्रियां इस व्रत के लिए पहले से चांदी के साथ मोती के दो दाने पिरो कर खास तरह का लॉकेट बनवाती हैं, जिसे अहोई कहा जाता है। पूजन के बाद गले में अहोई पहन लें। इसे बनवाने की विधि पहली बार ही करनी है। फिर जैसे-जैसे संतानों की संख्या में वृद्धि होगी उसमें मोती के दाने बढवाती जाएं। इस व्रत में तारे को अ‌र्घ्य देने के बाद ही पूजन संपन्न होती है। इसलिए इसकी पूजा रात को ही की जाती है। जो अहोई गले में पहनी जाती है, उसे दीपावली के बाद उतार दिया जाता है। जिस दिन इसे उतारा जाता है, उस दिन भी व्रत रखने और चंद्रमा को गुड से अ‌र्घ्य देकर ब्राह्मण को दान देने की परंपरा है।

प्रचलित कथा

प्राचीनकाल में एक साहूकार दंपती के शिशु जन्म लेते ही अकाल मृत्यु के शिकार हो जाते थे। इससे दुखी होकर वे अपना घर-बार छोडकर वन में चले गए। वहां उन्होंने अन्न-जल त्याग कर भगवान का ध्यान करना शुरू कर दिया। कुछ समय बाद यह आकाशवाणी हुई कि तुम अपने प्राण मत त्यागो। अभी तक तुम्हें जो भी कष्ट प्राप्त हुआ है, वह तुम्हारे पूर्वजन्म के कर्मो का फल है। तुम अपनी पत्नी से कहो कि वह कार्तिक मास कृष्ण पक्ष की अष्टमी को व्रत रखे। इससे अहोई माता प्रसन्न होकर तुम्हारे पास आएंगी। तब तुम दोनों उनसे अपने लिए स्वस्थ और दीर्घायु संतान का वरदान मांगना। व्रत वाले दिन तुन दोनों वृंदावन स्थित राधाकुंड में स्नान करना। इससे तुम्हारी यह मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी। इसके कुछ ही दिनों बाद साहूकार की पत्नी ने अहोई अष्टमी का व्रत रखा। अगले वर्ष उसने एक स्वस्थ-सुंदर बालक को जन्म दिया। इसके बाद से सभी स्त्रियां संतान सुख की प्राप्ति के लिए अहोई अष्टमी का व्रत रखने लगीं। लगभग पूरे उत्तर भारत में यह व्रत प्रचलित है। हालांकि, विभिन्न प्रांतों के लोकाचार में विविधता की वजह से पूजन की विधि और व्रत की कथा में भी मामूली फर्क होना संभव है, लेकिन इस व्रत की मूल भावना में संतान के प्रति मंगल कामना निहित है।

राधाष्टमी भी है यह

अहोई अष्टमी की रात्रि में राधाकुंड के स्नान का विशेष महत्व है। ऐसी मान्यता है कि इसी दिन वृंदावन में राधाकुंड का प्राकट्य हुआ था। लोगों का ऐसा विश्वास है कि राधाकुंड में स्नान करने से नि:संतान दंपतियों को संतान सुख की प्राप्ति होती है।

संध्या टंडन

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