Haryana Politics: भाजपा नेता बीरेंद्र सिंह और इनेलो प्रमुख ओमप्रकाश चौटाला के बगलगीर होने के निहितार्थ

Haryana Politics यदि बीरेंद्र सिंह इनेलो के बगलगीर होते हैं तो बृजेंद्र सिंह को तय करना होगा कि वह भाजपा में रहें या पिता के साथ जाएं। ऐसी स्थिति में वह भाजपा के साथ ही रहना पसंद करेंगे क्योंकि उनके राजनीतिक जीवन का अभी उदयकाल है।

By Sanjay PokhriyalEdited By: Publish:Wed, 29 Sep 2021 09:06 AM (IST) Updated:Wed, 29 Sep 2021 12:57 PM (IST)
Haryana Politics: भाजपा नेता बीरेंद्र सिंह और इनेलो प्रमुख ओमप्रकाश चौटाला के बगलगीर होने के निहितार्थ
एक कार्यक्रम में भाजपा नेता बीरेंद्र सिंह और इनेलो नेता अभय चौटाला बातचीत करते हुए (मध्य में)। जागरण

जगदीश त्रिपाठी। Haryana Politics पूर्व केंद्रीय मंत्री चौधरी बीरेंद्र सिंह लंबे समय कांग्रेस में रहे। सात वर्ष पहले भाजपा में आए और अब वह संकेत दे रहे हैं कि भाजपा से उनका मोहभंग हो चुका है। पूर्व उप प्रधानमंत्री चौधरी देवीलाल की जयंती पर 25 सितंबर को आयोजित कार्यक्रम में इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) प्रमुख ओमप्रकाश चौटाला के साथ मंच साझा करते हुए उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा पर जो कटाक्ष किया, उससे यह स्पष्ट हो जाता है कि उनके मन में छटपटाहट है। माना जा रहा कि बेटे बृजेंद्र को केंद्र सरकार में मंत्री न बनवा पाने से बीरेंद्र सिंह व्यथित हैं।

2014 के लोकसभा चुनावों के पूर्व बीरेंद्र सिंह कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य थे। लोकसभा चुनावों के ठीक पहले वह भाजपा में आए। तब वह कहा करते थे कि कांग्रेस में उनके साथ ट्रेजेडी होती रही। उनके आगमन पर अमित शाह ने कहा था-भाजपा में चौधरी साहब के साथ न ट्रेजेडी होगी न कामेडी। चुनाव हुए। भाजपा केंद्र में सत्ता में आई। बीरेंद्र सिंह को भाजपा ने राज्यसभा में भेजा। केंद्र में कैबिनेट मंत्री बनाया। विधानसभा चुनाव हुए। बीरेंद्र सिंह की इच्छा थी कि भाजपा उन्हें मुख्यमंत्री बनाए। भाजपा ने उनकी पत्नी प्रेमलता और दो तीन समर्थकों को टिकट दिया जरूर, लेकिन उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाया। यह बात अलग है कि भाजपा में केंद्रीय मंत्री बनकर वह संतोष जाहिर करते थे और कहा करते थे कि भाजपा ने उन्हें चार महीने में जो दिया, वह कांग्रेस ने चालीस वर्षो में नहीं दिया।

कांग्रेस में बीरेंद्र सिंह की प्रतिस्पर्धा चौधरी भूपेंद्र सिंह हुड्डा से रही। 2005 के विधानसभा चुनावों के बाद जब चौधरी भजनलाल को हुड्डा खेमे से चुनौती मिल रही थी और उन्हें लगा कि अब मुख्यमंत्री नहीं बन पाएंगे तो उन्होंने चौधरी बीरेंद्र सिंह का नाम आगे बढ़ा दिया, यद्यपि हुड्डा बाजी जीत गए। चौधरी बीरेंद्र सिंह ने खुद को हुड्डा के समानांतर कांग्रेस में स्थापित करने की कोशिश की। कुछ हद तक सफल भी रहे, लेकिन कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में नहीं प्रमोट किया। इसके लिए परिस्थितियां भी जिम्मेदार थीं। 2009 के चुनाव में कांग्रेस को पूर्ण बहुमत नहीं मिला। हुड्डा ने जुगाड़ से सरकार बना ली। यद्यपि हुड्डा पर अंकुश लगाने के लिए कांग्रेस ने उन्हें राष्ट्रीय महासचिव बना दिया। राज्यसभा में भेजा, पर मुख्यमंत्री बनने की उनकी हसरत पूरी नहीं हुई।

भाजपा में आने के बाद उन्होंने परिस्थितियों से समझौता करने का निर्णय लिया और स्वयं के बजाय बेटे बृजेंद्र को राजनीति में लांच करने पर फोकस किया। बीते लोकसभा चुनावों के पहले उन्होंने हिसार से अपने बेटे बृजेंद्र को टिकट देने के लिए भाजपा नेतृत्व से अनुरोध किया। साथ में यह प्रस्ताव दिया कि वह राज्यसभा सीट और मंत्री पद छोड़ देंगे। भाजपा ने उनका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। बृजेंद्र भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी थे। इस्तीफा देकर हिसार से भाजपा के टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़े और जीते। बीरेंद्र सिंह ने पुरजोर कोशिश की कि बृजेंद्र केंद्रीय मंत्रिमंडल में ले लिए जाएं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बीरेंद्र सिंह को लगता था कि निकट भविष्य में केंद्रीय मंत्रिमंडल में विस्तार या परिवर्तन होगा तो उनके बेटे को जगह मिल जाएगी। कुछ महीने पहले केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल के समय उन्होंने इसके लिए भरपूर प्रयास किए। फिर भी बात नहीं बनी। तब से बीरेंद्र सिंह में छटपटाहट है।

चौटाला परिवार की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाने के पीछे एक बड़ा कारण और है। बीते विधानसभा चुनावों में उनकी पत्नी प्रेमलता, जो भाजपा प्रत्याशी थीं, दुष्यंत चौटाला से उचाना विधानसभा क्षेत्र से चुनाव हार गईं। जननायक जनता पार्टी ने भाजपा को समर्थन दिया और दुष्यंत उप मुख्यमंत्री बन गए। उचाना बीरेंद्र सिंह का गृह क्षेत्र है। उनका प्रभाव है, लेकिन वहां इनेलो का भी बड़ा प्रभाव है।

इनेलो से अलग होने के बाद उसके अधिकतर मतदाता जननायक जनता पार्टी में शिफ्ट कर गए। अब बीरेंद्र सिंह को लगता होगा कि इनेलो के समर्थन से वह उचाना सीट पर फिर काबिज हो सकते हैं। हो सकता है, ऐसा हो जाए, लेकिन इससे भाजपा को कोई खास नुकसान नहीं होने वाला है। बीरेंद्र सिंह का इतना प्रभाव नहीं, लेकिन भाजपा नेताओं के अनुसार चौधरी बीरेंद्र सिंह ने इस कामेडी से अपने लिए ट्रेजेडी खुद ही क्रिएट कर ली है। उनके इस कदम से बृजेंद्र सिंह का नुकसान हो सकता है। यदि बीरेंद्र सिंह इनेलो के बगलगीर होते हैं, जैसा कि दिख रहा है तो बृजेंद्र सिंह को तय करना होगा कि वह भाजपा में रहें या पिता के साथ जाएं। ऐसी स्थिति में वह भाजपा के साथ ही रहना पसंद करेंगे, क्योंकि उनके राजनीतिक जीवन का अभी उदयकाल है।

[प्रभारी, हरियाणा स्टेट डेस्क]

chat bot
आपका साथी