खुले आकाश में पंछियों की तरह उड़ना, ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों की चोटियों को छूना या बर्फीली वादियों में अठखेलियां करने का मजा और रोमांच लोगों को साहसिक पर्यटन की ओर आकर्षित करते हैं। यही वजह है कि देश के पर्यटन मानचित्र पर कुछ ऐसे स्थान बहुत तेजी से उभरे हैं, जो देश-विदेश से युवाओं को साहसिक पर्यटन के लिए लुभा रहे हैं। इसी को चुनौती के रूप में स्वीकार कर साहसी लोग ट्रैकिंग, स्कींइंग, हैलीस्कींइंग, ग्लाइडिंग, पैरा ग्लाइडिंग, वाटर राफ्टिंग, पैरासेलिंग, जेट स्कीइंग, वॉटर सर्फिग जैसे रोमांचक पर्यटन अभियानों पर निकल पड़ते हैं। पहाड़ जहां सैलानियों को लुभाते हैं, वहीं अपनी विशालकाय चोटियों को छूने के लिए मौन निमंत्रण-सा भी देते हैं। इस निमंत्रण को स्वीकार कर कई साहसी युवा ट्रैकिंग और पर्वतारोहण जैसे अभियानों पर निकल पड़ते हैं। पहाड़ की चोटी से छलांग लगा कर हवा में उड़ते हुए आसमान का सीना नापने के दो खेल-हैंग ग्लाइडिंग और पैरा ग्लाइडिंग हाल ही के वर्षोमें काफी लोकप्रिय हुए हैं और इनकी गिनती साहसिक व जोखिम भरे खेलों में की जाने लगी है। राफ्टिंग व कयाकिंग ऐसी जलक्रीड़ाओं में शुमार हैं। गर्मी हो या सर्दी, कभी भी उफनती लहरों से अठखेलियां की जा सकती हैं। इसी तरह सर्दियों में जब पहाड़ों की चोटियां बर्फ की चादर से ढक जाती है, कई रोमांच पे्रमी पर्यटक बर्फ के खेलों का लुत्फ उठाने पहाड़ चले आते हैं। स्कींइग और हैली स्कींइग ऐसे ही बर्फानी खेलों के नाम हैं। भारत में हिमानी खेलों के लिए उपयुक्त स्थल हिमाचल में सेलंग नाला, कुफरी, नारकंडा और रोहतांग है, जबकि कश्मीर में ‘गुलमर्ग’ और गढ़वाल में ‘औली’ प्रमुख हैं। समुद्र तल से 10 हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित ‘औली’ उत्तर-प्रदेश के चमौली जिले में नंदा देवी पर्वत श्रृंखला के आगोश में है। स्कीइंग विशेषज्ञ इसे एशिया का सर्वश्रेष्ठ बर्फीला खेल मैदान मानते हैं। यहां पर कई बार राष्ट्रीय शीत कालीन खेलों का आयोजन हो चुका है।

गढ़वाल मंडल विकास निगम स्कींइग के शौकीनों को प्रशिक्षण देने के लिए बाकायदा स्कींइग पाठ्यक्रम चलाता है। कश्मीर में ‘गुलमर्ग’ स्कींइग के लिए विख्यात है तो हिमाचल में मनाली (सोलंग नाला), कुफरी, नारकंडा और रोहतांग में स्कींइग के लिए उपयुक्त ढलान मौजूद हैं। इन ढलानों पर हर वर्ष सैकड़ों देशी-विदेशी रोमांच प्रेमी स्कींइग का लुत्फ उठाने आते हैं। हिमाचल में स्कींइग शुरू करने का श्रेय कुफरी को प्राप्त है। भारत-तिब्बत राष्ट्रीय राजमार्ग पर शिमला से 18 किलोमीटर दूर स्थित कुफरी अत्यंत मनोहारी पर्यटन स्थल है। स्कींइग पे्रमियों के लिए तो यह स्थल स्वर्ग से कम नही।यहां पर महासू से कुफरी बाजार तक तक जाते 3 किलोमीटर लंबे स्कींइग ढलान पर फिसलते हुए पहला पड़ाव ‘कुबेर’ के पास आता है।

वहां से ‘जंप’ लगाकर स्कीयर कुफरी बाजार तक फिसलता हुआ पहुंच जाता है। मनाली के पास स्थित ‘सोलंग नाला’ तो हिमानी खेलों के प्रमुख केंद्र के रूप में उभर कर सामने आया है। यहां प्रति वर्ष पर्वतारोहण संस्थान द्वारा शीत ऋतु में खेल प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है। इस स्थल को स्कींइग की दृष्टि से अब और विकसित किया जा रहा है। स्कींइग की तरह एक अन्य रोमांचक खेल है-हैली स्कींइग। समुद्र तल से 13,050 फुट की ऊंचाई पर स्थित रोहतांग दर्रे पर 1989-90 की शीत ऋतु में इस खेल का आयोजन शुरू हुआ था। दुनिया की सबसे तेज व नवीन पद्धति पर आधारित इस खेल में स्कींइग खिलाड़ी को हैलीकाप्टर के जरिए हिम शिखर पर उतारा जाता है, जहां से मीलों लंबे ढलानों पर वह तूफानी रफ्तार से फिसलता चला जाता है। बर्फ पर फिसलने की तरह आसमान में उड़ने के रोमांचक खेलों के प्रति भी युवा पीढ़ी का रुझान बढ़ा है।इन खेलों को हैंग ग्लाइडिंग व पैरा ग्लाइडिंग के नाम से भी जाना जाता है। पैरा ग्लाइडिंग की शुरुआत ‘फ्रांस’ में 1978 में हुई थी, जहां पहली आर ‘आल्प्स’ पर्वत की ऊंचाइयों से उड़ान भरी गई। पैरा ग्लाइडिंग में कपड़े की दो सतह होती है जिनको सिलाई करके छोटे-छोटे हिस्सों में बांट दिया जाता है। ज्यों ही खिलाड़ी पैरा ग्लाइडर को लेकर दौड़ता है, इस हिस्से में हवा भर जाती है, जिसके कारण पैरा ग्लाइडर हवा में तैरने लगता है।

यदि खिलाड़ी हवा में दाएं मुड़ना चाहता है तो वह ग्लाइडर में लगी दाएं हाथ की रस्सियों को खींचता है और अगर बाएं मुड़ना चाहता है तो बाई ओर की रस्सियों को अपनी ओर खींचता है। जब खिलाड़ी को नीचे उतरना होता है तो वह सारी रस्सियों को अपनी ओर खींच लेता है। भारत में पैरा ग्लाइडिंग के लिए मशहूर स्थलों में ‘सोलंग नाला’ के अतिरिक्त बिलासपुर, जोगिंदरनगर व बिलिंग भी शामिल हैं। इसके अलावा मुंबई, सिक्किम और उत्तराखंड में अनेक स्थानों पर इस खेल के लिए अभ्यास और प्रशिक्षण की व्यवस्था है। राजस्थान में अरावली पर्वत श्रेणियां, तमिलनाडु में नीलगिरि पहाडि़यां और बैंगलूर में कोनिकट पैरा ग्लाइडिंग के लिए सर्वोत्तम स्थल हैं। हिमाचल प्रदेश की बिलिंग घाटी को पैरा ग्लाइडिंग के लिए एशिया में सर्वाधिक उपयुक्त स्थल माना जाता है और जब इस घाटी में पैरा ग्लाइडिंग प्रतियोगिताओं का आयोजन होता है, तो आसमान रंग बिरंगी छतरियों से भर उठता है। बड़ा अद्भुत व अलौकिक दृश्य होता है। यहां की पथरीली जमीन से छलांग लगा कर पैरा ग्लाइडर हवा में तैरने लगता है तो पौराणिक कथाओं में उपजी उड़न खटोलों की कल्पना मानो जीवंत हो उठती है। हवा में उड़ने, उन्मुक्त आकाश में विचरण करने और धरती व आसमान के बीच अठखेलियां करने का एक अन्य रोमांचक खेल है- हैंग ग्लाइडिंग। हवा में उड़ने की चाह हममें से अधिकांश के मन में होती है। उड़ते परिंदों को देख कर यह चाह और भी बलवती हो उठती है। जर्मनी के नागरिक आटो लिलिएंथल के मन में भी कभी ऐसी चाह ही उठी थी और वह आकाश में उड़ने की कल्पना को साकार करने में इतना तल्लीन हो गया था कि उसने सचमुच में ऐसी तकनीक विकसित कर डाली जिससे इंसान पंछियों की तरह हवा में उड़ सकता था, नटों की तरह अठखेलियां दिखा सकता था। इस तकनीक का नाम था हैंग ग्लाइडर। लिलिएंथल ने 1891 में पहला हैंग ग्लाइडर बना कर आसमान का सीना नापा था। फिर विश्व के कई उत्साही व साहसी लोग इस तकनीक की तरफ आकर्षित हुए। उसके बाद तो यह रोमांचक खेलभर हो गया। कुछ लोगों को उफनती नदी की लहरों से अठखेलियां करने में भी अद्भुत रोमांच हासिल होता है। उत्तर-प्रदेश के गढ़वाल और हिमाचल प्रदेश की कुल्लू घाटी में राफ्टिंग शिविरों का आयोजन अक्सर होता ही रहता है। गर्मियों के मौसम में नदी में जल क्रीड़ाएं देखते ही बनती हैं। ऋषिकेश से बद्रीनाथ मार्ग पर कौडि़याल, व्यासी के आसपास कई एजेंसियां राफ्टिंग का समुचित प्रशिक्षण देती हैं।

रोमांचक खेलों पर्वतारोहण व ट्रैकिंग सबसे आसान हैं और सुलभ भी। कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, गढ़वाल, सिक्किम, पूर्वोत्तर व दार्जिलिंग में पर्वतारोहण व ट्रैकिंग के लिए मशहूर कई स्थल हैं। दार्जीलिंग, उत्तरकाशी, जम्मू व मनाली स्थित पर्वतारोहण संस्थान पर्वतारोहण का समग्र प्रशिक्षण भी देते हैं। लाहौल और कुल्लू-मनाली की घाटियां भी साहसिक पर्यटन के शौकीनों को लुभाती हैं। इन घाटियों में प्रकृति के विभिन्न नजारे दिखते हैं। साहसिक पर्यटन के शौकीनों के लिए लेह-लद्दाख भी स्वर्ग से कम नहीं। कुल मिलाकर पर्वतीय स्थल रोमांच का दूसरा नाम है। इस रोमांच का लुत्फ उठाने के लिए साहसी नौजवान व युवतियां जोखिम उठाने से भी गुरेज नहीं करते। पिछले कुछ वर्षो से देश की पीढ़ी का रुझान साहसिक खेलों के प्रति बढ़ा है और इस पीढ़ी की नजर में सबसे बड़ी शिद्दत से यह सोच पनपी है कि आखिर बिन रोमांच जिंदगी कैसी!

ट्रेकिंग

मुंबई के पास-लोनावाला, राजामाची हिमाचल-कुल्लु, धौलाधार पहाडि़यां सिक्किम-तोलुंगमठ ट्रैक, मालेडुंगा ट्रेक उत्तराखंड-गढ़वाल, पिथौरागढ़, कौसानी मध्य प्रदेश-पंचमढ़ी कब जाएं: बारिश व हिमपात के 4 महीने छोड़ कर साल में कभी भी जा सकते हैं। खर्च: सात दिन से एक महीने तक के प्रशिक्षण शिविर आयोजित किए जाते हैं, जिसका 3 से10 हजार का खर्च आता है।

स्कीइंग

हिमाचल-कुफरी, सोलंग नाला, नारकांडा, रोहतांग । कश्मीर-गुलमर्ग, सोनमर्ग, पहलगाम। उत्तराखंड-गढ़वाल, जोशीमठ, चमौली। कब जाएं: स्कीइंग के लिए दिसंबर से मार्च के बीच सबसे अच्छा समय है खर्च: 5 से 7 दिन के प्रशिक्षण कोर्स के लिए 3000 से 5000 रुपये तक ।

ग्लाइडिंग

मुंबई के पास गोल्डन ग्लैड, खंडाला, लोनावाला बंगलौर के पास नीलगिरि की पहाडि़यां हिमाचल-बिलिंग घाटी, सोलंग नाला, बिलासपुर, जोगिंदरनगर उत्तराखंड-औली और गढ़वाल घाटी

कब जाएं: मार्च से जून तक का समय उपयुक्त, खर्च: 5 से 7 दिन के प्रशिक्षण कोर्स के लिए लगभग 3,000 से 4,000 रुपये।

वाटर स्पो‌र्ट्स

हिमाचल-कुल्लू घाटी की ब्यास नदी में। ; उत्तराखंड-ऋषिकेश-बद्रीनाथ मार्ग पर गंगा, गढ़वाल घाटी में अलकनंदा और भागीरथी नदी में। सिक्किम में-कालिम्पोंग में तीस्ता और रंगीत नदी में। कब जाएं:खर्च: दो दिन के लिए लगभग 3000 रुपये प्रति व्यक्ति। अक्टूबर से अप्रैल

Posted By: Preeti jha

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