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ताजमहल से कहीं ज्यादा खूबसूरत है संगमरमर का ये मंदिर, नक्काशी देख ठहर जाएंगी निगाहें; दिलचस्प है इतिहास

Published: Fri, 25 Sep 2026 04:51 PM (IST)

माउंट आबू में स्थित दिलवाड़ा जैन मंदिर अपनी अद्भुत संगमरमर की नक्काशी और समृद्ध इतिहास के लिए प्रसिद्ध है।

दिलवाड़ा का जैन मंदिर: संगमरमर पर नक्काशी की एक मिसाल (Image Source: AI Generated)

दिलवाड़ा का जैन मंदिर: संगमरमर पर नक्काशी की एक मिसाल (Image Source: AI Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। राजस्थान का माउंट आबू अरावली की पहाड़ियों के बीच छिपा इकलौता हिल स्टेशन है और इसी हिल स्टेशन में स्थित है दुनिया का सबसे मशहूर दिलवाड़ा जैन मंदिर। यह केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है, इसकी खूबसूरती भी एक वजह है जो पर्यटकों को इस ओर आकर्षित करती है। 

आइए आपको दिलवाड़ा जैन मंदिर की सुंदरता और इतिहास दोनों के बारे में विस्तार से बताते हैं।

संगमरमर पर नक्काशी एक मिसाल 

दिलवाड़ा जैन मंदिर का इतिहास 11वीं से 13वीं शताब्दी के बीच गुजरात के चालुक्य (सोलंकी) राजवंश के शासनकाल से जुड़ा हुआ है। इसके निर्माण का श्रेय 1031 ईस्वी में गुजरात के सोलंकी शासक भीमदेव प्रथम के मंत्री विमल शाह को जाता है।

यह मंदिर भारतीय मंदिर वास्तुकला का अद्भुत नमूना है और इसकी संगमरमर पर की गई नक्काशी तो किसी मिसाल से कम नहीं है। कहते हैं कि इसकी नक्काशी दुनिया की सबसे सूक्ष्म पत्थर कारीगरी में गिनी जाती है। 

यह मंदिर बाहर से देखने पर किसी सामान्य मंदिर जैसा ही लग सकता है, लेकिन अंदर प्रवेश करते ही संगमरमर की इतनी शानदार कारीगरी दिखाई देती है, जिसकी तारीफ के लिए शब्द भी कम हैं। 

श्वेतांबर जैन परंपरा से है संबंध 

दिलवाड़ा जैन मंदिर में कुल 5 प्रमुख मंदिर हैं जिनका संबंध जैन धर्म के श्वेतांबर संप्रदाय से है। इनमें पांच मंदिरों का समूह है: 

विमल वसाही 

इनमें पहला मंदिर विमल वसाही 1031 ई. के आसपास बनाया गया था। यह प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ) को समर्पित है। यही स्थान पूरे मंदिर का हृदय कहा गया है, जिसे रंग मंडप भी कहते हैं। इसकी छत पर की गई नक्काशी, विशाल मंडप और स्तंभ देखने लायक स्थान है। 

लूणा वसाही

दूसरा मंदिर लूणा वसाही का निर्माण गुजरात शासकों के मंत्री वस्तुपाल और तेजपाल ने 1230 ई. में करवाया था। बता दें कि यह 22वें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ को समर्पित है। इसी स्थान पर संगमरमर का बना कल्पवृक्ष और हाथी मंडप भी है।  

पित्तलहर

तीसरा मंदिर पित्तलहर भी भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ) को समर्पित है। इस मंदिर को पीतलहर या पट्टलहर के नाम से भी जाना जाता हैं। 

पार्श्वनाथ मंदिर

दिलवाड़ा जैन मंदिर का चौथा मंदिर पार्श्वनाथ है जो 23 वीं तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ को समर्पित है। इसका परिसर सबसे ऊंचा और तीन मंजिला है। 

महावीर स्वामी मंदिर 

महावीर स्वामी पांचवा मंदिर है, यह 24वें और अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी को समर्पित है। वैसे तो बाकी मंदिरों की तुलना में इसका आकार सबसे छोटा है, लेकिन इसकी दीवारों पर उकेरी बेहतरीन नक्काशी किसी का भी ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर सकती है।