नदी के किनारे आम के बगीचे में फगुआ बयार, बहादुर शाह जफर की वो फाग महफिल, हंसी ठिठोली। बादशाहों का चांदनी चौक में हर खासोआम से रंग खेलना। वो रंग था प्रेम का, आपसी भाईचारे का। आज बादशाह की फाग की वो महफिलें तो नहीं हैं लेकिन दिल्ली-6 का दिल आज भी उन्हीं रंगरेज बादशाहों के रंग से रंगा है।

महफिल में बहादुर शाह जफर भी खूब फाग गाया करते थे, हंसी ठिठोली करते थे। महफिल के बाद, बादशाह चांदनी चौक का रुख करते थे और हर खासोआम से रंग लगवाते थे और सभी को रंग लगाते थे, उनके साथ साथ नाचते थे गाते थे। लाल, गुलाबी, हरे रंगों में सराबोर हर शख्स एक ही रंग में रंगा नजर आता था। वो रंग था प्रेम का, आपसी भाई चारे का। आज बादशाह की फाग की महफिलें तो नहीं है लेकिन उनकी तहजीब जिंदा है। पुरानी दिल्ली में लोग उसी उल्लास के साथ होली मनाते हैं। मूर्ख सम्मेलन आयोजित होते हैं, हंसी ठिठोली होती है। होलियारों की टोली मस्ती में आज भी दरीबों से निकलती है। लोग एक दूसरे को गुलाल लगाते हैं। होली के दो दिन पहले से बाजार बंद हो जाते हैं, लेकिन सड़कें होलियारों की मस्ती के रंग में रंगे नजर आते हैं। दरीबों, छत्तो पर रंगों की बाल्टियां लिए खड़ी महिलाएं होलियारों पर रंग डालती हैं। बच्चे गुब्बारों से होली का मजा लेते हैं। होली के मौके पर लोग आज भी एक दूसरे के साथ हंसी ठिठोली करते हैं।

नुक्कड़ पर भांग की कुल्फी आज भी बिकती है और होलियारे उसे शौक से खाते हैं। महिलाएं रसोई में कलमी वड़े, गुङिाया, दही भल्ले बनाकर सभी को प्रेम से खिलाती हैं। हर गली नुक्कड़ से रंगों में डूबे लोग दिखाई देते हैं। टिन के डब्बों को ढोल, और थाली को मंजीरे की तरह इस्तेमाल करते हैं। आज भी पुरानी दिल्ली में लोग टेसू के फूल के रंग से होली खेलते हैं। इसकी तैयारी होली के दो दिन पहले शुरू हो जाती है। बड़े से बर्तन में फूलों को उबाला जाता है जिससे गाड़ा नारंगी रंग बन कर आता है।

बुरा न मानो होली है

आज से करीब सात दशक पहले अंग्रेजों के जमाने में भी होली की धूम मचा करती थी। अंग्रेज और उनके परिवार वाले भी कुछ कोठी वालों के घर होली का पर्व देखने जाया करते थे। उस समय इस मौके पर फाग के आयोजन हुआ करते थे। लोग बिंदास होकर होली पर एक दूसरे से हंसी ठिठोली किया करते थे। खारी बावली के पास चार क्लब हुआ करते थे। सभी व्यापारी उस क्लब में जमा हुआ करते थे। चांदनी चौक में माल ढोने के लिए पहले बैल गाड़ियां चला करती थी। उन बैलों के लिए हौदी हुआ करती।

होली के दिन सभी को उसी हौदी में डाला जाता था। यह नजारा अंग्रेजों को भी चकित करता था लेकिन वो कुछ कहते नहीं थे। पहले चांदनी चौक के दरीबों में काफी रौनक रहा करती थी। लोग एक दूसरे को आवाज लगा कर नीचे बुला लेते थे। घर छोटे से ही थे, लेकिन घरों के आंगन में रंग जमा करता था। बड़े बुजुर्गो से आशीर्वाद लिया करते थे। चंदन का टीका लगाकर लोग रहते थे, वे एक दूसरे के घर में जाया करते थे। हर दरीबे में से होलियारों की टोली निकलती थी। ढोल मंजीरे के साथ लोग एक दूसरे के घर में होली की बधाई देने जाते थे। एक महीने पहले से ही होली की रंगत सड़कों पर नजर आने लगती थी। उस समय कोई बुरा नहीं मनाता था और न ही फुहड़ता थी। लोगों में बड़े और छोटे का लिहाज था। रिश्तों में भी गर्माहट हुआ करती थी। साठ साल पहले की होली के रंग आज थोड़े फीके जरूर हुए हैं। आज तो होली के एक दिन पहले ही इसकी रंगत नजर आती है। शुक्र है कि होली के दिन लोग एक दूसरे से गले मिल कर रंग लगाते हैं। क्योंकि यह त्योहार तो आपसी भाईचारे को बढ़ाता है, रिश्तों को प्रगाढ़ करता है। बेटियां और जमाई को घर बुलाया जाता है। पूरा परिवार एक छत के नीचे जमा होता है।

लोग ढूंढते रह जाते थे टोपी

होली का त्योहार पुरानी दिल्ली में अब भी हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। लेकिन अब हंसी ठिठोली नहीं होती। पहले बच्चे होली के दिन हुड़दंग मचाते थे। गली में जाकर जगह-जगह एक रुपये का सिक्का दबा देते थे और छुप जाया करते थे, जैसी ही कोई उसे निकालने की कोशिश करता उसे पकड़ लेते थे। उस आदमी के चेहरे के उड़े हुए रंग को देखकर सब हंसते थे। लेकिन वो भी टोली में शामिल होकर इस खेल का आनंद लेता। होली के आने के कुछ दिन पहले से ही बच्चे छतों पर रहने लगते थे। पहले बिजली के तारों में फंसाने के लिए फांस हुआ करती थी, उसी फांस से राहगीरों के सिर से टोपी उतार ली जाती थी। इस खेल में भी काफी सफाई चाहिए होती थी, जिसको टोपी उतरे जाने का आभास भी नहीं होता था उस व्यक्ति को इनाम भी दिया जाता था। पहले सराफा बाजार में भांग का ठेका हुआ करता था। होली के दिन इस स्थान पर भारी भीड़ हुआ करती थी। गली गली में भांग की कुल्फी मिला करती थी, वो अब भी मिलती है लेकिन छुप-छुपा कर।

आब-ए-पाशी का रहता था इंतजार .

मुगलों के समय में सबसे अच्छी बात यह रही कि उन्होंने भारतीय संस्कृति के साथ कोई छेड़खानी नहीं की। आम आदमी की जिंदगी और तीज त्योहारों में वे भी शरीक होते थे। बादशाह अकबर ने तो हंिदूू लड़की से शादी की थी इसलिए भी वे सभी त्योहार मनाया करते थे, लेकिन बाकी सभी बादशाहों ने भी होली के त्योहार को मनाया। अकबर, हुमायू, जहांगीर, शाहजहां और बहादुरशाह जफर इन सभी बादशाहों ने होली के उत्सव को बढ़चढ़ कर मनाया है। रंगोत्सव की तैयारियां की। एलेक्स रुथर फोर्ड की किताब की पांच वॉल्यूम में बादशाहों की होली का भी जिक्र आता है। पांचों मुगल बादशाहों ने होली के मौके पर हिन्दुओं के पर्व में शिरकत की। बहादुर शाह जफर तो खुद शायर थे और वे फाग गाया करते थे। अकबर के महल में सोने चांदी के बड़े-बड़े बर्तनों में केवड़े और केसर में टेसू का रंग घोला जाता था और राजा अपनी बेगम और हरम (रानियों का एकांत) की सुंदरियों के साथ होली खेलते थे।

बहादुरशाह जफर होली खेलने के बहुत शौकीन थे और होली को लेकर उनकी सरस काव्य रचनाएं आज तक सराही जाती हैं। मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के बारे में प्रसिद्ध है कि होली पर उनके मंत्री उन्हें रंग लगाने जाया करते थे। आब-ए-पाशी (रंगों की बौछार) का नाम दिया जाता था होली को। मुगल काल में होली के किस्से आज भी सुनाए जाते हैं। अकबर का जोधाबाई के साथ, जहांगीर का नूरजहां के साथ होली खेलने का जिक्र मिलता है। अलवर संग्रहालय के एक चित्र में जहांगीर को होली खेलते हुए दिखाया गया है। शाहजहां के समय तक होली खेलने का मुगलिया अंदाज ही बदल गया था। इतिहास में वर्णन है कि शाहजहां के जमाने में होली को ईद-ए-गुलाबी कहा जाता था।

Posted By: Preeti jha

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