अहमदाबाद की ओल्ड सिटी की हैरिटेज वॉक के बारे में सुना था, पर खास जानकारी नहीं थी। वहां पहुंचकर जब इसके बारे में गुजरात टूरिज्म की कमीश्नर जेनू दीवान में बताया तो मैंने वहां जाने की इच्छा प्रकट की। तब न सिर्फ सारे इंतजाम कराए, वरन साथ में टूरिस्ट गाइड भैरोंनाथ जी को भी मेरे साथ भेज दिया। ढाई घंटे की इस यात्रा के लिए शहर की गलियों से होकर ही गुजरना पड़ता है। सुबह सात बजे का समय इसके लिए ठीक रहता है, क्योंकि उस समय दुकानें बंद रहती हैं। हां, एक जगह फाफड़ा बनते अवश्य देखा।

स्वामीनारायण मंदिर से हुई शुरुआत

इस रोचक यात्रा का आरंभ करने के बाद ढाई घंटे तक पैदल चलते हुए जरा सी भी थकान महसूस नहीं हुई। शुरुआत कालूपुर स्थित स्वामीनारायण मंदिर से होती है, जो इस शहर के ठीक बीचोंबीच स्थित है। यह स्वामीनारायण संप्रदाय का पहला मंदिर है, जिसका निर्माण सन् 1822 के आसपास हुआ था। जब यह बन रहा तो अंग्रेज इस मंदिर को देख बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने इस मंदिर का विस्तार करने के लिए और भूमि दी। तब स्वामीनारायण संप्रदाय के लोगों ने उनका आभार प्रकट करने के लिए इसके वास्तुशिल्प में औपनिवेशिक शैली का प्रयोग किया। पूरी इमारत ईंटों से बनी है। मंदिर में बर्मा टीक से नक्काशी की गई है और हर मेहराब को चमकीले रंगों से रंगा गया है। हर स्तंभ में लकड़ी की नक्काशी है और जो आज तक कायम है। खुद भगवान स्वामीनारायण ने श्री नरनारायण देव की मूर्तियां यहां स्थापित की थी। इसमें हनुमान और गणेश की विशाल व बहुत ही सुंदर मूर्तियां प्रवेश करते ही दायीं-बायीं ओर लगी हुई हैं। निकटवर्ती हवेली में, महिलाओं के लिए एक विशेष खंड है, और एक ऐसा क्षेत्र है, जहां केवल महिलाओं के लिए समारोह और शिक्षण सत्र आयोजित किए जाते हैं। मंदिर के एक हिस्से से ही महिलाएं पूजा कर सकती हैं। यहां पांच बार पूजा होती है, पांच बार भगवान के कपड़े बदले जाते हैं।

चबूतरों का आकर्षण

गाइड फिर एक पक्षियों के चबूतरे पर आकर रुका। ओल्ड सिटी में हर पोल में एक चबूतरा है और यहां 500-600 चबूतरे (पक्षियों को दाना डालने के स्तंभ या मीनार) हैं। गुजराती हमेशा जैन धर्म से प्रभावित रहे हैं और वे छोटे जीव तक को भी नहीं मारते। जब पेड़ों की कमी होने लगी तो उन्होंने सोचा कि पक्षियों के लिए दाने डालने के लिए चबूतरे बनाए जाएं। हर चबूतरे में पक्षियों को दाना डालने की जगह बनी हुई है। ये चबूतरे कुछ-कुछ पेड़ों की तरह ही लगते हैं।

पोल यानि रिहायशी मोहल्ले

सारे पोल जाति, धर्म व व्यवसाय के आधार पर विभाजित हैं या फिर इन तीनों के सम्मिश्रण के आधार पर भी बनाए जाते हैं। हर पोल में 20 से 25 परिवार रहते हैं। पोल या वर्ग या समुदाय कहा जा सकता है, में एक गेट होता है, जिसे सुरक्षा के लिए रात को बंद कर दिया जाता है। पूरा समुदाय उत्सव साथ मिलाकर मनाते हैं। हर पोल दूसरे पोल से जुड़ा है। अगर कोई विपत्ति आ जाए, तो वे एक पोल से दूसरे पोल तक जा सकते हैं। इनके बीच में आज भी जुड़ाव व एकता है। 

काले रंग में राम

आगे हाजा पटेल नी पोल के कोने में है काला रामजी मंदिर। यह पहला मंदिर है, जिसमें राम की काले रूप में प्रतिमा है। राम यहां बैठे मुद्रा में हैं वरना हर जगह खड़े होते हैं। एकांतवास के समय जब उन्होंने ध्यान किया था इसमें दर्शाया गया था। उनके साथ माता सीता और लक्षमण की भी काले रंग में ही मूर्तियां हैं। 

सुमन बाजपेयी

Posted By: Priyanka Singh

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