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आज जहां गुरुद्वारा, कभी था वहां राजपूत राजा का आलीशान महल, ऐसे पड़ा ‘बंगला साहिब’ नाम

Published: Sun, 20 Sep 2026 01:18 PM (IST)

दिल्ली के सेंटर में स्थित गुरुद्वारा बंगला साहिब, पहले महाराजा जय सिंह का महल हुआ करता था।

गुरुद्वारा बंगला साहिब का राजपूत राजा से है नाता (Image Source: AI Generated)

गुरुद्वारा बंगला साहिब का राजपूत राजा से है नाता (Image Source: AI Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। देश की राजधानी दिल्ली के सेंटर में एक महशूर गुरुद्वारा है, जिसका नाम बंगला साहिब है। जहां आने के लिए लोग किसी खास मौके या त्योहार की राह नहीं तकते, यही वजह है कि पूरे साल यहां भीड़ देखने को मिलती है। 

पर कभी आपने सोचा है कि इस गुरुद्वारे के नाम में सिक्खों के किसी गुरु का नाम न होकर इसे बंगला साहिब क्यों कहते हैं? चलिए आज आज गुरुद्वारे के इसी दिलचस्प इतिहास को जानते हैं। 

गुरुद्वारा बंगला साहिब का राजपूत राजा से है नाता 

गुरुद्वारा बंगला साहिब नई दिल्ली के कनॉट प्लेस इलाके में अशोक रोड और बाबा खडग सिंह मार्ग पर स्थित है। इतिहास में इस स्थान पर पहले कोई गुरुद्वारा नहीं था, बल्कि जयपुर के महाराजा मिर्जा राजा जय सिंह का महल हुआ करता था। जिसे उस दौर में 'जयसिंहपुरा पैलेस' के नाम से भी जाना जाता था। 

कहते हैं कि जब साल 1664 में राजधानी हैजा और चेचक की चपेट में आई, तब श्री गुरु हरकृष्ण साहिब जी राजा जय सिंह के महल में ठहरे थे। इस महल में रहकर गुरु ने जात-पात का भेद भूलकर सभी महामारी से पीड़ित लोगों की खूब सेवा की थी। उन्होंने महल के कुएं से ताजा पानी देकर लोगों की तबीयत में सुधार किया। 

खुद हुए चेचक से पीड़ित 

गुरु हरकृष्ण साहिब जी ने लोगों को तो ठीक कर दिया, पर इस सेवा के चलते वो खुद चेचक से पीड़ित हो गए। फिर 30 मार्च 1664 को वो खुद ज्योति ज्योत समा गए। उन्हीं की याद में सम्मान देते हुए महाराजा जी सिंह ने इस महल को सिख संगत को समर्पित कर दिया था। 

महाराजा ने इस कुएं से एक छोटा तालाब भी बनवाया था, जिससे आज यह मान्यता जुड़ी हुई है कि इस पानी में बीमारियां ठीक करने की अद्भुत शक्ति है। इसी वजह से लोग आज भी इस तालाब का जल भरकर अपने घर ले जाते हैं। 

महल के नाम पर ही पड़ा गुरुद्वारे का नाम 

वैसे तो यह गुरुद्वारा सिखों के आठवें गुरु श्री गुरु हरकृष्ण साहिब जी को समर्पित है, पर इसका नाम इसके इतिहास जुड़ा हुआ है। अब क्योंकि यह गुरुद्वारा पहले एक आलीशान महल हुआ करता था, ऐसे में इसका नाम ‘बंगला साहिब’ भी इसी से मिलता-जुलता रखा गया। 

नहीं बंद होते कभी गुरुद्वारे के कपाट 

इस गुरुद्वारे की खास बात यह है कि यह सातों दिन खुला रहता है, यानी इसके कपाट कभी भी बंद नहीं होते। वहीं, इस जगह से कभी कोई भूखा नहीं जाता क्योंकि इस गुरुद्वारे में 24 घंटे लंगर चलता है।