बेटी को खोने के गम में राजा ने दान कर दिया अपना राजमहल! जानिए कैसे बनी एशिया की पहली संगीत यूनिवर्सिटी
1881 में बना कमल विलास पैलेस कभी खैरागढ़ राजपरिवार का राजमहल था, जो आज छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध राजकुमारी इंदिरा सिंह ...और पढ़ें

145 साल पुराना महल कैसे बन गया सुरों का साधना केंद्र? (Image Source: Instagram)
HighLights
राजा ने बेटी इंदिरा की याद में महल दान किया
1956 में एशिया का पहला संगीत विश्वविद्यालय बना
लता मंगेशकर सहित कई दिग्गजों का जुड़ाव रहा
विक्रम बाजपेयी , राजनांदगांव। तबले की दयान और डुग्गी पर पड़ती थाप से निकल रही संगीत ध्वनि 145 वर्ष पुरानी दीवारों को लांघते हुए जब कानों में पड़ती है तो अनायास ही मन वायु के वेग में सुरों के साथ सफर करने लगता है। कुछ दूर चलकर यह ध्वनियां आकार और सरगम के अभ्यास के सुर के साथ मिल जाती हैं। राजकुमारी इंदिरा सिंह कला संगीत विश्वविद्यालय परिसर की हर सुबह संगीत के सर्वानंद से परिपूर्ण होती है। 70 वर्षों से अपने भीतर संगीत समेटता आ रहा यह महल अब स्वयं जीवंत संगीत में परिवर्तित हो चुका है।
छत्तीसगढ़ के खैरागढ़-छुईखदान-गंडई जिले के छोटे से नगर खैरागढ़ में संगीत की यह सुरमयी दुनिया बसी है। जिसके परिसर में स्थापित राजा वीरेंद्र बहादुर सिंह और रानी पद्मावती देवी की प्रतिमाएं मानो स्वयं इस कहानी को बताना चाहती हों। आज का राजकुमारी इंदिरा सिंह कला संगीत विश्वविद्यालय जिस परिसर में संचालित है, वह वर्ष 1956 से पूर्व खैरागढ़ राजपरिवार का राजमहल कमल विलास पैलेस (निर्माण: वर्ष 1881) हुआ करता था। इसी पैलेस में राजा-रानी की तीसरी पुत्री इंदिरा की किलकारियां गूंजीं और उनके मीठे स्वर भी। किंतु चार वर्ष की अल्पायु में इंदिरा की मृत्यु हो गई। राजपरिवार इस शोक में डूब गया। राजकुमारी की स्मृतियां सहेजने को राजा-रानी ने संगीत विश्वविद्यालय स्थापित करने का विचार किया।
केंद्रीय विश्वविद्यालय बनाने के प्रयास
वर्तमान कुलपति प्रोफेसर डॉ. लवली शर्मा विश्वविद्यालय के विस्तार के लिए काम कर रही हैं। अब इसे केंद्रीय विश्वविद्यालय बनाने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। ग्रेडिंग सुधार के लिए नवीन कोर्स संचालन किया जा रहा है। प्रोफेसर राजन यादव बताते हैं, 'पूरे देश के लगभग सभी प्रतिष्ठित संस्थानों में आज इस विवि से पढ़कर निकले विद्यार्थी अपनी सेवाएं दे रहे हैं। इसके अतिरिक्त फिल्म इंडस्ट्री और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अलग-अलग तरह की भूमिकाएं निभा रहे हैं।' 2016 से विवि से जुड़े बिहार के छपरा जिले के निवासी और गायन विभाग में सहायक प्राध्यापक पंडित दिवाकर कश्यप मानते हैं कि यह भारतीय कला-संगीत की समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ा रहा है।
सुर साम्राज्ञी को भी मिली उपाधि
विवि के संग्रहालय के छोटे से कक्ष में राजपरिवार के 13-14वीं शताब्दी के प्राचीन वाद्ययंत्र आज भी सुरक्षित हैं। विवि की स्थापना के समय राजपरिवार ने इन्हें दान किया था। प्रो. राजन यादव के अनुसार, इनमें पंचमुखी वाद्ययंत्र, रुद्रवीणा सहित कई यंत्र शामिल हैं, जो कभी राजदरबार की शोभा बढ़ाते थे। स्वर कोकिला स्व. लता मंगेशकर का विवि से गहरा जुड़ाव रहा। वे इसे संगीत व कला का गुरुकुल मानती थीं। दो फरवरी, 1980 को उन्होंने यहां आकर डी.लिट. की मानद उपाधि ग्रहण की। पं. रविशंकर, पं. भीमसेन जोशी, एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी, सय्यद हैदर रजा, उस्ताद अमजद अली खां, बिरजू महाराज, तीजन बाई जैसी विभूतियों का भी यहां से जुड़ाव रहा। इसलिए इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय को ‘कलातीर्थ’ कहा जाने लगा।
13,000 छात्रों व शोधार्थियों का परिवार
इस तरह अस्तित्व में आई संगीत की यह दुनिया आज 13,000 छात्रों व शोधार्थियों का परिवार है, जिसमें कई अन्य देशों के विद्यार्थी भी शामिल हैं। यहां पांच संकाय और 20 विभाग हैं। संगीत, नृत्य, लोक संगीत एवं कला के अलावा कला और दृश्य कला संकाय भी इसमें शामिल हैं। वर्तमान में वियतनाम, फिजी, नेपाल, मारीशस, बांग्लादेश, दक्षिण अफ्रीका और श्रीलंका के 42 विद्यार्थी एवं शोधार्थी यहां अध्ययनरत हैं। 10 वर्षों से यहां खैरागढ़ महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। इन आयोजन में अंतरराष्ट्रीय ख्याति के कलाकार शामिल हुए हैं, जिनमें पार्श्वगायिका कविता कृष्णमूर्ति, फिल्मकार-अभिनेता व संगीतकार पीयूष मिश्रा प्रसिद्ध सरोद वादक शिराज अली खान और तबला वादक आर्चिक बनर्जी ने यहां शानदार प्रस्तुतियां दी हैं। इसके अलावा कई विदेशी कलाकार भी शामिल होते रहे हैं।
पंडित रविशंकर शुक्ल की बड़ी भूमिका
राजा वीरेंद्र बहादुर सिंह की पोती उज्जवला सिंह बताती हैं, 'वर्ष 1944 में संगीत विद्यालय के रूप में इसकी शुरुआत हुई। विवि की स्थापना में स्वतंत्र भारत में मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल की बड़ी भूमिका रही। उन्होंने ही राजा वीरेंद्र बहादुर इसे संगीत विवि बनाने का प्रस्ताव दिया। उन्होंने इसके लिए परिसर की आवश्यकता बताई तो राज परिवार ने कमल विलास पैलेस दान करने का निर्णय लिया। महल दान करने से पहले राजा साहब ने दून स्कूल में पढ़ रहे अपने दोनों बेटों रविंद्र बहादुर और शिवेंद्र बहादुर से सहमति मांगने के लिए बुलाया, जो तब सिर्फ 16 और 14 वर्ष के थे। दोनों राजकुमारों ने बगैर किसी प्रश्न के हां में उत्तर दिया, जिसके बाद 14 अक्टूबर, 1956 को इस महल में अधिकृत रूप से इंदिरा संगीत विश्वविद्यालय की शुरुआत हुई और यह एशिया महाद्वीप का पहला संगीत विश्वविद्यालय बना।'
