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बच्चों को ऑलराउंडर बनाने की होड़ में कहीं उनका बचपन तो नहीं छीन रहे? पेरेंटिंग कोच ने समझाई जरूरी बात

Published: Sun, 01 Nov 2026 10:58 AM (IST)

माता-पिता की आकांक्षाओं का बोझ इतना बढ़ता जा रहा है कि खो रहा है बचपन। इतनी सारी कोचिंग और एक्टिविटी ...और पढ़ें

बचपन पर बढ़ता बोझ (Image Source: AI-Generated)

बचपन पर बढ़ता बोझ (Image Source: AI-Generated)

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समय कम है?

जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

संक्षेप में पढ़ें

अंबिका अग्रवाल, नई दिल्ली। गुरुग्राम के संपन्न इलाके में रहने वाले शशांक अब नहीं चाहते कि उनका बेटा अक्षत सिर्फ एबेकस क्लास में जाए। कोडिंग तो उसके स्कूल में सिखा ही रहे हैं। शशांक का मानना है कि अक्षत इस सबके साथ ही साफ्ट स्किल व कम्यूनिकेशन स्किल भी सीखे। 11 साल का अक्षत टेबल मैनर्स क्लास भी जा रहा है। शशांक कहते हैं कि इससे अक्षत समय से पहले ही लोगों के बीच उठने-बैठने, बात करने और खाने-पीने से जुड़े सलीके सीख जाएगा।

बच्चे के लिए रोबोटिक्स, स्विमिंग, चेस या अन्य स्पोर्ट्स जैसी दिनभर की गतिविधियां क्या कम थीं कि अब बच्चे को लोगों के बीच उठने-बैठने का यह 'सलीका' भी क्लासेज में सीखना पड़ रहा है। मानो बच्चा अगले ही दिन से कारपोरेट लाइफ जीने लगेगा। आज बच्चे सुबह की पहली किरण से लेकर रात की नींद तक एक तयशुदा चक्रव्यूह में उलझे हुए हैं। स्कूल, फिर ट्यूशन, उसके बाद तमाम तरह की कक्षाएं बच्चों को दिनभर इतना व्यस्त रखती हैं कि वे समझ ही नहीं पाते कि इतना तनाव आखिर उन्हें मिल क्यों रहा है!

टूट न जाए नन्हा घरौंदा

माता-पिता की मंशा बिल्कुल साफ होती है, वे बच्चे को भविष्य की हर प्रतियोगिता में सबसे आगे देखना चाहते हैं। आज के 8-10 साल के बच्चे की दिनचर्या किसी बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी के सीईओ के शेड्यूल जैसी नजर आने लगी है। हर सेकेंड का हिसाब, हर घंटे का नया टारगेट और सिर पर सिर्फ एक ही धुन-‘आगे निकलना है!’ लेकिन इस अंधी दौड़ में यह भूल जाते हैं कि बच्चा कोई मशीन नहीं, बल्कि कच्ची मिट्टी है जिसे प्यार, समय और सुकून की जरूरत होती है। इस अति-व्यस्तता का परिणाम यह है कि बच्चे अभी से उस मानसिक तनाव और दबाव को झेलने लगे हैं, जो बमुश्किल वयस्क लोग अपनी कारपोरेट नौकरियों में महसूस करते हैं।

उम्र से छोटी हों उम्मीदें

माता-पिता की अपने बच्चों से अपेक्षा रखने में कोई बुराई नहीं है। वे बस यही तो चाहते हैं कि आने वाले कल में उनका बच्चा हर क्षेत्र में सफल रहे। कभी सोचा है कि इस 'परफेक्ट फ्यूचर' को गढ़ने की होड़ में कहीं बच्चों का 'आज' तो नहीं छीन रहे? बच्चे आज उसी 'बर्नआउट' और मानसिक तनाव का शिकार हो रहे हैं, जो 30-35 वर्ष के कारपोरेट प्रोफेशनल्स में देखने को मिलता है। इसलिए जरूरी है कि आपकी उम्मीद बच्चों की उम्र, बुद्धिमत्ता और रुचि के हिसाब से हो। हर बच्चे का कौशल अलग होता है और वह किस परिस्थिति में उभर जाए, यह कोई नहीं जानता। इसलिए आप बच्चे पर उतना ही जोर लगाएं, जितने में बच्चे का भविष्य सही राह पर रहे, न कि वह टूट जाए।

ऐसे पहचानें रेड फ्लैग

  • छोटी-छोटी बातों पर झल्लाना, चिल्लाना या बात-बात पर जिद करना। अगर बच्चा हर नई एक्टिविटी क्लास जाने से पहले बहाने बनाने लगे।
  • जब दिमाग लगातार तनाव में रहता है, तो शरीर 'सोमैटिक सिम्टम्स' के जरिए प्रतिक्रिया देता है। यानी रिपोर्ट बिल्कुल ठीक मगर सिर या पेट में दर्द की शिकायत।
  • रात को देर तक नींद न आना, सोते समय चौंक जाना या सुबह उठते ही थका हुआ महसूस करना।
  • अगर मेरा परफार्मेंस सबसे अच्छा नहीं हुआ तो क्या होगा? ऐसे डर बच्चे के मन में घर कर जाते हैं। वह हारने या पीछे छूटने का सोचकर ही घबराने लगे। 'मुझसे नहीं होगा' या 'मैं इसमें परफेक्ट नहीं हूं' जैसी बातें बार-बार दोहराने लगे।

ऐसे लौटाएं बचपन का सुकून

जैसे बड़ी-बड़ी कंपनियों में क्रिएटिविटी के लिए ब्रेक जरूरी होता है, वैसे ही बच्चे के दिन में कम से कम 1-2 घंटे ऐसे होने चाहिए जब उसे कुछ भी न करने की पूरी छूट हो।

  • अगर हफ्ते के सातों दिन किसी न किसी क्लास से भरे हैं, तो तुरंत 1 या 2 गैर-जरूरी एक्टिविटीज को कम करें।
  • इस बात को समझें कि स्ट्रक्चर्ड कोचिंग (जहां कोई कोच निर्देश दे रहा हो) और 'फ्री-प्ले' (जहां बच्चा अपनी मर्जी से पार्क में दोस्तों के साथ दौड़-भाग करे) में जमीन-आसमान का अंतर है। खेल और आराम को किसी भी कोचिंग क्लास से कम न समझें।
  • बच्चे से रोज जरूर पूछें कि आज तुम्हें किस बात पर सबसे ज्यादा मजा आया? बच्चे को यह महसूस कराएं कि आपका प्यार उसकी परफार्मेंस या किसी सर्टिफिकेट का मोहताज नहीं है।
  • भविष्य की सुरक्षा के चक्कर में आज के वर्तमान को न छीनें। याद रखिए, एक तनावमुक्त, हंसता-खेलता और खुशहाल बचपन ही भविष्य की सबसे मजबूत नींव बनता है।

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