अनंत विजय। स्वाधीनता का आंदोलन जब अपने चरम की ओर बढ़ रहा था तब अंग्रेजों ने भारत में संवैधानिक सुधारों के लिए ब्रिटिश संसद के सदस्यों की एक कमेटी जान साइमन की अध्यक्षता में भेजी थी, जिसको साइमन कमीशन के नाम से जाना जाता है। ये वर्ष 1928 था। साइमन कमीशन का पूरे देश में काफी विरोध हुआ था। एक आठ साल की बच्ची, जिसके पिता ब्रिटिश राज में जज थे, भी साइमन कमीशन के विरोध में आंदोलन में कूद पड़ी थी। उसके पिता बहुत नाराज हुए, कई तरह की पाबंदियां लगाने की कोशिश की, लेकिन वो बच्ची नहीं मानी। जज साहब का नाम था हरिप्रसाद मेहता और उनकी बेटी का नाम था उषा मेहता। कौन जानता था कि जिस आठ साल की बच्ची ने साइमन कमीशन का विरोध किया था वह बड़ी होकर स्वाधीनता की लड़ाई में एक नया आयाम जोड़ देगी।

गुजरात में आरंभिक पढ़ाई करने के बाद उषा मेहता बांबे (अब मुंबई) के विल्सन कालेज में आ गई थीं। उषा की आंखों में एक अलग ही सपना था। जब गांधी जी ने नौ अगस्त, 1942 को मुंबई में अंग्रेजों भारत छोड़ो का आह्वान किया उस वक्त उषा मेहता ने अपनी पढ़ाई छोड़ दी और आजादी के आंदोलन में सक्रिय हो गईं। भारत छोड़ो आंदोलन के आह्वान के बाद गांधी जी समेत कई कांग्रेसी नेता गिरफ्तार कर लिए गए। कुछ युवा नेता इस आंदोलन की अलख जगा रहे थे, लेकिन उनकी आवाज जनता तक नहीं पहुंच पा रही थी और वे बापू के संदेश को पूरे देश में पहुंचाने के लिए प्रयत्न कर रहे थे।

संदेश पहुंचाने की इसी बेचैनी में बांबे में कुछ युवाओं ने एक बैठक की जिसमें उषा मेहता, विट्ठलदास झवेरी के अलावा नरीमन अबराबाद प्रिंटर भी शामिल थे। इस मीटिंग में भारत छोड़ो का संदेश वृहत्तर जनसमुदाय तक पहुंचाने के लक्ष्य पर चर्चा हो रही थी। आरंभ में ये लोग समाचार पत्र निकालने पर चर्चा कर रहे थे और लगभग तय हो गया था कि एक अखबार निकाला जाए। पुस्तकों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि उषा मेहता ने बैठक में अखबारों को लेकर अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों की चर्चा की। फिर विकल्प पर विचार आरंभ हुआ। उषा मेहता ने रेडियो की चर्चा की तो सबका ध्यान नरीमन प्रिंटर की ओर गया।

कुछ ही समय पहले नरीमन ब्रिटेन से रेडियो की तकनीक सीखकर भारत लौटे थे। थोड़ी देर बाद तय हुआ कि स्वाधीनता के विचार को जनता तक पहुंचाने के लिए गुप्त रेडियो आरंभ किया जाए। उषा मेहता को समाचार पढ़ने की जिम्मेदारी दी गई। नरीमन और उषा मेहता ने साथ मिलकर पुराने ट्रांसमीटरों को जोड़कर गुप्त रेडियो सेवा आरंभ की। कहा जाता है कि पुराने ट्रांसमीटर आदि जुटाने में शिकागो रेडियो के उस समय के मालिक ननका मोटवाणी ने इन युवाओं की मदद की थी। हौसले को पंख लगते देर नहीं लगी और 14 अगस्त, 1942 को किसी अज्ञात स्थान पर इस गुप्त रेडियो की स्थापना की गई। पहला प्रसारण हुआ। उषा मेहता की आवाज गूंजी, ये कांग्रेस की रेडियो सेवा है, जो भारत के किसी हिस्से से प्रसारित की जा रही है। इस पहले प्रसारण में उषा मेहता ने रेडियो की फ्रीक्वेंसी भी बताई थी।

गुप्त रेडियो के प्रसारण से अंग्रेजों के कान खड़े हो गए। उन्होंने इसके बारे में पता लगाना आरंभ कर दिया। गुप्त रेडियो के प्रसारणकर्ता एक प्रसारण के बाद जगह बदल देते थे। इस पर गांधी के विचारों का प्रसारण भी होने लगा। अंग्रेजों की परेशानी बढ़ने लगी और उन्होंने खोजबीन तेज कर दी। आखिरकार तीन महीने से कुछ अधिक समय बाद अंग्रेजों ने नवंबर 1942 में प्रसारण स्थान का पता लगा लिया और उषा मेहता को साथियों समेत गिरफ्तार कर लिया गया। मुकदमा चला और उनको चार साल की जेल की सजा हुई।

इस गुप्त रेडियो का प्रसारण तीन महीने ही हुआ, लेकिन इन तीन महीनों में उषा मेहता ने अपने प्रसारण से जनता को जागरूक करने का कार्य किया और युवाओं में ये विश्वास भी भर दिया कि स्वाधीनता के आंदोलन में तकनीक का सहारा लिया जा सकता है। वर्ष 1946 में जेल से उनकी रिहाई हुई। उषा मेहता का योगदान इस मायने में विशिष्ट है कि उन्होंने उस समय तकनीक का सहारा लिया जब इसके बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था। स्वाधीनता के बाद उषा मेहता ने बांबे यूनिवर्सिटी से जुड़कर शिक्षा के क्षेत्र में कार्य किया। 25 मार्च, 1920 को सूरत के पास एक गांव में जन्मी उषा मेहता का निधन अस्सी वर्ष की उम्र में वर्ष 2000 में हुआ।

Edited By: Sanjay Pokhriyal