सुनील त्रिवेदी। वर्ष 1799 में हुई श्रीरंगपटनम की लड़ाई में फ्रांस की सहायता लेने वाले टीपू सुल्तान की पराजय और मृत्यु के बाद यह तय हो गया कि अंग्रेजों की ताकत फ्रांसीसियों के मुकाबले अधिक हो गई है। उस विजय के परिणामस्वरूप विश्व में अपने वर्चस्व को प्रदर्शित करने के लिए अंग्रेजों ने कोलकाता में अत्यंत विशाल, भव्य और आकर्षक गर्वमेंट हाउस का निर्माण किया। वह भवन आजकल पश्चिम बंगाल का राजभवन है। वर्ष 1803 में कोलकाता के गवर्नमेंट हाउस का उद्घाटन समारोह आयोजित किया गया। उसे तब तक के इतिहास का सबसे शानदार समारोह माना जाता है। तत्कालीन विश्व समुदाय चकित था कि उस गर्वमेंट हाउस की भव्यता लंदन के बकिंघम पैलेस से भी बढ़कर थी।

उसके लगभग 110 साल बाद वर्ष 1911 में जब कोलकाता के स्थान पर दिल्ली को ब्रिटिश भारत की राजधानी बनाने की घोषणा की गई, तब ब्रिटिश साम्राज्य अपने चरम उत्कर्ष पर था। उस समय ब्रिटिश शासन में कभी सूर्यास्त नहीं होता था। अत: दिल्ली में बनने वाले वायसराय हाउस की परिकल्पना करते समय यह ध्यान रखा गया कि नया भवन विश्व में सर्वश्रेष्ठ तो हो ही, उसकी भव्यता देखने वालों को आश्चर्यचकित कर दे। यह स्पष्ट है कि वायसराय हाउस (राष्ट्रपति भवन) की रूपरेखा बनाते समय सांची के स्तूप का लट्येंस पर गहरा प्रभाव था, यद्यपि लट्येंस ने इस प्रभाव का कहीं जिक्र नहीं किया।

किसी भी भवन का गुंबद ही उसका मुख्य आकर्षण होता है। राष्ट्रपति भवन के ऊंचे और भव्य गुंबद की सांची स्तूप से हूबहू समानता स्पष्ट करने के लिए लट्येंस के समकालीन कला समीक्षक व यात्रा वृत्तांतों के प्रसिद्ध लेखक राबर्ट बायरन ने लिखा है कि वायसराय हाउस (राष्ट्रपति भवन) के गुंबद को देखकर ऐसा लगता है मानो ‘लट्येंस ने सांची स्तूप की काया को जमीन से उठाया और आसमान में रख दिया।’ राष्ट्रपति भवन के गुंबद के आधार के चारों ओर सांची स्तूप परिसर की चहारदीवारी की अनुकृति निर्मित है। लट्येंस के रेखाचित्रों में भी ‘सांची ग्रिल’ यह शब्द लिखे हुए हैं। इस प्रकार, लगभग 2000 साल पहले भगवान बुद्ध की स्मृति में बना सांची स्तूप अंग्रेजों द्वारा निर्मित वायसराय हाउस यानी राष्ट्रपति भवन की मुखाकृति बन गया।

विश्व के प्राचीनतम गणराज्यों में लोगों को शिक्षा देने वाले भगवान बुद्ध की स्मृति में निर्मित सांची स्तूप की बनावट, विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत के सबसे महत्वपूर्ण भवन की पहचान है। लट्येंस ने राष्ट्रपति भवन के स्तंभों के ऊपर ‘इनवर्टेड लोटस’ यानी उल्टे कमल की आकृति का उपयोग किया है। भवन के प्रवेश द्वार से लेकर भीतर तक हाथी की आकृतियां देखने को मिलती हैं। साथ ही, भारतीय शैली में गढ़े गए पत्थर के छोटे-छोटे सुंदर घंटे लटके दिखाई देते हैं, मानों वे कभी भी हवा के झोंकों से बज उठेंगे।

इस प्रकार, लट्येंस ने भारतीय तत्वों को पूरी तरह अपनाया, भले ही उसने इस तथ्य की स्वीकारोक्ति से परहेज किया हो। बौद्ध कलाकृतियों और प्रतीकों को स्वाधीनता के पहले भी भवन की साज-सज्जा में कुछ हद तक शामिल किया गया था। विश्व की सबसे सुंदर भित्ति-चित्रकला के रूप में प्रशंसित अजंता के भित्ति चित्रों की प्रतिकृतियां राष्ट्रपति के समिति कक्ष में 1930 से विद्यमान हैं।

स्वाधीनता हासिल करने के बाद, भवन में भारतीय संस्कृति के निरूपण को व्यापक स्तर पर बढ़ावा दिया गया। मुख्य भवन में दरबार हाल के प्रवेश द्वार पर ‘रामपुरवा बुल’ को रखा गया। यह ‘बुल’ कभी बिहार में स्थित सम्राट अशोक की एक लाट का सबसे ऊपर का हिस्सा था। दरबार हाल में राष्ट्रपति की कुर्सी के पीछे भगवान बुद्ध की लगभग 1,500 साल पुरानी एक मूर्ति रखी गई है। यह मूर्ति गुप्त काल के दौरान प्रचलित भारतीय-यूनानी मूर्तिकला का सुंदर उदाहरण है। भगवान बुद्ध के सिर के चारों ओर निर्मित प्रभामंडल, उनके मुखमंडल की शांति, आंखों में करुणा और हाथ की अभयमुद्रा का सुखद प्रभाव देखने वालों पर पड़ता है। इस प्रकार, भौतिक शक्ति तथा सांसारिक वैभव का प्रदर्शन करने के उद्देश्य से निर्मित भवन में अहिंसा, करुणा और शांति का आध्यात्मिक अनुभव होता है।

राष्ट्रपति भवन में बोधिसत्व सहस्रबाहु अवलोकितेश्वर की अत्यंत आकर्षक प्रतिमा भी है, जो भवन के दो सबसे महत्वपूर्ण कक्षों, अशोक हाल और दरबार हाल तक जाने वाली सीढ़ियों पर शोभायमान है। यह प्रतिमा वियतनाम सरकार द्वारा वर्ष 1962 में तत्कालीन राष्ट्रपति डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को उपहार में दी गई थी। आज से लगभग 2,600 वर्ष पहले, जिस पीपल के पेड़ के नीचे समाधिस्थ होकर सिद्धार्थ गौतम ने बुद्धत्व प्राप्त किया था, उसका छोटा सा पौधा मंगवाकर नवंबर 2017 में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने राष्ट्रपति भवन के एक बगीचे में लगाया। आज वह पौधा लगभग साढ़े सात फुट ऊंचा हो चुकाा है। उसके बाद वर्ष 2021 में राष्ट्रपति कोविंद ने भवन परिसर के एक उद्यान में उसी पीपल का एक और पौधा लगाया। ये पौधे भगवान बुद्ध की विरासत के साथ जीवंत संबंध के रूप में राष्ट्रपति भवन में विद्यमान रहेंगे।

राष्ट्रपति से भेंट करने वाले अधिकांश आगंतुक भवन के अग्रभाग से अंदर आते हैं और मुख्य भवन के दक्षिणी छोर को उत्तरी छोर से जोड़ने वाले लगभग 75 मीटर लंबे ‘स्टेट कारिडोर’ को पार करके राष्ट्रपति के कार्यालय तक पहुंचते हैं। स्वाधीनता के बाद इस पूरे गलियारे को पेंटिंग व कैलिग्राफी से सजाया गया। इस कारिडोर की छत और पार्श्व भाग में भारतीय संस्कृति के महत्वपूर्ण आयामों को अद्भुत चित्रकारी के जरिए दर्शाया गया है। सिंधु घाटी की सभ्यता से जुड़े चित्रों से लेकर श्रीमद्भगवद्गीता के 73 श्लोकों की देवनागरी लिपि में कलात्मक लिखावट समेत भारतीय संस्कृति की सुंदर झांकी ‘स्टेट कारिडोर’ में दिखाई देती है।

यह कहा जा सकता है कि वायसराय हाउस का निर्माण, ब्रिटेन की साम्राज्यवादी शक्ति को प्रदर्शित करने के उद्देश्य से किया गया था मगर स्वाधीनता के बाद यह भवन भारत की प्राचीन संस्कृति के साथ-साथ विश्व के सबसे बड़े आधुनिक लोकतंत्र के संवैधानिक केंद्र के रूप में भारत की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा बन गया है। इस धरोहर को देखकर सभी देशवासियों में राष्ट्र-गौरव की भावना का संचार होता है।

ओएसडी (शोध), राष्ट्रपति भवन

Edited By: Sanjay Pokhriyal