नई दिल्‍ली, जेएनएन। आप कैसे परिवेश में हैं, आपके भविष्य के निर्धारण में बहुत कुछ इसी पर निर्भर करता है। आप अपने रिश्तों के वायुमंडल से कितनी आक्सीजन ले रहे हैं, यह भी बहुत महत्वूपर्ण है। आज की पीढ़ी रिश्तों का मनोविज्ञान समझने का प्रयास नहीं करती है। श्रद्धा केस से जुड़ी खबरें, आलेख यदि आप निरंतर पढ़ते, सुनते होंगे तो आपने नोटिस किया होगा कि श्रद्धा के दोस्त बहुत कुछ जानते थे। लिव-इन में रहने वाले उसके साथी से उसके बिगड़ते रिश्तों से लेकर उसके साथ होने वाली हिंसा के बारे में भी वे बहुत कुछ जानते थे। उन्होंने मामले को संभालने का प्रयास भी किया होगा।

श्रद्धा की हत्या मई में हुई थी यानी छह माह पहले। क्या इतने लंबे समय से आप अपने करीबी दोस्त के संपर्क में नहीं हैं, यह आपको विचलित नहीं करता? आपके साथ रोज हंसने बोलने वाली लड़की आपसे छह माह से फोन से किसी तरह संपर्क में नहीं है, उसका नंबर ही नहीं लग रहा है। फिर भी आपने उसके बारे में जानने का प्रयास नहीं किया। क्योंकि हमारी मानसिकता एक उच्च स्तर की लकीर खींच चुकी है। जब तक कुछ झकझोरता नहीं, तब तक हम नहीं जागते।

टाक्सिक रिलेशनशिप

आजकल रिश्तों में एक टर्म प्रचलित है ‘टाक्सिक रिलेशनशिप’। रिश्तों को आवश्यकता होती है कपल्स थेरेपिस्ट की, क्योंकि ये जरूरतें हमने अपने संयुक्त परिवारों को खोकर खुद पैदा की हैं। हम ऐसे विशेषज्ञों के पास जाकर, अच्छी खासी जेब ढीली करके रिश्तों को थेरेपी दे सकते हैं, उसे कुछ दिन के लिए जीवित कर सकते हैं। लेकिन अपने परिवार, जड़ों में अपने स्वजन- दादा-दादी, नाना-नानी, चाचा, ताऊ और बुआ जैसे रिश्तों से नहीं सीख सकते। उनके साथ स्वजन समय व्यतीत कर जीवन के अनुभव की कहानियों से स्वयं को नहीं खड़ा कर सकते। माता-पिता का भी अपने निजी जीवन में दखल का एक दायरा तय कर देते हैं।

श्रद्धा ने भी तो घर इसीलिए छोड़ा था, क्योंकि स्वजन ने उसे सही राह दिखानी चाही थी। सोचिए एक पिता अपनी बेटी का हालचाल जानने के लिए इंटरनेट मीडिया का सहारा ले रहा था। एक मां उसकी याद में गुजर गई। स्वतंत्रता का दायरा बढ़ाते-बढ़ाते हम अपने भीतर की स्वतंत्रता, अपनी गरिमा के साथ स्वयं को ही खो रहे हैं। आज स्वयं से एक सवाल कीजिए कि रिश्तों की थेरेपी भला स्वजन से बेहतर कोई कर सकता है?

Edited By: Sanjay Pokhriyal

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