विफलता की परवाह नहीं

आसमान छूते सपने, भरपूर उम्मीदें, आत्मविश्वास, विपरीत स्थितियों में खड़े रहने का हौसला, सोशल मीडिया का भरपूर इस्तेमाल और गजब का साहस, यह सब कुछ है आज के यूथ में। बेचैनी है, जो रिस्क लेने का जबाब देती है। इन्हें विफलता की परवाह नहीं। कैसे लगा कर अपना दिल और जान, करते हैं हासिल अपना मुकाम, बता रही हैं यशा माथुर....  

रोज नया आइडिया सोचता

मेरे पास टाइम बहुत कम है। अभी मुझे बहुत कुछ करना है। समय बर्बाद कर रहा हूं। अभी तक कुछ भी ऐसा नहीं कर सका हूं जिससे मुझे सैटिस्फैक्शन मिले...। इसी बेचैनी में हर दिन अपना कोई नया लक्ष्य चुनता है यूथ। रोज नया आइडिया सोचता है और अपने काम को ऊंचाइयों पर ले जाने की निरंतर और नए ढंग से कोशिश करता है। वह एक कोलाज है, जिसमें हर रंग की तसवीर शामिल है। बॉलीवुड में पिछले तीस से भी जयादा वर्षों से सक्रिय अनुपम खेर मानते हैं कि बेचैनी क्रिएटिव होती है। युवावस्था में वे बेचैन थे, तभी बॉलीवुड में इतने साल गुजार पाए। अगर चैन से रहते तो हमेशा चैन से ही रह जाते। 

छोटी उम्र, टारगेट बड़े 

उम्र में बहुत छोटे हैं अयान चावला और उनका पद है- फाउंडर, सीईओ, एशियन फॉक्स डेवलपमेंट्स। शुरू से ही अयान को कुछ अलग कर गुजरने की बेचैनी थी। आज उनकी कई कंपनियां हैं। उन्होंने अपना टारगेट काफी पहले ही तय कर लिया था। कहते हैं अयान, 'सफलता के लिए उम्र के कोई मायने नहीं हैं। जब मैं आठ साल का था, तब मुझे पहला कंप्यूटर मिला। इस पर मैं मूवीज बनाता, उन्हें एडिट करता। एक दिन मेरे मन में उन सॉफ्टवेयर्स के बारे में जानने की इच्छा हुई, जिन पर मैं काम करता था। तेरह साल की उम्र में मैंने फेसबुक, यू-ट्यूब और नौकरी डॉट कॉम को मिला कर एक सोशल यूटिलिटी ऐप 'ग्रुप फॉर बडीज बनाया। इसमें दोस्त हर चीज शेयर कर सकते थे। लाइव विडियो डाल सकते थे। इसे जबर्दस्त रिस्पॉन्स मिला तो दो ही महीने बाद मैंने अपनी खुद की आईटी सॉल्यूशंस कंपनी 'एशियन फॉक्स डेवलपमेंट्स बना ली। इसी कॉरपोरेट के साथ एक ही साल में वेब सॉल्यूशन के लिए 'ग्लोबल वेब माउंट और मीडिया एंड मार्केटिंग सर्विसेज के लिए 'माइंड इन एडवर्टाइजि़ग कंपनीज बनाईं। अयान ने कंप्यूटर प्रोग्रामिंग की सारी लैंग्वेजेस छोटी उम्र में खुद ही सीखीं। आज वे माइक्रोसॉफ्ट, इंटेल, आईबीएम और सिस्को जैसी कंपनियों के लिए पार्टनर एंड डेवलपमेंट पार्टनर के तौर पर काम कर रहे हैं। 

 


समाज का भी है खयाल

अभिषेक कुशवाहा को भी कम उम्र से ही सामाजिक समस्याएं परेशान करने लगीं। इसी हलचल के बीच जब नवीं कक्षा में टीवी पर मेनका गांधी का कार्यक्रम देखा तो एनिमल वेलफेयर से जुड़ गए। दोस्त सागरिका देब के साथ मिलकर एक ऑनलाइन कम्युनिटी बनाई 'वी फील द पेन फॉर एनिमल्स। कहते हैं अभिषेक, 'इसमें हम लोगों को पशुओं के प्रति क्रूरता न करने के लिए जागरूक करते हैं। काफी समय से हम पशुओं के कल्याण के लिए काम कर रहे हैं। सर्दी के दिनों में मैं और मेरे दोस्त रेलवे स्टेशन पर रहने वाले बेघर लोगों को खाने-पीने और ओढऩे का सामान वितरित करते हैं। गरीबों की मदद करने की जिम्मेदारी मुझे हर व$क्त महसूस होती है। अभिषेक 'जॉय ऑफ गिविंग नाम से एक और अभियान चला रहे हैं, जिसका उद्देश्य लोगों को यह समझाना है कि दान देने से खुशी मिलती है। जंगलों को बचा कर, पेड़ लगा कर जंगली जीव-जंतुओं को बचाए रखने की मुहिम से भी वे जुड़े हैं। 

हिमालय पर किया है काम

सोशल एंटरप्रेन्योर कनिका सूद के हर शब्द में कुछ कर गुजरने का साहस टपकता है। हिमालय पर बिगड़ता पर्यावरण हमेशा से उन्हें बेचैन करता था और उन्हें लगता था कि वे कुछ करें। पढ़ाई के लिए शिमला से दिल्ली आ गईं लेकिन हिमालय से नाता नहीं तोड़ा। फिर उन्होंने कॉलेज में ही 'नीडफुल इनिशिएटिव फॉर एनवायरमेंट फाउंडेशन बनाया और ऑर्गेनिक फार्मिंग व ईको-टूरिजम को बढ़ावा देने लगीं। कनिका ने लद्दाख में पायलट प्रोजेक्ट्स चलाए। कहती हैं, 'लद्दाख में बाढ़ के बाद बन गए मैदानों में प्लांटेशन की है हमने। इससे ग्रीनेबल एंप्लॉयमेंट भी जेनरेट होता है और पहाड़ों में प्राकृतिक आपदा का खतरा भी कम हो जाता है। अपने पायलट प्रोजेक्ट के तहत हमने लद्दाख के आठ गांवों को ईको-टूरिजम के लिए प्रोत्साहित और प्रशिक्षित किया है। अब वे अपनी खाली जमीनों पर होटल न बना कर पेड़ लगा रहे हैं और टूरिस्ट्स को 'होमस्टे प्रोग्राम के तहत अपने घरों में ठहरा रहे हैं। इससे उनको दोहरा फायदा हो रहा है।

इंटरनेशनल हैं क्लाइंट्स

कुछ कर गुजरने को आतुर इस यूथ ने न केवल अपने देश में नए काम और नई सोच को जगह दी है बल्कि इंटरनेशनल क्लाइंट्स को भी अपनी प्रतिभा से कायल किया है। नोएडा में बैठ कर यूएस के क्लाइंट्स के लिए लगातार नए ऐप डेवलप कर रहे हैं रोहन। कहते हैं, 'हमारे काम को बहुत एप्रिसिएशन मिल रहा है। फाइव स्टार रेटिंग है हमारी। हम विदेश जाने के बजाय यहीं काम लेते हैं और हमारे काम का पैसा बिना किसी देरी के बैंक में क्रेडिट हो जाता है।कोई कुछ भी कहे कामयाबी की राह पर आगे बढ़ते यूथ को नाकामयाबी का डर नहीं है। कोई कुछ भी कहे, कुछ भी समझे, इसकी भी परवाह नहीं। कॉलेज से अच्छे पैकेज पर कैंपस सेलेक्शन के बाद भी कार्तिकेय ने अपने मन का काम देख कर छोटा सा स्टार्ट अप जॉइन किया है। कहते हैं, 'जिस काम में मेरा मन लगता है, वही करूंगा। पैसा तो मैं बहुत कमा लूंगा लेकिन अभी मेरा लर्निंग टाइम है।

By Shweta Mishra