नई दिल्ली [मनीषा सिंह]। अमेरिका स्थित येल यूनिवर्सिटी में इस साल शुरू किए जा रहे पाठ्यक्रम ‘मनोविज्ञान और अच्छा जीवन’ (साइकोलॉजी एंड द गुड लाइफ) में दाखिले के लिए 1,182 छात्रों ने आवेदन दिया है। येल यूनिवर्सिटी के इतिहास में पहला मौका है जब किसी एक पाठ्यक्रम के लिए इतने ज्यादा आवेदन मिले हों। खास बात यह है कि इस कोर्स में दाखिला पाने वाले अधिकतर किशोरवय या 2000 के बाद जन्मी पीढ़ी के छात्र हैं। उनकी उम्र देखते हुए यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि आखिर नौजवान पीढ़ी को ऐसे कौन-से तनावों और दबावों का सामना करना पड़ रहा है, जिसके लिए वह खुशी की खोज जैसे कोर्स करना चाहती है।

वैसे तो इस उम्र के छात्रों में खुशी की तलाश वाले पाठ्यक्रम में दाखिले को एक स्वागतयोग्य पहल के रूप में देखा जा रहा है, पर इसके पीछे युवा पीढ़ी की चिंताएं भी झांक रही हैं। इस पाठ्यक्रम को चलाने वाली येल यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर डॉ. लाउरी सैंटोस के मुताबिक आज की युवा पीढ़ी का सामना कॅरियर और काम के दबावों से होने लगा है, जिसमें उनकी व्यक्तिगत खुशियों के मौके खत्म हो गए हैं। अमेरिका हो या भारत, कॉलेज में दाखिले, पढ़ाई और सोशल मीडिया के दबावों के बीच इस नई पीढ़ी को अपनी नींद से लेकर सामाजिक जीवन और कई बार जिंदगी तक से समझौते करने पड़ रहे हैं। यह पीढ़ी कंप्यूटर-मोबाइल की स्क्रीन और वास्तविक जिंदगी की चुनौतियों के बीच फंस गई है और अजीब सी बेचैनी और छटपटाहट का अनुभव कर रही है। पढ़ाई और कॅरियर का इतना ज्यादा दबाव इसके ऊपर है कि कई बार नौबत आत्महत्या तक पहुंच रही है।

कोटा में कोचिंग करने वाले युवाओं ने पिछले कुछ वर्षो में जैसे-जैसे आत्मघाती कदम उठाए हैं, उनसे साबित हो रहा है कि यह नई पीढ़ी भी खुद को हताश और लाचार महसूस कर रही है। उसके सामने शानदार वेतन वाली नौकरी, बड़ी कार, सुसज्जित घर जैसे बड़े-बड़े सपनों की दीवारें खड़ी कर दी गई हैं, जिन्हें पार करना तो दूर, छूना भी मुश्किल लग रहा है। असल में खुशी को लेकर जो स्थितियां अमेरिका जैसे विकसित देशों में हैं, लगभग वैसे ही हालात अब भारत जैसे विकासशील देशों में भी बन गए हैं। स्थिति इतनी विकट और विस्फोटक हो गई है कि अब भारत के नागरिक प्रसन्नता के किसी भी सूचकांक पर अपने पड़ोसी देशों चीन, पाकिस्तान और बांग्लादेश से भी पीछे नजर आते हैं। यहां तक कि सोमालिया, ईरान और लगातार युद्ध से आक्रांत फलस्तीन भी भारत से ऊपर हैं।

इसकी एक पुष्टि संयुक्त राष्ट्र संघ की एक संस्था-सस्टेनेबल डेवलपमेंट सॉल्यूशंस नेटवर्क (एसडीएसएन) द्वारा हर साल जारी की जाने वाली वल्र्ड हैप्पीनेस इंडेक्स से होती है। वर्ष 2012 में जब से इस संस्था ने यह रिपोर्ट जारी करना शुरू किया है, भारत का स्थान 157 देशों की सूची में काफी पीछे 100 के पार ही रहता आया है। वर्ष 2016 में भारत 157वें नंबर पर था, जबकि हमसे ऊपर बांग्लादेश (110), पाकिस्तान (92) और सोमालिया (76) जैसे देश थे, जिन्हें हम स्थाई तौर पर आपदाग्रस्त देशों में ही गिनते हैं। उल्लेखनीय यह है कि इस सूची में पांच साल पहले यानी 2013 में भारत 111वें नंबर पर था, जबकि इस बीच भारत में काफी ज्यादा आर्थिक तरक्की की बातें हुई हैं और जीवन स्तर में सुधार के दावे किए जा रहे हैं।1संयुक्त राष्ट्र संघ की इस कोशिश के पीछे तर्क यह है कि दुनिया के तमाम देशों में तरक्की को नापने के कई पैमाने हैं, लेकिन सारी तरक्की का उद्देश्य यही है कि नागरिक खुश रहें।

यह खुशी कई सामाजिक-आर्थिक कारणों पर निर्भर होती है, जैसे शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा, आर्थिक स्थिति वगैरह और संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों की राय है कि इन सब कारणों की अलग-अलग पड़ताल करना तो ठीक है, लेकिन इनका एक समन्वित जायजा लेना भी जरूरी है। उनका कहना है कि खुशी के मामले में गैर-बराबरी किसी भी समाज में या विभिन्न समाजों के बीच विषमता को नापने का बेहतर तरीका है। अगर स्विट्जरलैंड और डेनमार्क इस पैमाने पर सबसे ऊपर हैं और सीरिया या बुरुंडी के नागरिकों में प्रसन्नता का अनुपात सबसे कम पाया गया है तो इन देशों के बीच के फर्क को बेहतर ढंग से समझा जा सकेगा। देशों में खुशी का स्तर नापने के लिए जो मानक इस्तेमाल किए जाते हैं, उनमें प्रति व्यक्ति आय, दीर्घ जीवन की संभावना, सामाजिक सुरक्षा और अपने फैसले खुद करने की आजादी मुख्य हैं।

हमारे लिए ज्यादा महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि आखिर आर्थिक तरक्की के कई दावों के बाद भी भारत इस सूची में पीछे क्यों रहता है। अर्थशास्त्री कहते हैं कि दुनिया में सबसे तेज बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था होने के बावजूद भारत में बेहद गरीबी में जीने वालों की तादाद काफी बड़ी है। इसके अलावा कुपोषण, स्वास्थ्य की समस्याएं हैं, शिक्षा की सुविधाओं में कमी है और सामाजिक विषमता और रहन-सहन के स्तर पर गैरबराबरी बहुत ज्यादा है जो लोगों को खुश नहीं रहने देती है। इस बीच तेज आर्थिक तरक्की और एक छोटे से तबके की खुशहाली ने ज्यादातर लोगों में अच्छी जिंदगी की महत्वाकांक्षा तो जगा दी है, लेकिन उसे हासिल करने के साधन उनके पास नहीं हैं। ऐसे में हताश होकर ज्यादातर लोग दुखी महसूस करते हैं।

समाजशास्त्रियों का मत है कि भारतीयों में अब असंतोष की मात्र काफी ज्यादा है, इस कारण प्रसन्नता के पैमाने पर भारत का स्थान लगातार नीचे आ रहा है। जाहिर है कि असंतोष इसे लेकर है कि उनके पास अमेरिका जैसे विकसित देशों के आम नागरिकों की तरह ज्यादा पैसे नहीं हैं। अपने मां-बाप या बड़ों को रुपये-पैसे की मारामारी में फंसे देखकर देश की युवा या किशोर पीढ़ी भी अपने ऊपर दबाव महसूस करने लगी है। अब वक्त आ गया है कि इस पीढ़ी को यह सबक दिया जाए कि यह जरूरी नहीं कि पैसे से खुशियां खरीदी जा सकती हैं। उन्हें समझाना होगा कि खुशी ऐसी चीज नहीं, जो बाजार में कहीं मिल सके। जाहिर है यह असंतोष ही प्रसन्नता न होने की वजह है। इसे दूर करने का एकमात्र तरीका यह है कि शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में बड़े निवेश किए जाएं।

(लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

By Kamal Verma