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लेखन के माध्यम से प्रतिरोध

हिंदी के व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए दामोदर खड़से ने न सिर्फ उपन्यास लेखन बल्कि मराठी से हिंदी में महत्वपूर्ण रचनाओं का अनुवाद भी किया है। स्मिता से हुई विस्तृत चर्चा के अंश..

By Pratibha Kumari Edited By: Published: Sun, 02 Apr 2017 12:12 PM (IST)Updated: Sun, 02 Apr 2017 12:28 PM (IST)
लेखन के माध्यम से प्रतिरोध

हिंदी में लेखन की शुरुआत किस तरह हुई?
मेरा बचपन मध्य प्रदेश में बीता है। मेरी प्रारंभिक शिक्षा हिंदी माध्यम से ही हुई है। हिंदी में रुचि विकसित होने पर मैंने उसे आगे भी कायम रखा। हिंदी पत्र-पत्रिकाओं और अखबारों से मैं लगातार जुड़ा रहा। मित्र-परिवार भी हिंदीभाषी हैं। करीब 18 वर्ष की उम्र में मैंने कविताएं लिखनी शुरू कीं लेकिन पहली किताब कहानियों की आई। इसके बाद तमाम तरह के अनुवाद और संग्रह प्रकाशित हुए।

हिंदी में अनुवाद का विचार कहां से आया?
मैं ‘सारिका’ के लिए लिखा करता था जिसके संपादक कमलेश्वर थे। वे एक कॉलम ‘गर्दिश के दिन’ चलाया करते थे। जिसमें वे लेखकों के जीवन के संघर्ष या उससे मुकाबला कर आगे बढ़ने के प्रसंग शामिल करते थे। मराठी के मशहूर लेखक दया पवार ने उस कॉलम के लिए मराठी में अपने अनुभव लिखकर भेजे, जिसे अनुवाद के लिए कमलेश्वर ने मेरे पास भेजा। उस अनुवाद के प्रकाशित होने के बाद देशभर से पत्रिका के पास काफी प्रतिक्रियाएं आईं। कमलेश्वर ने दया जी को सलाह दी कि वे अपने लेख को आत्मकथा के रूप में परिवर्तित कर सकते हैं।सालभर बाद उनकी आत्मकथा प्रकाशित हुई। इस किताब की इतनी चर्चा हुई कि एक साल में इसके दो संस्करण प्रकाशित हो गए। बाद में जब कमलेश्वर ने उसे हिंदी में प्रकाशित करना चाहा तो अनुवाद के लिए उसे मेरे पास भेज दिया। इसके प्रकाशन के बाद मुझे लगा कि अपने लेखन के साथ-साथ मराठी की महत्वपूर्ण कृतियों का भी हिंदी अनुवाद करना चाहिए। इस प्रकार मराठी से हिंदी में अनुवाद की मेरी शुरुआत हो गई।

महिला केंद्रित उपन्यास लिखने की कोई खास वजह?
हाल ही प्रकाशित उपन्यास ‘बादल राग’ उन महिलाओं पर है जो आज कॉरपोरेट जगत में अपना स्थान ऊपर बना रही हैं। यह बैंकिंग क्षेत्र पर आधारित है। पहली बार बैंकिंग के कैनवास पर स्त्रियों को देखने की कोशिश की गई है, क्योंकि मैं इस क्षेत्र से जुड़ा रह चुका हूं इसलिए मुझे उन बातों की जानकारी है, जो आमतौर पर जनसामान्य को पता नहीं चल पाती। एक तरफ उनकी घर-गृहस्थी तो दूसरी तरफ करियर को लेकर अपनी आकांक्षाएं भी होती हैं। सफल होने की सारी योग्यताएं उनके पास हैं लेकिन पुरुष प्रधान समाज में उन्हें कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। ये उपन्यास उनकी आकांक्षा और पदोन्नति के रास्ते में आने वाली परेशानियों से दो-चार कराएगा।

आगे क्या लिखने की योजना है?
एक उपन्यास है ‘खिड़कियां’। इसमें तरह-तरह के लोगों के जीवन की कहानियों को प्रस्तुत किया गया है। इसे इस तरह समझा जा सकता है कि एक दुखी आदमी है, जब वह दुख की दहलीज लांघकर बाहर निकलता है, तो उसे बहुत सारे दुखी लोग दिखाई पड़ते हैं। उनके दुख को देखते हुए धीरे-धीरे उसे अपना दुख कम लगने लगता है। कैमरे की तरह महानगर, देहात, देश- विदेश के लोगों के जीवन का दृश्य भी उसकी आंखों के सामने से गुजरता है।

इन दिनों क्या पढ़ रहे हैं?
आजकल कहानियां कम पढ़ पा रहा हूं लेकिन कविताएं खूब पढ़ रहा हूं। पिछले दिनों कथाकार संजीव का महाराष्ट्र के किसानों की आत्महत्या पर आधारित उपन्यास ‘फांस’ पढ़ा था। इन दिनों उदयप्रकाश के उपन्यास और बलराम की संस्मरणात्मक किताब पढ़ रहा हूं।

उत्कृष्ट अनुवाद के लिए आपको साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला, फिर भी आपने प्रोफेसर कालबुर्गी की हत्या पर अकादमी और उसके अध्यक्ष के प्रति विरोध जताया। ऐसा क्यों?
विरोध में मेरी व्यक्तिगत सहभागिता नहीं थी। एक तो दोनों अलग-अलग चीजें हैं। साहित्य अकादमी को लगा कि मेरी अनूदित कृति आगे आनी चाहिए। सदानंद नामदेवराव देशमुख ने विदर्भ के किसानों के जीवन पर आधारित उपन्यास ‘बारोमास’ लिखा। यह मराठी का बहुत चर्चित उपन्यास है, जिसका मैंने हिंदी में अनुवाद किया।

पुरस्कार लौटाने या अकादमी का विरोध करने पर साहित्य या समाज का कैसे भला हो सकता है?
यह बड़ा विवादास्पद विषय हो गया था। अब मुझे ऐसा लगता है कि लेखक को अपनी लेखनी के माध्यम से अपना प्रतिरोध दर्ज करना चाहिए। 

युवा लेखकों को क्या संदेश देना चाहेंगे? 
जीवन के परिदृश्य बदल रहे हैं। इस बदले हुए परिपेक्ष्य में नई चीजों को आत्मसात करना चाहिए और उसकी अभिव्यक्ति होनी चाहिए। जैसे- आईटी में काम करने वाले लोगों की क्या तकलीफें हैं? उनके सामने किस तरह की चुनौतियां हैं? वे किस तरह जी रहे हैं? आदि...ये चीजें युवाओं के साहित्य में आनी चाहिए। युवा अपने लेखन में बदले हुए समाज को अच्छी तरह रेखांकित कर रहे हैं। उनके विषय और शैली दोनों अलग हैं।

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