यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Dec 03, 2022 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
संस्कृति, सभ्यता और सनातनता का वैचारिक पाठ व भारतीय मिथक और पौराणिक संदर्भ बताती किताबों की समीक्षा
किताब में मौजूद विवरण साध्वी भगवती सरस्वती की 25 साल पहले वहीं यात्रा के हैं जिन्होंने मात्र सफरी झोले के ...और पढ़ें

यतीन्द्र मिश्र
किताबघर
संस्कृति, सभ्यता और सनातनता का वैचारिक पाठ
पश्चिमी समाज में अवसाद से निपटने और स्व के निर्धारण को लेकर सालों से विमर्श होता आया है, जिनमें दार्शनिकों, धर्म और आगम के विद्वानों समेत धर्मगुरुओं के प्रवचनों को समझने और अनुसरण करने की लंबी परिपाटी मौजूद मिलती है। भारत में भूमंडलीकरण के आने के बाद, जिस तरह मध्यवर्गीय समाज अपने जीवन के सुख और ऐश्वर्य को जुटाने में व्यस्त हुआ, उसमें पश्चिमी सभ्यता का भी अनुसरण शामिल रहा है। परिणाम यह हुआ कि भारतीय समाज, जो अपने व्यक्तिगत जीवन में सुख और शांति के ढेरों तरीके घरेलू ढंग से उपलब्ध कर लेता था, वहां भी अवसाद, पीड़ा और कड़ी प्रतिस्पर्धा ने एक पूरी पीढ़ी को अवसादग्रस्त बना दिया है। ऐसे में आध्यात्मिक चिंतन से सराबोर सोशल मीडिया के ढेरों उपक्रम पिछले दो दशकों में नजर आते हैं। शायद इसी कारण भारत में आध्यात्मिक चिंतन की जो व्यावहारिक पद्धति हमारे धर्मशास्त्रों, पूजा-पद्धतियों और प्रार्थना प्रवचनों में समाहित थी, उसका एक नया आधुनिक विस्तार मन को शांति देने वाले विमर्श के इर्द-गिर्द ठहर गया है। श्री श्रीरविशंकर, जग्गी वासुदेव, मुनि चिदानंद सरस्वती समेत आधुनिक ढंग से रामायण और महाभारत के भाष्यकारों की परंपरा सामने है। एक वह भी परंपरा रही, जिसमें युवाओं को जोड़ने की कोशिश में स्वामी एम., सिस्टर शिवानी, दीपक चोपड़ा, शिव खेड़ा, राबिन शर्मा, अरुंधती सुब्रमण्यम, वनमाली और देवदत्त पट्टनायक ने अपने लेखन से व्यापक समाज को प्रभावित किया। इसी क्रम में साध्वी भगवती सरस्वती का आध्यात्मिक ज्ञान और प्रेरणा की बातें अनूठे ढंग से भारतीय समाज को प्रभावित करती हैं। उनकी किताब ‘हालीवुड टू द हिमालयाज: अ जर्नी आफ हीलिंग एंड ट्रांसफार्मेशन’ इसी कड़ी में एक नया अध्याय जोड़ती है।
पुस्तक गूढ़ ढंग से मानव मन का उपचार करते हुए उसके कायिक और मानसिक परिवर्तन पर एकाग्र है, जिसमें यौन शोषण, चिंता, असुरक्षा, क्षुधातिशय और अवसाद से निपटने के ढेरों प्रयोग सहज ढंग से समझाए गए हैं। ये चिंतन बहुत हद तक काव्यात्मक ढंग से अपनी बात कहता है, जिसमें रूपकों का भरपूर इस्तेमाल किया गया। उदाहरण के तौर पर, बहते हुए पानी में खड़े होकर अपने क्रोध और आत्मदया को पानी के साथ तिरोहित करने का भाव और उसी के साथ स्वयं को क्षमा करने की युक्ति आजमाई गई है, जो कहीं न कहीं तीर्थों और पर्वों के समय पवित्र नदियों में डुबकी लगाकर स्नान करके अपने पापों से मुक्त होने की सनातन परंपरा के सिद्धांत के समीप ठहरती है। गंगा में अपनी पीड़ा, भय और शिकायतों को अर्पित करके उससे मुक्त होने की अवधारणा एक ऐसा सार्थक विचार भी है, जिसे अपनाकर खुद की मानसिकता में सकारात्मक परिवर्तन किए जा सकते हैं। इसी तरह आत्मबोध के लिए प्रयुक्त की जाने वाली छोटी से छोटी तर्कपूर्ण विधियां भी उस अध्यात्म को संबोधित हैं, जिसके लिए वर्षों तक तपस्वियों ने हिमालय और निर्जन कंदराओं में आत्मचिंतन करते हुए तप किया। कहीं न कहीं साध्वी भगवती का इशारा उस सनातन संस्कृति के मर्म को वृहत्तर ढंग से पढ़ने की ओर एकाग्र है, जिसके लिए भारत में ढेरों वैचारिक विभूतियों ने आध्यात्मिक चिंतन के मार्ग सुझाए। हम आसानी से इन तर्कों को पंडित गोपीनाथ कविराज, रमण महर्षि, जे. कृष्णमूर्ति तथा महर्षि अरविंद के विचारों के समकक्ष रखकर परख सकते हैं। पुस्तक में आने वाले ऐसे ढेरों प्रयोग, आप्त वचनों, व्यक्तिगत अनुभवों से की जाने वाली विधियों तथा सनातन संस्कृति के अवयवों को उनके सबसे बौद्धिक दायरों में पकड़ने की कोशिश सरीखा है, जिसके द्वारा भीतर प्रकाश पैदा किया जा सकता है। ‘अप्प दीपो भव’ की अवधारणा से संचालित साध्वी भगवती का प्रयास अपने भाग्य को आत्मज्ञान के माध्यम से कैवल्य की दिशा में ले जाने की ओर एकाग्र है।
किताब में मौजूद विवरण अमेरिका में जन्मीं साध्वी भगवती सरस्वती की उस यात्रा और कायांतरण से सन्दर्भित हैं, जिन्होंने 25 साल पहले मात्र एक सफरी झोले के साथ भारत यात्रा की थी। यहां उन्हें ईश्वर के होने की दिव्य अनुभूति हुई, जिसकी साक्षी पवित्र गंगा बनीं। उन्होंने अपने विश्वास, आस्था को उस परम शक्ति से जुड़ा हुआ पाया, जिसने उनकी व्यक्तिगत परेशानियों और तकलीफों का न सिर्फ निराकरण किया, बल्कि उन्हें सार्थक और अर्थप्रद काम करने की ओर प्रेरित किया। इसमें स्त्रियों के अधिकार और उनकी स्वायत्तता की बात भी सन्निहित थी। आज उनके द्वारा किए जाने वाले आध्यात्मिक दर्शन के ढेरों कार्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समादृत हैं, साथ ही वे मनुष्य में निजता की खोज के विचार को रेखांकित करने के लिए संकल्पबद्ध दिखाई देती हैं। किताब में मौजूद ढेरों दुर्लभ संस्मरण, एक तीर्थयात्री की शांति की खोज की यात्रा, प्रार्थनाएं और चुनौतियां तथा मंत्रों, श्लोकों और निरुक्त के आशयों को समझाने की चेष्टा ने एक ऐसी वैचारिक अंत:परिक्रमा संपादित की है, जिसे सिर्फ अध्यात्म के लिए समर्पित पाठकों को ही नहीं, बल्कि हर उस चेतनासंपन्न व्यक्ति को पढ़ना चाहिए, जो सही अर्थों में संस्कृति, सभ्यता और सनातनता के मूल अभिप्रायों को हृदयंगम करना चाहता है। एक सुंदर और वैचारिक किताब, जिसका हिंदी अनुवाद भी व्यापक हिंदीपट्टी समाज के लिए उपलब्ध होना चाहिए।
हालीवुड टू द हिमालयाज: अ जर्नी आफ हीलिंग एंड ट्रांसफार्मेशन
साध्वी भगवती सरस्वती
आटोबायोग्राफी/स्पिरिचुएलिटी
फस्र्ट एडीशन, 2022
जैको पब्लिशिंग हाउस, मुंबई
मूल्य: 499 रुपये
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मयूरपंख
कहीं एक हिरन तारों का और चंद्रमा का एक हिरन
गुजराती भाषा के शीर्षस्थ कवि सितांशु यशश्चंद्र की कविताओं र्का ंहदी अनुवाद ‘जटायु, रुगोवा और अन्य कविताएं’ इधर प्रकाशित कविता संग्रहों में एक मानक संकलन के रूप में उभरता है। सितांशु की कविताओं में भारतीय मिथक और पौराणिक संदर्भ अपनी देशज अभिव्यक्तियों में इस तरह उपस्थित हैं, कि लगता है उनका स्वर विश्व कविता के आंगन में ऊर्जस्वित हो रहा है। वे रूपकों, उत्प्रेक्षाओं और उपमाओं के बिंबों से एक ऐसा वृत्तचित्र उकेरते हैं, जिसमें ब्रह्मांड के ढेरों लौकिक-अलौकिक स्पंदनों का प्रभाव घटता हुआ प्रतिबिंबित है।
बयान की स्फीति में उदात्त, अर्थ की भंगिमाओं में करुणा से आबद्ध और परंपरा और सनातनता के मूल्यों को उदार भाव से देखने का जतन उनकी आवाज को सार्वकालिक और समदर्शी बनाता है। इन कविताओं का बेहतरीन अनुवाद ज्योत्स्ना मिलन, महावीर सिंह चौहान, गगन गिल, शैलेश पंडित, रंजना अरगड़े और केदारनाथ सिंह जैसे अग्रणी कवियों ने किया है। दृश्य और अदृश्य के बीच डोलती यह कविताएं हमारी पूर्वज परंपराओं के आधुनिक पुनर्आख्यान सरीखी हैं। अनूठा और लयात्मक संयोजन।
जटायु, रुगोवा और अन्य कविताएं
सितांशु यशश्चंद्र
कविता
पहला संस्करण, 2022
राजकमल पेपरबैक्स, नई दिल्ली
मूल्य: 225 रुपये