मई-जून में और भयंकर होगी लू! जानें क्या है 'Super El Nino', जिसकी मौसम विभाग ने दी चेतावनी
अल नीनो का ज्यादा शक्तिशाली रूप सुपर अल नीनो कहलाता है। इसके कारण तापमान काफी बढ़ सकता है और मानसून भी प्रभावित हो सकता है।

क्या आप जानते हैं सुपर अल नीनो का मतलब? (Picture Courtesy: Freepik)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। भारत के कई राज्यों में गर्मी अपने प्रचंड रूप में आ चुकी है। इस साल समय से पहले ही लू का प्रकोप दिखाई दे रहा है। पंजाब, दिल्ली से लेकर ओडिशा और बिहार तक तापमान रिकॉर्ड तोड़ रहा है।
गर्मी के बढ़ते प्रकोप के साथ अन नीनो का नाम तो आपने सुना होगा, लेकिन अब सुपर अल नीनो भी काफी चर्चा में है। वर्ल्ड मिटियोरोलॉजिकल ऑर्गेनाइजेशन ने चेतावनी दी है कि इस साल मई-जुलाई के बीच अल नीनो विकसित हो सकता है। आइए समझें कि अल नीनो और सुपर अल नीनो है क्या और यह भारत को कैसे प्रभावित कर सकता है।
क्या होता है अल नीनो और सुपर अल नीनो?
अल नीनो एक नेचुरल क्लाइमेट पैटर्न है जो प्रशांत महासागर में हर 2 से 7 साल के अंतराल पर होता है। आमतौर पर ट्रेड विंड्स गर्म पानी को एशिया की ओर धकेलती हैं, लेकिन अल नीनो के दौरान, ये हवा कमजोर पड़ जाती हैं और मध्य व पूर्वी प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से ज्यादा बढ़ जाता है।
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(AI Generated Image)
सुपर अल नीनो इस घटना का एक बेहद शक्तिशाली रूप है। अल नीनो में प्रशांत महासागर का सतही तापमान 0.5°C से 1.4°C से ज्यादा गर्म हो जाता है। जब समुद्र की सतह का तापमान औसत से +2.0°C या उससे ज्यादा बढ़ जाता है, तो इसे सुपर अल नीनो कहा जाता है। यह मानसून हवा और बारिश के साइकिल को पूरी तरह बाधित कर देता है, जिसका असर प्रशांत महासागर से हजारों मील दूर स्थित भारत पर भी पड़ता है।
भारत पर इसका क्या असर पड़ सकता है?
- भीषण हीटवेव- भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने पहले ही चेतावनी दी है कि अप्रैल से जून के बीच उत्तर-पश्चिम, मध्य और पूर्वी भारत में सामान्य से ज्यादा हीटवेव डेज होंगे। सुपर अल नीनो इन गर्म हवाओं की तीव्रता और समय को बढ़ा सकता है, जिससे तापमान 45°C-48°C के पार जा सकता है।
- मानसून पर असर- भारत की अर्थव्यवस्था और खेती मुख्य रूप से दक्षिण-पश्चिम मानसून पर निर्भर है। अल नीनो के का सीधा संबंध कमजोर मानसून से है। सुपर अल नीनो के कारण मानसूनी हवाएं कमजोर पड़ सकती हैं, जिससे देश के कई हिस्सों में बारिश में भारी कमी आ सकती है।
- स्वास्थ्य और पर्यावरण- तेज गर्मी और उमस सीधे तौर पर सार्वजनिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन और सांस से जुड़ी समस्याओं के मामले बढ़ सकते हैं। साथ ही, बायोडायवर्सिटी पर भी इसका बुरा असर पड़ता है।
