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जब भूत-प्रेम वाली बारात देख घबरा गईं मैनावती; ठेठ भोजपुरी गीत में मिलता है शिव-पार्वती विवाह का अनोखा वर्णन

Published: Tue, 06 Oct 2026 04:25 PM (IST)

इस भोजपुरी गीत के माध्यम से शिव-पार्वती विवाह के दौरान माता मैना की पीड़ा और वात्सल्य का वर्णन किया गया है।

शिव विवाह का यह भोजपुरी लोकगीत आज भी कर देता है भावुक (Image Source: AI-Generated)

शिव विवाह का यह भोजपुरी लोकगीत आज भी कर देता है भावुक (Image Source: AI-Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। सज-धज कर आई बारात और बेटी के विवाह की खुशियां उस समय हाहाकार में बदल गईं, जब दरवाजे पर दूल्हे के रूप में एक भस्म रमाए, गले में सांप लपेटे और भूतों की टोली के साथ आए योगी को देखा गया। जी हां, जब शिव-पार्वती विवाह का यह प्रसंग पूर्वांचल और बिहार के भोजपुरी लोकगीतों के जरिए गूंजता है, तो वात्सल्य के अलौकिक सुर जन्म लेते हैं।

प्रसिद्ध भोजपुरी लोकगीत "शिव से गौरी ना बियाहब, हम जहरवा खइबे ना..." सिर्फ एक वैवाहिक गीत नहीं है, बल्कि यह एक मां की उस पीड़ा और बेबसी का जीवंत दस्तावेज है, जिसने अपनी सुकुमारी बेटी के लिए एक ऐसे वर को देखा, जिसका न कोई घर है और न ही कोई संपत्ति।

आखिर एक रानी अपनी ही बेटी के विवाह के दिन जहर खाने की बात क्यों करने लगी? आइए, पूर्वांचल के इस पारंपरिक भोजपुरी लोकगीत के जरिए माता मैना के हृदय की उस पीड़ा और वात्सल्य को गहराई से समझते हैं।

'शिव से गौरी ना बियाहब...'

यह गीत विशेष रूप से पूर्वांचल और बिहार के भोजपुरी भाषी क्षेत्रों में शिव विवाह के प्रसंगों में गाया जाता है। इस गीत में माता पार्वती की मां, रानी मैना की उस मानसिक पीड़ा और आक्रोश का वर्णन है, जो उन्होंने भगवान शिव के औघड़ रूप को देखकर महसूस की थी। यहां "हम जहरवा खइबे ना" का मतलब उस घोर निराशा से है, जहां एक मां अपनी फूल-सी कोमल बेटी को श्मशान वासी शिव के हाथों में सौंपने से बेहतर मृत्यु को गले लगाना समझती है।

भस्म रमाए दूल्हे को देख दहल उठा मां का कलेजा

गीत की शुरुआत में ही वह मार्मिक और विद्रोही स्वर उभर कर सामने आता है, जब मां मैना अपनी किस्मत को कोसती हैं। वे कहती हैं कि जिसके शरीर पर सांप लोट रहे हों और भूत-बैताल जिसके साथी हों, उसे वे अपना दामाद कैसे स्वीकार कर लें:

"लोटे जवन देहिया प नगवा-नगिनिया,
भूत-बैताल जेकर संगिया-संगिनियां।
सेकरा जमाई क के कइसे उतारब,
हम जहरवा खइबे ना..."

'बंसहा' पर सवार महादेव को देख मां मैना ने फेर लिया था मुंह

गीत की अगली पंक्तियों में मां मैना का दर्द और गहरा हो जाता है। वे कहती हैं कि उन्होंने आज तक ऐसा कोई दूल्हा नहीं देखा जो बैल पर सवार होकर बारात लाया हो। महादेव का यह खौफनाक रूप देखकर डर के मारे उनकी आंखें बंद हो जाती हैं। वे रो-रोकर कहती हैं कि उनकी फूल-सी सुकोमल गौरी के लिए यह कैसा दूल्हा आ गया है। वे किसी भी कमी या मजबूरी के चलते अपनी बेटी की जिंदगी इस तरह बर्बाद नहीं होने देंगी।

'सिरिजा के फूल' और 'बाज' का मार्मिक रूपक

इस गीत में वात्सल्य का सबसे खूबसूरत और भावुक रूपक तब आता है जब मां मैना अपनी बेटी गौरी की तुलना 'सिरिजा के कोमल फूल' से और महादेव की तुलना 'बाज' से करती हैं। वे साफ इंकार कर देती हैं कि वे अपनी बेटी गौरी का हाथ शिव के हाथ में नहीं देंगी, क्योंकि वे जान-बूझकर अपनी बेटी की जिंदगी तबाह नहीं कर सकतीं।

आज भी दिलों पर कर रहा है राज

भोजपुरी ठेठ शब्दावली में रचे गए इन बोलों के पीछे छिपे जज्बात बेहद मजबूत हैं। देवों के देव महादेव, जिनके एक इशारे पर सृष्टि चलती है, यहां एक सास की नजर में सिर्फ एक ऐसा जोगी हैं, जो उनकी बेटी के लायक नहीं है। महाशिवरात्रि या विवाह पंचमी के मौके पर 'शिव से गौरी ना बियाहब' जैसी लोक धुनें हमें हमेशा अपनी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक जड़ों से जोड़कर रखती हैं। यह गीत हमें बताता है कि एक मां का अपनी बेटी के प्रति असीम प्रेम और चिंता किसी भी युग में अपनी चमक नहीं खोते हैं।

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