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'फिरे शिव के करनमा...' इस मैथिली लोकगीत में है देवी पार्वती की कठोर तपस्या का जिक्र, सुनते ही भर आता है कलेजा

Published: Sun, 20 Sep 2026 07:54 PM (IST)

यह गीत बताता है कि कैसे पार्वती ने शिव को पति रूप में पाने के लिए अन्न-जल त्याग कर बेलपत्र पर जीवन बिताया।

बेहद खास है ये कालजयी मैथिली लोकगीत (Image Source: AI-Generated)

बेहद खास है ये कालजयी मैथिली लोकगीत (Image Source: AI-Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। मिथिलांचल के संगीत में जब भी शिव-पार्वती के अलौकिक प्रेम और भक्ति की गूंज सुनाई देती है, तो ‘नचारी’ और ‘महेशवाणी’ विधा का जिक्र सबसे पहले आता है। कालजयी लोकगीत "फिरे शिव के करनमा गौरी वन में वन में ना..." महज कोई साधारण भजन नहीं, बल्कि उस कठोर तपस्या और अटूट प्रेम का वो समंदर है, जो हर सुनने वाले के मन को श्रद्धा और करुणा से भर देता है।

क्या आपने कभी सोचा है कि देवी पार्वती के इस वन-वन भटकने के पीछे कौन-सा अनकहा दर्द और समर्पण छिपा है? वास्तव में ये पंक्तियां किसी राजहठ की नहीं, बल्कि देवाधिदेव महादेव को जीवनसाथी के रूप में पाने के लिए एक सुकुमारी के उस कठोर त्याग की कहानी हैं, जिसे उन्होंने अपनी आत्मा में समेटे हुए है। आइए, डिटेल में इसके बारे में जानते हैं।

Maithili devotional geet

(Image Source: AI-Generated)

'फिरे शिव के करनमा...' का असल मतलब

यह गीत मिथिला की 'महेशवाणी' या 'नचारी' शैली में रचा गया है। इस गीत में माता पार्वती की उस असहनीय शारीरिक पीड़ा और मानसिक दृढ़ता का वर्णन है, जो उन्होंने शिव को पाने के लिए सही। यहां "वन में वन में ना" का मतलब उस घोर जंगल से है जहां सुकुमारी पार्वती नंगे पांव, दुनियादारी छोड़कर अपने इष्ट को खोज रही हैं।

गीत की शुरुआत में यह मार्मिक वर्णन मिलता है:

"फिरे शिव के करनमा, गौरी वन मे वन मे ना
पोथी देखलन पतरा देखलन नारद बभनमा
गौरी दाइ के लिखल छल बुढ़बा सजनमा..."

यहां यह बताया गया है कि नारद मुनि ने पोथी-पतरा देखकर भविष्यवाणी की थी कि गौरी की किस्मत में एक 'बूढ़ा सजन' यानी योगी और भस्म रमाने वाले शिव ही लिखे हैं। इसी नियति को स्वीकारते हुए गौरी महलों का सुख छोड़कर जंगलों में दर-दर भटक रही हैं।

अन्न-जल त्याग कर किया शिव का वरण

इस गीत के बोल भले ही बहुत सीधे और लोकभाषा में रचे गए हों, लेकिन इनके पीछे छिपे जज्बात बहुत मजबूत हैं। इस गाने की आगे की पंक्तियां गौरी के त्याग को और गहराई से दर्शाती हैं:

"अन्न तेजलन, पान तेजलन, भूषण बसनमा
बेलपत्र खाय गौरी, रखलनी परणमा..."

इन लाइनों का मतलब है, "गौरी ने अन्न त्याग दिया, शौक त्याग दिए और अपने सारे राजसी आभूषण भी छोड़ दिए।" उन्होंने शिव को पाने के लिए सिर्फ बेलपत्र खाकर अपने प्राणों को बचाए रखा। महलों में पली-बढ़ी एक कोमल राजकुमारी का सिर्फ बेलपत्र चबाकर जीवन काटना, शिव के प्रति उनके असीम प्रेम और समर्पण का सबसे बड़ा प्रमाण है।

बाद की पंक्तियों में बताया गया है कि उनके इस कठोर तप को देखकर "इंद्र के सिंघासन डोले, विष्णु के आसनवां" यानी स्वर्ग से लेकर बैकुंठ तक देवता भी विचलित हो गए।

भक्ति और प्रेम का अद्भुत संगम है यह 'नचारी'

इस गाने की धुन और शब्द इतने मार्मिक हैं कि यह श्रोता के मन में एक गहरा प्रभाव छोड़ते हैं। शारदा सिन्हा जैसी महान गायिकाओं से लेकर मिथिलांचल के गांव-देहात की महिलाओं तक ने इस गीत को अपने स्वरों में पिरोकर अमर कर दिया है। इस लोकगीत की खासियत यही है कि यह देवी-देवताओं को किसी दूर आसमान में नहीं, बल्कि घर के एक सदस्य के रूप में प्रस्तुत करता है।

यह गीत सिर्फ पूजा-पाठ के लिए नहीं, बल्कि प्रेम की उस पराकाष्ठा को महसूस करने के लिए गाया जाता है, जहां एक स्त्री अपने आराध्य के लिए दुनिया की हर सुख-सुविधा को ठुकरा देती है।

आज भी दिलों पर कर रहा है राज

आज भले ही दुनिया बहुत मॉडर्न हो गई है और संगीत के तरीके बदल गए हैं, लेकिन 'फिरे शिव के करनमा गौरी वन में वन में ना' जैसी लोक धुनें हमें हमेशा अपनी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक जड़ों से जोड़कर रखती हैं। यह गीत हमें बताता है कि सच्चा प्रेम और तपस्या किसी भी युग में अपनी चमक नहीं खोते हैं।

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