हादसा देखकर मदद नहीं, रील बनाने की सूझती है? पढ़िए खत्म होती इंसानियत पर तीखा व्यंग्य
आज समाज में दर्द और दुर्घटनाओं पर संवेदना जताने के बजाय लोग हर चीज की रील बनाने और उस पर ...और पढ़ें

किसी का एक्सीडेंट हो या मौत, सब पर रील चाहिए? (Image Source: AI-Generated)
HighLights
जुम्मन मियां हादसों के वीडियो पर हंसते हुए रील बनाने की बात करते हैं
हास्य, व्यंग्य और त्रासदी के बीच की रेखाएं मिट चुकी हैं
लेखक खत्म होती इंसानियत पर तीखा सामाजिक व्यंग्य प्रस्तुत करते हैं
विवेक रंजन अग्निहोत्री, मुंबई। कल सुबह-सुबह भोपाल उतरा। बहुत दिन बाद पहुंचा था। गर्मी और बरसात खत्म हो रही थी, ठंड शुरू होने वाली थी। धूप में एक अलग ही तरह की गर्माहट थी-या ये कहूं कि ठंडाहट थी, कहना मुश्किल है। सोचा, अब सुबह-सुबह नमक वाली चाय, पोहे और जलेबी का आनंद लेना ही पड़ेगा। सीधे जुम्मन मियां के घर पहुंचा।
पहुंचा तो देखा, जुम्मन मियां एक तरफ अखबार, दूसरी तरफ कुछ मैगजीन से घिरे हुए अपने फोन पर स्क्राल कर रहे थे और ठहाके मार-मारकर अकेले ही हंस रहे थे। इतनी जोर से हंस रहे थे कि उनका शरीर पेंडुलम की तरह कभी आगे, कभी पीछे, कभी दाएं, कभी बाएं जा रहा था। मुझे डर लग रहा था कि कहीं खटिया से गिर गए तो सीधा गोल-गोल घूमते हुए छत से नीचे जाकर खड़ी पुरानी मारुति पर न गिरें और वहीं से ड्राइवर की सीट पर जाकर सीधे ऊपर के सफर पर निकल जाएं।
मैंने पूछा, 'जुम्मन मियां, अकेले बैठे-बैठे किस बात पर हंस रहे हो?'
उन्होंने तुरंत अपना फोन मेरी तरफ कर दिया।
'देखो, कैसे ये बुढ़िया फिसलकर नहर में गिर गई!' और फिर जोर का ठहाका।
'और ये देखो मियां, आपके बंबई में कार सीधे फ्लाईओवर से फ्लाई करके नीचे गिर गई। सारे के सारे जो शादी में जाने वाले थे, श्मशान घाट पहुंच गए!'
फिर दूसरा वीडियो।
'और ये देखो, कैसे ये सांड उल्टी तरफ से दौड़ता हुआ आया और कार से भिड़ गया। सांड तो गिरकर खड़ा हो गया, लेकिन कार में जो बैठे थे, अब दुबारा कभी खड़े नहीं हो पाएंगे!'
मैं अचंभित रह गया। इतनी बड़ी त्रासदी, लोग मर रहे हैं और जुम्मन मियां ठहाके मार रहे हैं!
सोचा कहीं दिमाग तो नहीं खराब हो गया? सठिया गए हैं? कोई ऊटपटांग दवाई खा ली? सुबह-सुबह खैनी खाकर बैठे हैं? लेकिन ऐसी कोई बात नहीं थी। जुम्मन मियां नशा करते ही नहीं थे। स्वस्थ भी थे। रोज सुबह दौड़ने जाते थे।
मैंने पूछा, 'मियां, आप इन लोगों के मरने पर हंस रहे हो?'
कहने लगे, 'मियां, हंसी की तो बात ही है। हंसी का तो जमाना ही चल रहा है। हंसना ही इस वक्त सबसे बड़ी देशसेवा है। जो हंसेगा नहीं, उसको टैक्स देना पड़ेगा। निकम्मेपन का सबसे अच्छा उपाय है-हंसना!'
मैं कुछ समझा नहीं- 'जरा विस्तार से बताइए।'
जुम्मन मियां बोले, 'देखो मियां, पहले गधा सम्मेलन हुआ करते थे, व्यंग्य सम्मेलन हुआ करते थे, हास्य कवि सम्मेलन हुआ करते थे, टेपा सम्मेलन हुआ करते थे। लोगों को हंसने के मौके दिए जाते थे। अवसर निकाले जाते थे, लेकिन अब तो हास्य खुद ही आपके जीवन में ऐसे घुल-मिल गया है जैसे इंदौर के पानी में मल-मूत्र या किसी अस्पताल की दवाई में जहर!'
मैं दुखी हो गया। 'आप ठीक तो हैं?'
'मियां, मैं तो ठीक हूं। मेरे इर्द-गिर्द जो हो रहा है, वो ठीक है या नहीं, सवाल यही है। अब तुम खुद ही देखो-कवि कथावाचक बन गए। कथावाचक बिजनेस चला रहे हैं। बिजनेसमैन नेता बन गए। नेता अभिनेता बन रहे हैं और अभिनेता नेता!'
मैंने कहा, 'इसमें कौन-सी बड़ी बात हो गई? लोग पेशे तो बदलते ही हैं।'
जुम्मन मियां बोले, 'मियां, पेशे बदलें तो अच्छी बात है। यहां तो ईमान, धर्म, जात-पात और तो और-बड़े शहरों में लोग अपनी शक्लें भी बदलवा-बदलवाकर घूम रहे हैं!'
इसके बाद वे फिर हंसने लगे।
मैंने पूछा, 'अच्छा, और बताइए। ये हास्य है, उपहास है या व्यंग्य?'
कहने लगे, 'मियां, यही तो सबसे बड़ा हास्य है! हास्य, व्यंग्य और उपहास-इन सबके बीच की रेखाएं मिटा दी गई हैं।'
मैंने कहा, 'ये तो दुख की बात है।'
'कैसे दुख की बात है? आप बताइए-आज जात-पात की रेखाएं मिटा दी जाएं तो अच्छी बात है या बुरी? अमीरी-गरीबी की रेखा मिटा दी जाए तो अच्छी बात है या बुरी? तो जरा गौर फरमाइए-अगर हास्य, उपहास और व्यंग्य के बीच की रेखाएं मिटा दी जाएं तो नतीजा क्या होगा?'
मैं चुप रहा। उन्होंने फिर फोन खोला।
'देखो, ये कामेडियन नेतागिरी कर रहा है मंच पर। इस नेता को देखो-ये मंच पर खड़े होकर कामेडी कर रहा है। और इन दोनों को देखकर जो दर्शक हैं, वो एक्टिविज्म कर रहे हैं। जो एक्टिविस्ट हैं, वो दलाली कर रहे हैं। जो दलाल हैं, वो नेता बने बैठे हैं!' और फिर ठहाका। हंसते-हंसते जुम्मन मियां खड़े हो गए।
'मियां, चारों तरफ देखो! गांव की लड़कियां कैसे नाच रही हैं। नाचने वाले बुढ़ापे में अश्लीलता कर रहे हैं। जो कल तक अश्लीलता कर रहे थे, वे आज रियलिटी शो में बैठे हैं। जो लोग कल तक समाज को ठीक करने की बात कर रहे थे, आज वही रियलिटी शो चला रहे हैं। समाचारों में अखाड़े चल रहे हैं और अखाड़ों में देश की व्यवस्था के समाचार।'
फिर उन्होंने मुझे एक के बाद एक खबरें दिखानी शुरू कर दीं।
'ये देखो-जो कहते थे युद्ध 14 दिन में खत्म हो जाएगा, पांच साल गुजर गए। युद्ध छोड़ो, हर रोज दीवाली की तरह आतिशबाजी चल रही है और दीवाली की आतिशबाजी पर युद्ध चल रहा है। जहां शांति होनी चाहिए, वहां ढोल-नगाड़े बज रहे हैं और जिन बातों पर शोर होना चाहिए, वहां एकदम सन्नाटा है।'
'और ये देखो, मंदिर में कैसे भक्तों को धक्का मारकर भगाया जा रहा है। अगर इस लाइन में स्वयं भगवान भी खड़े हो जाएं, तो मुझे लगता है मियां, उन्हें भी धक्का मारकर भगा दिया जाएगा। अब तुम ही बताओ, ऐसे समय-काल पर कोई हंसे नहीं तो करे क्या?'
कहते-कहते जुम्मन मियां ने दोनों हाथ ऊपर कर दिए और जोर-जोर से हंसने लगे। तभी अचानक उनका पांव पास पड़ी आम की गुठली पर पड़ा। फिसले। हवा में हाथ-पांव चलाए। मैंने सोचा-जैसी मैंने कल्पना की थी, कहीं वो सच न हो जाए। जुम्मन मियां लुढ़ककर सीधे। लेकिन नहीं। वे फिर खड़े हो गए।
मेरी तरफ देखकर बोले, 'मियां, इसकी रील बनाई कि नहीं?'
मैंने कहा, 'रील? अरे, मुझे दुख हुआ कि आप गिरे। आप खड़े होकर पूछ रहे हैं कि रील बनाई कि नहीं! कोई बहुत दुष्ट होगा जो ऐसे बुरे वक्त में रील के बारे में सोचे।'
जुम्मन मियां ने अचानक हंसना बंद कर दिया। मुझे गौर से टकटकी लगाकर घूरने लगे। फिर मुझे छुआ, जैसे यकीन न हो कि मैं हूं।
'फिर से बोलो। कोई बहुत दुष्ट होगा जो ऐसे बुरे वक्त में रील के बारे में सोचे। यही कहा ना? अब तो यकीन हो गया है-तुम्हारा कुछ नहीं हो सकता। मियां, इतने बड़े फिल्मकार बन गए हो, जमाने के हिसाब से चलना अभी तक नहीं सीखा? एक फिल्मकार होकर इतना नहीं मालूम कि एक दृश्य को देखने के दो ही नजरिए हो सकते हैं-हास्य या त्रासदी।'
'ये नया जमाना है। ये हास्य-परिहास का जमाना है। अमृतकाल आएगा कि नहीं, ये तो मैं नहीं जानता, लेकिन हास्य-परिहास-काल तो आ चुका है मियां! इस बात पर खुशी मनाओ। इसके जश्न की रील बनाओ।'
फिर मेरे कंधे पर हाथ रखा। 'जमाने के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलो। वरना ऐसे ही कुंठित पैदा हुए थे, और एक दिन कुंठित मर जाओगे। कोई दो कौड़ी को पूछेगा नहीं।'
फिर दोनों हाथ फैलाकर बोले- 'जोर से हंसो! इस हास्यकाल में डूब जाओ। गोते लगाओ। पूरी तरह भीग जाओ। जब नेता से लेकर चपरासी, धन्ना सेठ से लेकर भिखारी-सब हंस रहे हैं, तो पता नहीं तुम्हारे अंदर कौन-सी कुंठा है कि तुम हंसने वालों पर प्रश्न उठा रहे हो!'
जुम्मन मियां हंसते रहे। मैं चुपचाप खड़ा रहा।
फिर अचानक मैं भी हंसने लगा। हम दोनों एक-दूसरे के हंसने पर हंसने लगे। मोहल्ले की खिड़कियों पर खड़े लोग हमें देखकर हंसने लगे। धीरे-धीरे पूरा मोहल्ला एक हंसी के कांसर्ट में तब्दील हो गया।
(राष्ट्रीय पुरस्कार सम्मानित फिल्मकार एवं बेस्टसेलिंग लेखक)
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