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अटेंशन पेरेंट्स! जिसे आप 'टाइम पास' समझ रहे हैं, वही बना रहा है टीनएजर्स को अकेलेपन का शिकार

Published: Tue, 07 Apr 2026 07:39 AM (IST)

न्यूरोसाइंस के विज्ञानियों का कहना है कि किशोरों का मस्तिष्क सही और गलत पहचानने के लिए पूरी तरह विकसित नहीं होता है।

लाइक कमेंट किशोरों को बना रहा इंटरनेट मीडिया का आदी (Image Source: AI-Generated)

लाइक कमेंट किशोरों को बना रहा इंटरनेट मीडिया का आदी (Image Source: AI-Generated)

HighLights

  1. लाइक-कमेंट से डोपामिन हार्मोन का स्तर बढ़ता है

  2. इससे अनुभव महसूस करने की इच्छा बढ़ती है

  3. ज्यादा स्क्रीन टाइम से बढ़ रहा है अकेलापन

द कंवर्सेशन, टोरंटो। लॉस एंजिलिस की एक अदालत ने हाल में फैसला दिया कि इंटरनेट मीडिया कंपनी मेटा और वीडियो प्लेटफार्म यूट्यूब के ऐसे डिजाइन फीचर्स ने एक किशोर यूजर को नुकसान पहुंचाया, जो लत लगाने वाले साबित हुए। अदालत के अनुसार इससे शरीर को लेकर असंतोष, अवसाद और आत्महत्या जैसे विचार पैदा हुए।

विशेषज्ञ इसे इंटरनेट मीडिया का 'बिग टोबैको मोमेंट' मान रहे हैं, क्योंकि बच्चों और किशोरों का कोमल मन तेजी से इसके प्रभाव में आ रहा है। इस फैसले के बाद इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म पर कड़े नियम बनाने की मांग तेज हो गई है।

  • इंटरनेट मीडिया पर ज्यादातर समय बिताने वाले यूजर दोस्तों से भी कम संपर्क रखते हैं, इससे बढ़ रहा अकेलापन
  • मस्तिष्क की अधूरी बनावट के चलते नकारात्मक टिप्पणियों और सामाजिक दबाव से जल्दी तनाव में आते हैं किशोर

Social media addiction

(Image Source: AI-Generated)

लाइक्स और कमेंट्स दे रहे हैं आपके बच्चे को नकली खुशी

आस्ट्रेलिया, फ्रांस और स्पेन जैसे देशों ने बच्चों के लिए आयु सीमा तय कर दी है, जबकि कनाडा में अभी ऐसे कानून नहीं हैं। न्यूरोसाइंस के विज्ञानियों ने इस पहेली को सुलझाने का प्रयास किया कि बच्चों के इंटरनेट मीडिया का आदी बनने का खतरा ज्यादा क्यों है।

न्यूरोसाइंस के विज्ञानियों के अनुसार किशोरों के मस्तिष्क का वह हिस्सा, जो खुशी और इनाम महसूस करता है, पूरी तरह विकसित नहीं होता। इंटरनेट मीडिया पर मिलने वाले लाइक, कमेंट और प्रतिक्रियाएं दिमाग में डोपामिन हार्मोन बढ़ाती हैं, जिससे बार - बार वही अनुभव महसूस करने की इच्छा बढ़ती जाती है। यही कारण है कि किशोर जल्दी इसके प्रभाव में आ जाते हैं।

प्यूबर्टी और ब्रेन का ये कनेक्शन कर देगा हैरान

विशेषज्ञ किशोर मस्तिष्क को निर्माणाधीन हाइवे से तुलना करते हैं। लिम्बिक सिस्टम भावनाओं को तेजी से संचालित करता है, जबकि प्री-फ्रंटल कोर्टेक्स, जो निर्णय और आत्मनियंत्रण का केंद्र है, अभी पूरी तरह विकसित नहीं होता। इसी कारण किशोर नकारात्मक टिप्पणियों और सामाजिक दबाव से अधिक प्रभावित होते हैं।

दूसरों की तथाकथित परफेक्ट जिंदगी देखकर उनमें तुलना, असुरक्षा और पीछे छूट जाने का डर बढ़ता है । लगातार लाइक और कमेंट पर नजर रखने से तनाव बढ़ता है, खासकर किशोर लड़कियों में, क्योंकि यौवनावस्था में उनका मस्तिष्क सामाजिक संकेतों के प्रति अधिक संवेदनशील होता है।

digital loneliness

(Image Source: AI-Generated)

सिर्फ 'अकेलापन' परोस रहा है इंटरनेट

शोध बताते हैं कि इंटरनेट मीडिया पर बिताया जाने वाला अधिकांश समय वास्तविक संवाद में नहीं, बल्कि स्क्रोलिंग और वीडियो देखने में जाता है। इंस्टाग्राम पर केवल 7 प्रतिशत और फेसबुक पर 17 प्रतिशत समय ही दोस्तों से सीधे जुड़ने में खर्च होता है। इससे जुड़ाव का भ्रम तो पैदा होता है, लेकिन भीतर अकेलापन बढ़ता है। अधिक उपयोग से नींद कम होती है, मोटापा बढ़ता है और मानसिक तनाव गहराता है। विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों के लिए उम्र सीमा, जिम्मेदार प्लेटफार्म डिजाइन और डिजिटल शिक्षा अब जरूरी हो गई है । यह कदम न केवल किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा करेगा, बल्कि उन्हें इंटरनेट मीडिया के हानिकारक प्रभावों से भी बचाएगा।

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