ऑर्केस्ट्रा के गाने नहीं, ये है बिहार का असली म्यूजिक; ननद-भौजाई की तीखी-मीठी तकरार को बयां करता है ये कजरी गीत
बिहार में सावन और भादो के महीने में महिलाएं कजरी खेलती हैं, जिस दौरान कजरी गीत गाए जाते हैं।

ननद-भाभी की बातचीत से बना है ये कजरी गीत (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। अक्सर लोग सोचते हैं कि बिहार में सिर्फ पवन सिंह या खेसारी लाल यादव के गाने बजते हैं, लेकिन यहां एक से बढ़कर एक लोकगीत गाए जाते हैं। यहां हर अवसर और मौके के लिए आपको लोकगीत जरूर सुनने को मिल जाएंगे। इन्हीं लोकगीतों में शामिल है कईसे खेले जईबू सावन में कजरिया।
दरअसल, ये एक कजरी गीत है, जिसे सावन और भादो के महीने में गाया जाता है। ये गीत बिहार के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र में भी काफी मशहूर है। ये गीत सिर्फ बारिश के स्वागत के लिए नहीं गाया जाता। इसमें महिलाओं के मन की खुशी और उल्लास को भी बयां किया जाता है। आइए जानें इस कजरी गीत में क्या कहा जा रहा है।
क्या कहता है ये लोकगीत?
इस गीत में ननद और भौजी यानी भाभी के बीच की बातचीत को बहुत ही मजेदार तरीके से दिखाया गया है। गीत की शुरुआत में भाभी अपनी ननद से कहती है कईसे खेले जईबू सावन में कजरिया, बदरिया घिर आईल ननदी। यानी ननदी तुम कजरी खेलने कैसे जाओगी? बादल घिर आए हैं और बारिश होने वाली है।
इसके बाद भाभी कहती है तू तौ जात हौ अकेली, कौनो संग न सहेली, गुंडा रोकि लींहें तोहरी डगरिया बदरिया घेरे आईल ननदी। यानी तुम कजरी खेलने अकेले जा रही है, तुम्हारी कोई सहेली भी साथ नहीं है अगर किसी गुंडे ने तुम्हारा रास्ता रोक लिया तो क्या करोगी। यहां भाभी की उसकी ननद की सुरक्षा के लिए चिंता बयां की जा रही है।
ननद का तीखा जवाब
भाभी के सावधान करने पर ननद थोड़ा झल्लाकर व्यंग्य के साथ जवाब देती है। भौजी बोलेलू तू बोली, सुनिके लागल हमार गोली, काहे पड़ल बाड़ू हमरी नगरिया, बदरिया घिर आईल ननदी। यानी अब ननद झल्लाकर कहती है कि तुम्हारी बातें मेरे सीने में गोली की तरह लग रही है। तुम मेरे ही घर में मुझे क्यों डरा रही है। ननद के जवाब में शिकायत के साथ आत्मविश्वास भी देखने को मिल रहा है कि वो अपने घर में काफी सुरक्षित है।
कानून पर भरोसा
इस गीत के अंत में कहा जाता है केतने दामुल फांसी चढ़िगे, केतने गोली खाके मरिगे; केतने पीसत होइहैं जेल में चकरिया, बदरिया घेरि आइल ननदी। इस गीत में ननद कह रही है कि कितने गुंडों को फांसी दे दी गई, कितने पुलिस की गोली से मारे गए और कितने आज भी जेल में चक्की पीस रहे हैं। इसलिए मुझे कजरी खेलने जाने दो। मुझे कोई चिंता नहीं है।
समाज का आईना
लोकगीतों की खासियत होती है कि उनमें मनोरंजन का जरिया होने के साथ-साथ समाज का आईना भी होती हैं। इस कजरी गीत में भी महिलाओं के मन की चिंता और सुरक्षा के बारे में बताया जा रहा है।
