न तलवार जरूरी, न ताकत का दिखावा... केरल की इस प्राचीन युद्धकला में शरीर ही बन जाता है हथियार
क्या आप जानते हैं कि केरल के दक्षिणी हिस्से में एक ऐसी शानदार मार्शल आर्ट है, जो सिर्फ दुश्मनों से लड़ना नहीं, बल्कि खुद पर काबू पाना भी सिखाती है?

जानिए केरल की प्राचीन युद्धकला 'थेक्कन कलरी' के बारे में (Image Source: AI-Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। जब भी भारत की प्राचीन युद्ध कलाओं का जिक्र होता है, तो केरल का नाम सबसे ऊपर आता है। इसी राज्य के दक्षिणी हिस्सों में कलरिपयट्ट की एक बहुत ही खास और पारंपरिक शैली अपनाई जाती है, जिसे हम 'थेक्कन कलरी' के नाम से जानते हैं।
मलयालम भाषा में 'थेक्कन' शब्द का सीधा-सा अर्थ 'दक्षिण' होता है। इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि इस कला की जड़ें तमिलनाडु के कन्याकुमारी इलाके की कलरी परंपराओं से भी गहराई से जुड़ी हुई हैं।
सिर्फ मारधाड़ नहीं, संतुलन और लचक का है बेहतरीन मेल
इस युद्धकला की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें केवल जोर-आजमाइश या ताकत का प्रदर्शन नहीं होता। इसके बजाय, इसमें लड़ने की कला के साथ-साथ शरीर के लचीलेपन, तेज रफ्तार और गजब के संतुलन का एक अद्भुत संगम देखने को मिलता है।
इस विधा को सीखने का असली मकसद महज अपने सामने खड़े दुश्मन को हराना नहीं है। यह कला व्यक्ति को अपने ही शरीर पर पूरा काबू पाना, शारीरिक फुर्ती बढ़ाना और खुद की रक्षा करना सिखाती है। इसमें बिना हथियारों के लड़ने के तरीकों, शरीर को मोड़ने की कला और पैरों की खास मूवमेंट पर बहुत बारीकी से काम किया जाता है।
'मर्म' बिंदुओं का अनूठा ज्ञान
थेक्कन कलरी का इतिहास बेहद दिलचस्प है, जिसमें 'मर्म-ज्ञान' का बहुत अहम रोल है। मर्म दरअसल हमारे शरीर के उन नाजुक और बेहद संवेदनशील हिस्सों को कहा जाता है, जहां हल्का-सा प्रभाव डालकर भी प्रतिद्वंद्वी को पछाड़ा जा सकता है।
लेकिन इस पारंपरिक कला की सबसे खूबसूरत बात यह है कि मर्म का ज्ञान सिर्फ लड़ाई के मैदान तक सीमित नहीं है। इसका इस्तेमाल चोटों के उपचार यानी इलाज के लिए भी किया जाता रहा है। इस लिहाज से देखा जाए तो थेक्कन कलरी महज लड़ाई-झगड़े की तकनीक नहीं, बल्कि कड़े अनुशासन, शरीर की साधना और पुराने ज्ञान को सहेजने वाली एक पूरी जीवनशैली है।
गुरु-शिष्य का रिश्ता और कड़ा प्रशिक्षण
केरल की इस पुरानी कलरी परंपरा में गुरु और शिष्य के पवित्र रिश्ते को हमेशा सर्वोपरि रखा गया है। इसे सीखने के लिए कड़े अनुशासन और बिना नागा किए जाने वाले अभ्यास की जरूरत होती है।
आइए जानते हैं कि इसकी मुख्य ट्रेनिंग में किन बातों पर जोर दिया जाता है:
- लचीलापन है जरूरी: ट्रेनिंग के दौरान ऐसी कसरतों को सबसे ज्यादा अहमियत दी जाती है, जो शरीर को रबर की तरह लचीला बना सकें।
- पैरों की गति और संतुलन: शारीरिक संतुलन बनाए रखने और पैरों को तेजी से चलाने की तकनीक सिखाई जाती है। साथ ही, निहत्थे रहकर अपनी जान कैसे बचानी है, इसका कौशल भी सिखाया जाता है।
- हथियारों की ट्रेनिंग: खाली हाथ लड़ने के अलावा, लाठी, तलवार-ढाल और कई अन्य पारंपरिक हथियारों को सही तरीके से चलाने का अभ्यास भी इस प्रशिक्षण का अहम हिस्सा है।
यह भी पढ़ें- भाले, बरछे और ढाल से रचा गया कुमाऊं का 'छोलिया', चंदवंश की रानियां भी थीं 1000 साल पुराने इस नृत्य की दीवानी!
