‘गरबा नहीं, नौरता है बुंदेलखंड की पहचान...’ सिर पर मटकी, कदमों में थिरकन; नौ दिनों तक निभाती हैं बेटियां ये लोकपरंपरा
शारदीय नवरात्र के दौरान बुंदेलखंड में गरबा की जगह 'नौरता' नामक एक विशेष लोकनृत्य किया जाता है।

बुन्देलखंडी लोकपरंपरा का अहम हिस्सा है नौरता नृत्य (Image Source : AI Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आजकल शारदीय नवरात्र शुरू होते ही शहरों में गरबा डांस का चलन बढ़ गया है, लेकिन मां दुर्गा से जुड़ा यह नौ दिनों का पर्व नवरात्र सिर्फ गुजराती गरबा तक ही सीमित नहीं है। मध्य प्रदेश के बुन्देलखंड क्षेत्र में इन दिनों में बेहद ही खास लोकनृत्य किए जाने की परंपरा है, जिसे नौरता कहा जाता है।
बुन्देलखंडी लोकपरंपरा का अहम हिस्सा है नौरता नृत्य
मध्य प्रदेश का उत्तर पूर्वी इलाका यानी बुन्देलखंडी क्षेत्र अपनी अनूठी परंपरा के लिए जाना जाता है और नौरता नृत्य इसका अहम हिस्सा है। यह डांस कुंवारी कन्याएं देवी दुर्गा को समर्पित नौ दिनों के दौरान करती हैं। इस नृत्य को करने से पहले घर के बाहर गेरू, हल्दी, छुई, पत्तों की मदद से प्राकृतिक रंगों से सुअटा, चंदा-सूरज और चौक बनाए जाते हैं।
जान लेने वाली बात यह है कि चौक की आकृति नौ दिनों तक हर दिन अलग-अलग डिजाइन वाली होती है। इसके बाद कुंवारी लड़कियां अच्छे जीवनसाथी और खुशहाल जिंदगी के लिए इस नृत्य की शुरुआत करती हैं।
क्या है नौरता नृत्य से जुड़ी मान्यता?
नौरता नवरात्र शब्द का ही एक अपभ्रंश रूप है, जिसकी जड़ें बुन्देलखंड की एक लोककथा से जुड़ी हुई हैं। कहते हैं कि ‘सुआटा’ नाम का एक भयंकर दानव था, जो कुंवारी कन्याओं को खा जाता था। दानव से परेशान होकर लड़कियों ने नवरात्र के दिनों में माता पार्वती की पूजा-अर्चना शुरू की।
इसके बाद माता ने उस दानव का संहार किया था। तब से ही कुंवारी लड़कियां नवरात्र के दिनों में देवी की आराधना करने के साथ ही नौरता नृत्य भी करती हैं।
चौक के चारों ओर घूमते हुए थिरकती हैं लड़कियां
कुंवारी लड़कियां सबसे पहले रंग-बिरंगी लहंगा-चुनरी और पारंपरिक गहने पहनकर तैयार होती हैं। फिर चौक के चारों तरफ गोल घेरा बनाकर अपने सिर पर सजी हुई मटकियां रखती हैं। इसके बाद लोकगीतों की धुन पर तालियों की थाप और कदम से कदम मिलाकर लयबद्ध तरीके से नृत्य शुरू किया जाता है।
वहीं, हाथों की मुद्राओं की बात करें तो इस डांस को करते समय नर्तकियां हाथों को कमर के पास रखने के साथ ही शरीर के दोनों तरफ हिलाया-डुलाया जाता है। बताते चलें कि नृत्य की शुरुआत और अंत दोनों में देवी की आराधना करने की भी खास परंपरा है। पर आज आधुनिक दौर में लोगों के बदलते रुझानों के बीच यह नृत्य कहीं छिप गया है।
