मामूली विवाद और फिर मर्डर... युवाओं में क्यों बढ़ रहा है क्रिमिनल माइंडसेट, क्या है इसके पीछे की साइकोलॉजी?
आजकल अक्सर ऐसी खबरें सुनने को मिल रही हैं कि छोटी-छोटी बातों पर युवा या कम उम्र के टीनएजर्स मर्डर ...और पढ़ें

क्यों हिंसक हो रहे हैं युवा? (AI Generated Image)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। पिछले कुछ समय से न्यूज चैनल और सोशल मीडिया पर लगातार ऐसी खबरें आ रही हैं, जहां मामूली विवाद या शादी न करने की चाह में युवा मर्डर करने में भी नहीं हिचकिचा रहे हैं। हाल ही में, केतन अग्रवाल मर्डर केस चर्चा में है। इस मामले में केतन की मंगेतर सिया गोयल ने अपने बॉयफ्रेंड के साथ मिलकर उसकी हत्या कर दी और यह सिर्फ एकलौता मामला नहीं है।
आए दिन किसी कूरियर बॉय पर हमला कर देना, आपसी झगड़े में जानलेवा वार करना, रोक-टोक करने पर माता-पिता की हत्या कर देना या किसी को गहरी खाई में धकेल देने जैसी घटनाएं सामने आती रहती हैं, जिन्हें कम उम्र के किशोर और युवा अंजाम दे रहे हैं।
ऐसे में सवाल आता है कि युवा पीढ़ी आखिर इतनी आक्रामक क्यों होती जा रही है? इतनी संवेदनहीनता कहां से आ रही है? इस सवाल का जवाब जानने के लिए हमने सीनियर साइकोलॉजिस्ट डॉ. मोनिका शर्मा से बात की। आइए जानें इसके पीछे छिपे मनोवैज्ञानिक कारण।
इंटरनेट और वॉयलेंट कंटेंट की पहुंच
आजकल हर किसी के पास स्मार्टफोन और इंटरनेट की सुविधा है, जिसके कारण हिंसक वीडियो गेम्स, मिसोजिनिस्टिक कंटेंट और साइबर बुलिंग काफी आम हो गए हैं। इस तरह का कंटेंट युवाओं के दिमाग को हिंसा के लिए असंवेदनशील बना रहा है। उनके लिए मारपीट और वायलेंस काफी सामान्य व्यवहार बन जाता है।
मेंटल हेल्थ की समस्या और कम सहनशीलता
आज के युवाओं में एंग्जायटी, डिप्रेशन और अकेलेपन की समस्या काफी बढ़ गई है। पढ़ाई का दबाव, नौकरी न मिलने का गुस्सा और सोशल मीडिया पर दूसरों से तुलना के कारण वे अक्सर स्ट्रेस में रहते हैं। जब इस फ्रस्ट्रेशन से बाहर निकलने का रास्ता नहीं मिलता, तो वे अपनी भावनाओं से काबू खो देते हैं और छोटी-मोटी बातों पर भी हिंसक हो जाते हैं।
अंदर दवा गुस्सा
आज के समय में दोनों पेरेंट्स वर्किंग हो गए हैं। ऐसे में बच्चे घर पर काफी समय अकेले रहते हैं, जिससे उन्हें इमोशनल सपोर्ट की कमी महसूस होने लगती है। कई घरों में बच्चे मार-पीट या रोज-रोज के झगड़े देखकर बड़े होते हैं। इनके अंदर दबा गुस्सा अचानक हिंसा का रूप लेकर भूटता है। ऐसे युवा या कम उम्र के टीनएजर्स सही-गलत में फर्क नहीं कर पाते।
पीयर प्रेशर, गैंग्स और रील
अपने दोस्तों को बीच कूल बनने या इज्जत कमाने के लिए कई बार रिस्की काम करना शुरू कर देते हैं। सोशल मीडिया पर खुद को ताकतवर दिखाने के लिए भी युवा गैंग बना लेते हैं। इसके कारण भी युवा हिंसक अपराध को अंजाम देने में नहीं हिचकिचा रहे हैं।
बेरोजगारी और पैसों की तंगी
बेरोजगारी, गरीबी और अवसरों की कमी के कारण युवाओं में फ्रस्ट्रेशन पैदा होता है। पैसे कमाने की चाह या अपनी लाचारी के गुस्से के कारण भी कई बार अपराध के रास्ते पर निकल पड़ते हैं। ऐसा वे खुद को मजबूत और ताकतवर दिखाने के लिए करते हैं।
मी कल्चर और नैतिकता खत्म होना
आज के समय में मी कल्चर यानी मैं और मेरी मर्जी का चलन काफी बढ़ गया है। दूसरों की तरफ सहानुभूति खत्म होती जा रही है। ऐसे में छोटी-मोटी बातों और मतभेदों पर भी युवा हिंसा पर उतर आते हैं, क्योंकि उनमें इंपल्स कंट्रोल की कमी आ गई है।
कानून को कमजोर समझना
आम धारणा है और कुछ मामलों में हकीकत भी कि नाबालिगों को कम सजा मिलती है या कोई ठोस सजा नहीं मिलती। इसलिए कम उम्र के टीनेजर्स या युवा हिंसक कदम उठाने से पहले घबराते नहीं हैं। कई मामलों में ये भी मान लिया जाता है कि माता-पिता अमीर हैं, तो उन्हें कुछ नहीं होगा। कई हाई प्रोफाइल मामलों में यह देखा भी गया है। पूणे बीएमडब्लयू केस इसी का एक उदाहरण है।
क्या है समाधान?
यह समझना बेहद जरूरी है कि सभी युवा या पूरी जनरेशन हिंसक नहीं है, लेकिन जो मामले सामने आ रहे हैं वे एक गंभीर खतरे की घंटी हैं। इस समस्या को केवल पुलिस या कड़े कानूनों से नहीं सुलझाया जा सकता। इसके लिए माता-पिता को बच्चों को समय देना होगा, स्कूलों में मेंटल हेल्थ और नैतिक शिक्षा पर ध्यान देना होगा।
