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सिर्फ चित्रकार नहीं, अपने दौर के इतिहासकार भी थे जोगेन चौधरी; उनकी कला में दर्ज है एक पूरा युग

Published: Sun, 01 Nov 2026 11:58 AM (IST)

जोगेन चौधरी के जाने से भारतीय कला का एक स्वर्णिम अध्याय समाप्त हो गया है। विभाजन की वेदना और स्वतंत्र ...और पढ़ें

अनंत रेखाओं का चितेरा (Image Source: AI-Generated)

अनंत रेखाओं का चितेरा (Image Source: AI-Generated)

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संदीप भूतोड़िया, कोलकाता। कला जगत के अमिट हस्ताक्षर जोगेन चौधरी 87 वर्ष की आयु में, लंबी बीमारी के बाद हमें छोड़कर चले गए। उनके महाप्रयाण से भारतीय आधुनिक कला का एक गौरवशाली स्वर्णिम अध्याय समाप्त हो गया है। कोलकाता की सांस्कृतिक धड़कन अब थोड़ी शांत हो गई है। वे हमारी संस्था 'द बंगाल' के प्राण थे। अभिनेता सौमित्र चटर्जी ने रसेल स्ट्रीट स्थित मेरे घर पर सबसे पहले हमारी मुलाकात कराई थी। इसके बाद जोगेन-दा मेरी आधी रात की 'अड्डा' बैठकों का एक नियमित हिस्सा बन गए, जहां कला, कविता और संगीत का प्रवाह भोर तक चलता रहता था।

विभाजन का दंश रहा साथ

जोगेन चौधरी का जन्म 16 फरवरी, 1939 को फरीदपुर जिले के दहरपारा में हुआ था, जो अब बांग्लादेश में है। कला बचपन से ही उनके जीवन का हिस्सा थी। उनके पिता प्रमथनाथ चौधरी पौराणिक कथाओं से प्रेरित मूर्तियां और चित्र बनाते थे, जबकि मां इंदु देवी अल्पना बनाने में कुशल थीं। विभाजन ने उनके हंसते-खेलते परिवार को उजाड़ दिया और वे कोलकाता आ गए। विस्थापित परिवारों की अनिश्चितताओं-अभावों, शरणार्थी बस्तियों के अनुभवों, गरीबी और राजनीतिक अशांति से जूझ रहे शहर ने उनके मानस पर कभी न मिटने वाली छाप छोड़ी। उनकी कला शैली विस्थापन, संवेदनशीलता और अस्तित्व के संघर्ष का दस्तावेज बन गई। 20वीं शताब्दी के पांचवें दशक में उन्होंने सियालदह स्टेशन के आसपास शरणार्थियों के रेखाचित्र बनाए। ये चित्र असाधारण परिस्थितियों में फंसे आम लोगों के सूक्ष्म अवलोकन थे।

अनूठी कला शैली का विकास

जोगेन दा ने 1960 में गवर्नमेंट कालेज आफ आर्ट एंड क्राफ्ट से स्नातक किया। 1965 में एक फ्रांसीसी सरकारी छात्रवृत्ति के सहारे वे पेरिस पहुंचे। उन्होंने यूरोपीय कला से जो आवश्यक था उसे ग्रहण किया और अपनी यादों तथा परिवेश में रची-बसी एक अनूठी दृश्य भाषा विकसित की। अब पेन-स्याही, पेस्टल और क्रास-हैचिंग पर उनकी महारत अतुलनीय बन गई। विशिष्ट आकृतियां, अतिशयोक्तिपूर्ण रूप, रहस्यमयी अभिव्यक्तियां और अंधेरे-उजाले का असाधारण खेल पूरी तरह से उनके अपने थे। उनकी कलाकृति को पहचानने के लिए किसी हस्ताक्षर को खोजने की आवश्यकता नहीं होती थी, उनकी एक एकल रेखा ही इसकी पहचान के लिए काफी थी। कला इतिहासकार आर. शिव कुमार ने लिखा था कि जोगेन चौधरी की कला की लय प्रकृति और परिवेश के प्रति उनके जुड़ाव से आती है। उनकी कुछ सबसे प्रसिद्ध कलाकृतियां इस असाधारण विस्तार को दर्शाती हैं। 'टाइगर इन द मूनलिट नाइट' एक ऐसी ही रचना है जहां इच्छा, संवेदनशीलता और हिंसा एक साथ मिलती हैं। 'लीडर इन ए रेनबो सोफा' सत्ता के अहंकार और अजीबोगरीब रूप को उजागर करती है। वहीं 20वीं शताब्दी के सातवें-आठवें दशक में उनकी चित्र श्रृंखला 'रेमिनिसेंस आफ ए ड्रीम' में स्मृति और कल्पना एक ही रहस्यमयी धरातल पर निवास करते हैं।

बात करती रहेंगी उनकी रेखाएं

युवा कलाकारों के साथ उनका जुड़ाव बेहद महत्वपूर्ण था। कोलकाता में चारूबासोना संग्रहालय के साथ 'जोगेन चौधरी सेंटर फार आर्ट्स' की स्थापना इसी का परिणाम थी। वे एक कवि भी थे और 1970 में उनका कविता संग्रह 'हृदोय ट्रेन बेजे ओथे' प्रकाशित हुआ था। वे 2014 से 2020 तक राज्यसभा सांसद भी रहे। जोगेन दा ने यह साबित किया कि भारतीय आधुनिकता को पश्चिमी आंदोलनों की नकल करने की आवश्यकता नहीं है, यह कोलकाता की सड़कों और विभाजन की स्मृतियों से भी उभर सकती है। बचपन में बेघर होने वाले इस कलाकार ने अपना बाद का जीवन दूसरों को अपनापन देने में बिताया। उनके जाने से भले ही अड्डा खत्म हो गया हो, लेकिन उनकी रेखाएं हमेशा बात करती रहेंगी!

सहज व्यक्तित्व वाले महान कलाकार

भारतीय कला जगत में जोगेन दा का योगदान कैनवास की दुनिया से कहीं आगे तक फैला हुआ था। उन्होंने 1972 से 1987 तक राष्ट्रपति भवन में कीपर आफ आर्ट के रूप में 15 साल बिताए। 1987 में वे विश्व-भारती (शांतिनिकेतन) के कला भवन में प्रोफेसर और प्रिंसिपल के रूप में शामिल हुए। रवींद्रनाथ टैगोर, नंदलाल बोस और बिनोद बिहारी मुखर्जी द्वारा आकार दिए गए इस बौद्धिक परिदृश्य में उन्होंने कलाकारों की एक नई पीढ़ी को संवारा। कोलकाता म्यूजियम आफ माडर्न आर्ट के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने भारतीय संस्कृति के संरक्षण की वकालत की। वे अविभाजित बंगाल की सांस्कृतिक विरासत और स्वतंत्र भारत की आधुनिक कलात्मक कल्पना के बीच अनूठी निरंतरता के प्रतीक थे। मैं उन्हें एक ऐसे सहज व्यक्ति के रूप में जानता था जो जेब में छोटा कैमरा रखते थे। वे साथी कलाकारों के अनौपचारिक पलों को चुपचाप कैद कर लेते थे।

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