क्यों मनाया जाता है अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस और क्या है इसका महत्व? यहां पढ़ें पूरी कहानी
अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस हमें समाज के उन सच्चे शिल्पकारों की याद दिलाता है, जो बिना किसी शोर-शराबे के दुनिया को आगे बढ़ा रहे हैं।

क्यों मनाया जाता है अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस? (Image Source: Freepik)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। क्या आपने कभी सोचा है कि आसमान छूती शानदार इमारतें, मीलों लंबी सड़कें और हमारी थाली में सजा अन्न कहां से आता है? यह सब उन करोड़ों अनजान हाथों की देन है, जो बिना थके दिन-रात पसीना बहाते हैं।
आदिमानव के पत्थर घिसने से लेकर आज की डिजिटल दुनिया तक, इंसान की हर तरक्की की नींव में सिर्फ और सिर्फ 'श्रम' मौजूद है। मिट्टी में जान फूंककर उसे खूबसूरत बर्तन बनाने वाले कुम्हार से लेकर, खेतों को आबाद करने वाले किसान तक, हर मजदूर एक सच्चा रचनाकार है।

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8 घंटे की शिफ्ट के पीछे का संघर्ष
आज दफ्तरों या कारखानों में 8 घंटे काम करने का नियम हमें बहुत मामूली बात लगती है, लेकिन यह अधिकार किसी ने तोहफे में नहीं दिया है। 19वीं सदी में औद्योगिक क्रांति के दौर में मजदूरों से जानवरों की तरह 12 से 16 घंटे काम लिया जाता था। इस भयानक शोषण के खिलाफ 1 मई 1886 को अमेरिका में एक बड़ा आंदोलन भड़का। मजदूरों की मांग साफ थी- "आठ घंटे काम, आठ घंटे आराम और आठ घंटे मनोरंजन।"
शिकागो के हैमार्केट स्क्वायर में इसी मांग को लेकर इकट्ठा हुए मजदूरों पर हिंसा हुई और कई बेगुनाह मारे गए। इस शहादत ने पूरी दुनिया की आंखें खोल दीं। इसी घटना की याद में 1889 में पेरिस के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में यह तय किया गया कि हर साल 1 मई को 'अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस' के रूप में मनाया जाएगा।
गुलामी के दौर से नए कानूनों तक
अंग्रेजों के शासन में भारतीय मजदूरों का भी जमकर शोषण हो रहा था। इस जुल्म के खिलाफ आवाज उठाने के लिए साल 1920 में 'ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस' की नींव रखी गई। भारत की धरती पर पहली बार मजदूर दिवस 1 मई 1923 को मद्रास (अब चेन्नई) में मनाया गया था। इसकी शुरुआत 'लेबर किसान पार्टी ऑफ हिंदुस्तान' ने की थी।

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देश आजाद होने के बाद हमारे संविधान ने मजदूरों के हितों का पूरा ध्यान रखा। उनके लिए न्यूनतम मजदूरी कानून (1948), औद्योगिक विवाद कानून (1947) और पीएफ कानून (1952) जैसी अहम नीतियां बनाई गईं। आज के समय में सरकार 'लेबर कोड्स' लाकर इन नियमों को और आसान बना रही है। हालांकि, आज भी एक बड़ी चुनौती हमारे सामने है- देश की एक बड़ी श्रमशक्ति आज भी असंगठित क्षेत्र में काम कर रही है, जहां नौकरी और भविष्य की कोई गारंटी नहीं होती।
आज की नई चुनौतियां
वक्त के साथ काम करने के तरीके बदल गए हैं। आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑटोमेशन के कारण कई पुराने रोजगार छिन रहे हैं। आजकल 'गिग इकॉनमी' का चलन बहुत बढ़ गया है, जिसमें लोग डिलीवरी एजेंट, कैब ड्राइवर या फ्रीलांसर के तौर पर काम कर रहे हैं। इन कामों में समय की आजादी तो है, लेकिन स्वास्थ्य बीमा, पेंशन या नौकरी की सुरक्षा बिल्कुल नहीं है।

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इसके अलावा, कोरोना महामारी ने हमारी व्यवस्था की पोल खोल कर रख दी थी। काम छिनने के बाद जब लाखों प्रवासी मजदूर पैदल अपने गांवों की ओर लौटे, तो पूरी दुनिया ने देखा कि बिना मजबूत सामाजिक सुरक्षा के, मजदूरों की जिंदगी कितनी बेबस हो जाती है।
बता दें, मजदूर सिर्फ कारखानों में उत्पादन बढ़ाने वाले पुर्जे नहीं हैं, वे देश के विकास की असली धुरी हैं। जब तक समाज के हर मेहनतकश इंसान को पूरा सम्मान और सुरक्षा नहीं मिलेगी, तब तक सच्ची तरक्की नहीं हो सकती।
