भेड़ों को लड़ते देखा और बना दिया लोकनृत्य! कुछ ऐसी है गुजरात के ‘हूडो’ की अनोखी कहानी, जिसमें नाचते हुए लड़कियां चुनती हैं अपना हमसफर
गुजरात में गरबा के अलावा हूडो भी एक लोकप्रिय नृत्य है, जिसमें महिलाएं नाचते हुए अपना जीवनसाथी खुद चुनती हैं।

भेड़ों की लड़ाई से शुरू हुआ गुजरात का ‘हूडो’ (Image Source: AI Generated)

समय कम है?
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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। लोकनृत्य और लोकगीतों की उत्पत्ति की बात करने पर हम हमेशा इसका संबंध प्रकृति से पाते हैं। कभी किसी कंघे से लोकगीत का जन्म होता है तो कभी ऊंट के गहने से। आज हम ऐसे ही एक और लोकनृत्य की बात करेंगे, जिसका नाम है 'हूडो'। आइए जानते हैं कैसे रवाहों ने पशुओं के खेल से इस नृत्य की रचना कर डाली।
भेड़ों की लड़ाई से शुरू हुआ गुजरात का ‘हूडो’
‘हूडो’ लोकनृत्य का संबंध गुजरात के चरवाहा समुदाय भारवाड़ जनजाति से है। कहते हैं कि इस लोकनृत्य की शुरुआत किसी उत्सव या संस्कृति से नहीं, बल्कि भेड़ों की लड़ाई से हुई थी। जब दो भेड़ एक दूसरे से सिर टकराकर आपस में लड़ रही थीं, तब इसी गतिविधि को गौर से देखकर भारवाड़ जनजाति के लोग बाद में हूबहू दोहराते थे। फिर समय बीतता गया और इस गतिविधि ने नृत्य का रूप ले लिया और इस तरह ‘हूडो’ लोकनृत्य का जन्म हुआ।
नृत्य के अंत में चुनते हैं अपना जीवनसाथी
‘हूडो’ लोकनृत्य की सबसे खास बात यह है कि इस नृत्य में महिलाएं और पुरुष दोनों ही भाग ले सकते हैं। हर साल गुजरात के सुरेंद्रनगर जिले के तरनेतर गांव में तरनेतर मेले का आयोजन किया जाता है। इसी वार्षिक मेले में आज भी स्वयंवर की अनूठी परंपरा निभाई जा रही है। यहां आदिवासी समुदाय के लोग सज-धज कर आते हैं, ‘हूडो’ नृत्य करते हैं और सबसे आखिर में अपने जीवनसाथी का चुनाव भी करते हैं।
पारंपरिक वेशभूषा और आभूषण
नर्तक कढ़ाईदार रंग-बिरंगी धोती, कोटी, रंगीन झालर वाली टोपी वाली पारंपरिक वेशभूषा में रहते हैं। इसके साथ कडू, तावीज, कड़ी और रंग-बिरंगी माला वाले चांदी के आभूषण भी पहनते हैं। वहीं, महिलाएं गहरे रंग की पारंपरिक वेशभूषा जिमी, कपड़ू, ओढ़नी में रहती हैं। इस दौरान लंबा हार, छोटा हार, झुमके, चूडला, कडू और दामिनी जैसे आभूषण पहनती हैं।
कैसे करते हैं यह नृत्य?
‘हूडो’ काफी तेज गति में ऊर्जा के साथ किया जाने वाला लोकनृत्य है। इसमें शादी के योग्य पुरुष अपने साथ रंगीन सजी हुई छतरी लिए रहते हैं। डांस की शुरुआत धीमी गति से ढोल, ढोलक, मंजीरे और बांसुरी की धुन पर होती है, फिर जैसे-जैसे वाद्य यंत्रों की धुन बढ़ने लगती है, गति भी तेज होती जाती है।
इस नृत्य का सबसे अहम हिस्सा वही भेड़ों की तरह टकराना है, जिसमें सभी नर्तक सिर टकराने की मुद्रा में रहते हैं। फिर इसे लयबद्ध तरीके से दोहराया जाता है और बीच-बीच में महिलाएं पुरुषों की हथेलियों में ताली बजाते हुए नृत्य करती हैं।
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