‘अंबरसरे दे पापड़..’ इस ठेठ पंजाबी गीत में खाने के बहाने पति की अकड़ निकालती है पत्नी; गिद्दे पर खूब जमती है महफिल
अंबरसरे दे पापड़ एक मशहूर पंजाबी लोकगीत है जो अमृतसर की खान-पान संस्कृति को दर्शाता है।

‘अंबरसरे दे पापड़, वे मी खांदी ना…..’ ‘फूड कैपिटल ऑफ पंजाब’ से जुड़ा है यह लोकगीत (Image Source: AI Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। पापड़, वड़ियां और छोले पंजाबी थाली की शान बढ़ाते हैं, इनका नाम सुनकर किसी के भी मुंह में पानी आने लगे। पर हम यकीन के साथ कह सकते हैं कि इस बार जब आप इन खाने-पीने की चीजों का नाम सुनेंगे तो खाने का नहीं, थिरकने का मन करने लगेगा। जी हां, आज हम इन्हीं पकवानों को केंद्र में रखते हुए पंजाब के एक मशहूर पारंपरिक लोकगीत ‘अंबरसरे दे पापड़’ की बात करने वाले हैं।
‘फूड कैपिटल ऑफ पंजाब’ से जुड़ा है यह लोकगीत
‘अंबरसरे दे पापड़, वे मी खांदी ना…..’ से शुरू होने वाले इस पंजाबी लोकगीत को जिस जोशीले अंदाज में गाया गया है, उसे सुनकर आपको एक तरफ नाचने का मन करेगा। वहीं, दूसरी तरफ इसके बोल ऐसे हैं कि पंजाबी रसोई का स्वाद आ जाएगा।
इस गीत में अमृतसर के खानपान की संस्कृति को बड़ी ही खूबसूरती पेश किया गया है, जैसे- अमृतसरी पापड़, अमृतसरी छोले, अमृतसरी लुचिया या पूरियां और अमृतसरी वड़ियां। फिर हम यह भी नहीं भूल सकते कि अमृतसर ही वो शहर है जिसे पंजाब की 'खान-पान की राजधानी' यानी ‘फूड कैपिटल ऑफ पंजाब’ कहा जाता है।
खाने के बहाने पत्नी मारती हैं पति को ताने
हमेशा से लोकगीत की पहचान ही यही रही है कि इसमें रोजमर्रा में काम आने वाली चीजों को प्रतीक के तौर पर दिखाया जाता है। इसी तरह ‘अंबरसरे दे पापड़…’ गीत में भी खाने के बहाने तीखा व्यंग्य छिपा हुआ है। नायिका शुरुआत में कहती है कि ‘अंबरसरे दे पापड़ वे मी खांदी ना, तू करे वे आकड़ वे मैं सेहँदी ना…’ यानी वो अपने पति पर तंज कस रही है कि मुझे पापड़ नहीं खाने और तुम जो इतनी अकड़ दिखा रहे हो, उसे मैं सहन नहीं करने वाली। इसी तरह वड़ियों, छोले और लुचिया का भी जिक्र आता है।
गिद्दे की धड़कन और ठेठ पंजाबी बोलियों का खास मेल
जिस अनोखे अंदाज में तंज कसते हुए इसे गाया गया है, वो पंजाब की महशूर बोलियां लोकगायन शैली पर आधारित है। इसे अक्सर शादी-ब्याह के फंक्शन्स जैसे मेहंदी, हल्दी और संगीत के मौके पर गाया जाता है। इस दौरान महिलाएं तालियों और ढोलक की थाप पर मजाकिया अंदाज में एक दूसरे को चिढ़ाते हुए गिद्दा करती हैं। फिर महफिल में जो ऊर्जा और रौनक आती है, उसके क्या ही कहने।
