होली पर अब नहीं चलेगा ‘बुरा न मानो...’ का बहाना, Gen-Z कैसे बदल रही है त्योहार के मायने
युवा पीढ़ी 'बुरा न मानो होली है!' को बदलकर अब कंसेंट वाली होली मनाना ज्यादा पसंद कर रही है।
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बिना पूछे रंग लगाना है नहीं है 'कूल' (AI Generated Image)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। होली का त्योहार आते ही चारों ओर ‘बुरा न मानो होली है!’ की गूंज सुनाई देने लगती है। इस लाइन का इस्तेमाल सालों से लोग होली पर लोगों को जबरदस्ती रंग लगाने के लिए करते आए हैं। ऐसे में कई लोगों को न चाहते हुए भी रंग लगवाना पड़ता है या कुछ लोगों की बदतमीजियों को नजरअंदाज करना पड़ता है, लेकिन अब समय बदल रहा है।
आज की युवा पीढ़ी जेन-जी होली को हुड़दंग के साथ नहीं, बल्कि सहमति और सम्मान से मनाने पर जोर दे रही है। आइए समझें कैसे जेन-जी ‘बुरा न मानो होली है!’ के मायने बदल रही है।
सहमति सबसे पहले
जेन-जी के लिए सहमति सबसे अहम है। पुराने समय में माना जाता था कि होली है तो रंग तो लगेगा ही, चाहे आपका मन हो या नहीं। इसके कारण महिलाओं को खासकर काफी परेशानी झेलनी पड़ती थी, लेकिन आज के युवा इस सोच को बदल रहे हैं। अब बिना सहमति के रंग लगाना या छूना दुर्व्यवहार माना जाता है, फिर चाहे होली का त्योहार ही क्यों न हो।
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(Picture Courtesy: Freepik)
हुड़दंग की जगह सुरक्षित माहौल
जेन-जी ने त्योहार के नाम पर होने वाली छेड़खानी और अभद्रता को मजाक समझना बंद कर दिया है। पहले सड़कों पर निकलने वाली महिलाओं को अक्सर डर रहता था कि गुब्बारे या रंग के बहाने उन्हें कोई छेड़ न दे। आज की पीढ़ी ऐसे व्यवहार को टॉक्सिक मानती है। वे सुरक्षित और इनक्लूसिव माहौल बनाने पर जोर दे रहे हैं, जहां हर कोई, चाहे वह महिला हो या बच्चा हो खुलकर बिना किसी डर के शामिल हो सके।
सोशल मीडिया और डिजिटल एक्टिविज्म
जेन-जी अपनी बात कहने के लिए तकनीक और सोशल मीडिया का बखूबी इस्तेमाल कर रही है। कंसेंट इन होली जैसे हैशटैग्स और रील के जरिए इस मुद्दे पर काफी आवाज उठाई गई है। वे केवल अपनी सुरक्षा की बात नहीं करते, बल्कि उन लोगों के लिए भी आवाज उठाते हैं जो भीड़ से घबराते हैं। इस पीढ़ी ने यह नेरेटिव सेट किया है कि त्योहार मनाने का हर किसी का अपना तरीका हो सकता है, कोई नाचकर मनाना चाहता है, तो कोई सिर्फ अपनों के साथ शांति से।
मेंटल हेल्थ और बाउंड्रीज
इस पीढ़ी के लिए मेंटल हेल्थ और पर्सनल बाउंड्रीज बहुत मायने रखती हैं। वे ‘बुरा न मानो होली है’ के पीछे छिपी आक्रामकता को पहचानते हैं। जबरदस्ती रंग लगाने से होने वाली बेचैनी या त्वचा की एलर्जी जैसी समस्याओं को अब गंभीरता से लिया जा रहा है। जेन-जी का मानना है कि त्योहार का आनंद तभी है जब वह दूसरों की मानसिक और शारीरिक शांति को भंग न करे।
युवा अब रंग लगाने से पहले पूछते हैं, "क्या मैं आपको रंग लगा सकता हूं?" यह एक छोटा-सा सवाल समाज में एक बड़े बदलाव का प्रतीक है।
