‘आंगन’ से ‘लिविंग रूम’ तक, रहन-सहन की बदलती शैली ने हिंदी के इन शब्दों को भी कर दिया बेगाना
मॉडर्न होता यह जमाना भाषा में भी बड़ी तेजी से बदलाव कर रहा है।

हिन्दी के वो शब्द जो समय के साथ गायब हो गए (Image Source: AI Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। हिन्दी भाषा के इतिहास पर नजर डालें तो हम पाते हैं कि कैसे अपभ्रंश से हिन्दी बनने तक, इस भाषा ने अनेकों चरण देखे। फिर जैसे-जैसे समय बीतता गया जीवनशैली के बदलने से और हिन्दी के सरल भाषा हो जाने से रोजमर्रा में कहे जाने वाले कुछ शब्द गायब ही हो गए।
आज हम हिन्दी के उन्हीं शब्दों की बात करेंगे और जानेंगे कि आखिर क्यों ये शब्द अब हमारी बोलचाल की भाषा का भी हिस्सा नहीं।
आंगन
पुराने घरों में बीचों-बीच एक ऐसा स्थान हुआ करता था, जिसे हम आंगन कहते थे। आजकल के घरों की वास्तुकला में या यूं कहें कि मॉडर्न फ्लैट सिस्टम में आंगन को इतना महत्व नहीं दिया जा रहा। उस समय आंगन धूप, बारिश और ठंडी हवा का जरिया होने के साथ बड़े-बूढ़ों के बैठने और बच्चों के खेलने-कूदने की भी खास जगह होती थी।
बैठक
आज घरों में जिसे हम 'ड्राइंग रूम' या 'लिविंग एरिया' कहने लगे हैं, वह पहले बैठक कहलाती थी। घर का एक ऐसा हिस्सा जहां आस पड़ोस के लोगों और दूर दराज से आने वालों की मेहमान नवाजी की जाती थी। कभी-कभी तो बैठक देश-दुनिया और राजनीति पर बहस का अड्डा तक बन जाया करती थी।
चौपाल
गांव की वो बड़ी सी बैठक आज कहां ही शहरों में देखने को मिलती है। यह वो खास जगह होती थी जहां गांव के सभी लोग बैठकर अपना सुख-दु:ख एक दूसरे से साझा करते थे। गांव के हर छोटे-बड़े फैसलों वाली पंचायत भी इसी जगह पर लगती थी। अब जब चौपाल ही नहीं है तो लोग इस शब्द का इस्तेमाल कर ही नहीं सकते।
ओसरी
आज शहरी जीवनशैली में ओसरी की जगह बालकनी ने ले ली है, लेकिन पारंपरिक जीवनशैली में ओसरी हमारी बोलचाल का हिस्सा हुआ करता था। यह भारतीय घरों में घर के मुख्य दरवाजे और कमरों की बीच का बरामदे जैसा हिस्सा होता था, जो छत से ढका होता था।
अटारी
पहले के घरों के सबसे ऊपरी हिस्से यानी छत पर एक कमरा बनाया जाता था, जिसे लोग अटारी कहा करते थे। यह कमरा आमतौर पर एक स्टोरेज रूम की तरह इस्तेमाल होता था, जिसमें घर के राशन से लेकर पुराने सामान तक बहुत कुछ रखते थे। आज के समय में यह शब्द मुश्किल ही कोई कहता है।
पंगत
हो सकता है यह हिन्दी का शब्द आपने सुना ही न हो, जबकि यह भाईचारे का सबसे बड़ा प्रतीक था। दरअसल, पहले जब एक पंक्ति में जमीन पर बैठकर लोग भोजन करते थे, तब इस तरीके को पंगत का नाम दिया गया। डाइनिंग टेबल और बूफे वाले तौर-तरीकों में इस शब्द के साथ यह संस्कृति भी कहीं खो सी गई है।
पगडंडी
पगडंडी शब्द आज सुनने को नहीं मिलता, इसका मतलब होता है खेतों और गांव के बीच का संकरा मार्ग। शहरों में कंक्रीट की चौड़ी सड़कें तो मिलती हैं, पर पगडंडी पर चलने का सुकून इस शब्द के साथ ही गायब हो चला है।
