नखरे भी, फरमाइश भी! इस बुंदेली लोकगीत में दिखता है पति-पत्नी के प्यार का रंग, दिल जीत लेते हैं चटपटे बोल
बुंदेली लोकगीत "मोहे बीते बरस दो-चार सजन, कंगना बनवा दो सोने के..." दांपत्य जीवन की खट्टी-मीठी नोकझोंक और प्यार को दर्शाता है।

इस बुंदेली लोकगीत में छिपी है सुहागिन की अनोखी फरमाइश (Image Source: AI-Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। भारतीय शादियों की असली रौनक ढोलक की थाप, मंजीरे की खनक और महिलाओं की हंसी-ठिठोली के बिना बिल्कुल अधूरी है। घर के आंगन में होने वाले संगीत कार्यक्रमों में कुछ ऐसे गीत गाए जाते हैं, जो सीधे दिल में उतर जाते हैं।
बुंदेलखंड क्षेत्र का ऐसा ही एक बेहद चुलबुला लोकगीत है- "मोहे बीते बरस दो-चार सजन, कंगना बनवा दो सोने के..."। जी हां, यह गाना सिर्फ एक आम धुन नहीं है, बल्कि दांपत्य जीवन की खट्टी-मीठी नोकझोंक और प्यार का एक बहुत ही खूबसूरत इजहार है।
जब शर्माना छोड़कर पति पर हक जताती है पत्नी
उत्तर भारत के कई राज्यों, विशेषकर उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में यह गाना बड़े चाव से गाया जाता है। इस गीत के बोलों में एक पत्नी अपने पति से बड़े ही लाड़ और हक से कह रही है कि, "हमारी शादी को अब कुछ साल बीत चुके हैं, अब तो मुझे सोने के कंगन उपहार में दे दो!"
पुराने समय में जब महिलाएं अपनी छोटी-छोटी इच्छाएं सीधे तौर पर नहीं कह पाती थीं, तब वे लोकगीतों का ही सहारा लेती थीं। अपनी सहेलियों और परिवार की महिलाओं के बीच गाए जाने वाले इन गीतों के जरिए वे मुस्कुराते हुए अपने सजन तक दिल की बात पहुंचा दिया करती थीं।
हर पंक्ति में बसी है दांपत्य जीवन की मिठास
इस बुंदेली लोकगीत में पत्नी अपने पति से केवल कंगन ही नहीं, बल्कि आगे चलकर कई और तरह की फरमाइशें भी करती है। गीत के अलग-अलग अंतरों में वह दांपत्य जीवन की छोटी-छोटी जरूरतों और अन्य गहनों, जैसे- पायल, बिछिया या हार की मांग बड़े ही मीठे अंदाज में रखती है, जिससे दोनों के बीच का प्यार और भी निखर कर आता है।
इस लोकगीत की कुछ मशहूर पंक्तियां इस प्रकार हैं:
"मोहे बीते बरस दो-चार सजन,
कंगना बनवा दो सोने के...
कंगना पे लिखवा दो मेरो नाम सजन,
कंगना बनवा दो सोने के..."
इस लोकगीत के बोल भले ही बहुत सीधे लगते हों, लेकिन इनके पीछे छिपे जज्बात बहुत गहरे हैं। यह सिर्फ गहने मांगने की बात नहीं है, बल्कि यह पति-पत्नी के रिश्ते के उस पड़ाव को दर्शाता है जहां दोनों के बीच का शुरुआती संकोच खत्म हो जाता है और एक प्यारा-सा हक जन्म लेता है।
गांव के आंगन से निकलकर रील्स पर छाए इसके बोल
एक समय था जब यह पारंपरिक गीत केवल शादियों या त्योहारों के दौरान गांव के आंगनों तक ही सीमित था। हालांकि, आज के इंटरनेट और डिजिटल युग में इसका जलवा पूरी तरह बदल गया है। अब यह गीत सिर्फ पुराने जमाने का महिला संगीत नहीं रहा, बल्कि आधुनिक संगीतकारों और युवा गायकों ने इसे नए अंदाज में ढाल दिया है। आज यह धुन सोशल मीडिया, यूट्यूब और इंस्टाग्राम की ट्रेंडिंग रील्स पर छाई रहती है।
बदलते वक्त के साथ हमारी जीवनशैली चाहे जितनी भी आधुनिक हो जाए, लेकिन हमारी संस्कृति की असली महक आज भी इन्हीं लोकगीतों में रची-बसी है।
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