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ब्रिटिश दौर में भी चलता था भोपाल रियासत का अपना डाक सिस्टम, रोचक है गुलामी के दौर की यह कहानी

Published: Wed, 19 Aug 2026 02:43 PM (IST)

जिस दौर में देश गुलाम था, उस दौर में भोपाल डाक व्यवस्था के मामले में एकदम आजाद था।

भोपाल रियासत में डाक टिकट शुरू होने का इतिहास (Image Source: AI Generated)

भोपाल रियासत में डाक टिकट शुरू होने का इतिहास (Image Source: AI Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। इतिहास पर नजर डालें तो भोपाल एक ऐसी रियासत थी जिसकी अपनी डाक व्यवस्था हुआ करती थी। जब भारत पर ब्रिटिश शासक का कब्जा था, उस समय भोपाल का नाम उन चुनिंदा रियासतों में आता था जिसे अपने नाम से डाक टिकट छापने का खास अधिकार मिला हुआ था। 

चलिए आपको भोपाल रियासत के डाक टिकट इतिहास के बारे में विस्तार से बताते हैं। 

भोपाल रियासत में डाक टिकट शुरू होने का इतिहास 

भोपाल में डाक व्यवस्था साल 1847 में नवाब सिकंदर जहां बेगम के शासनकाल में शुरू हुई थी। उस समय डाक टिकट केवल सरकारी कामकाज में ही इस्तेमाल में लाई जाती थीं लेकिन थोड़े समय बाद इनका उपयोग आम लोगों का संदेश भेजे जाने के लिए भी किया जाने लगा। 

उस दौर में भारत पर ब्रिटिश राज कर रहे थे, ऐसे में भारत के ज्यादातर राज्य और रियासतें अंग्रेजों की डाक व्यवस्था पर ही निर्भर थीं। भोपाल इसमें अपवाद निकला क्योंकि उसकी अपनी सेवा थी। बता दें कि डाक व्यवस्था भले ही पहले से थी लेकिन पहली डाक टिकट 25 साल बाद यानी साल 1872 में नवाब शाहजहां बेगम के समय में जारी किया गया था।

पत्थरों पर हाथ से छपते थे डाक टिकट 

इतिहास में यह बात दर्ज है कि शुरू-शुरू में डाक टिकट की छपाई गवर्नमेंट सुल्तानिया प्रेस में लिथोग्राफी तकनीक से पत्थरों पर हाथ की मदद से की जाती थी। इसमें भी सबसे खास बात यह थी कि हर एक डाक टिकट का मैनुअल डिजाइन होता था, इसी वजह से कोई भी दो डाक टिकट एक जैसी नहीं दिखती थीं। 

वहीं, इन टिकटों को बनाने में बहुत सारी वर्तनी और प्रिंटिंग की गलतियां होती थीं, जिन्हें बाद में एक अनोखी वैरायटी समझकर सहेजा गया। 

भोपाल की राजचिह्न मछलियां थीं पहचान 

समय के साथ इसकी प्रिंटिंग प्रेस में भी बदलाव हुआ और 1908 से ब्रिटेन की प्रसिद्ध परकिन एंड बेकन कंपनी इनकी छपाई करने लगी। यह सभी डाक टिकट भोपाल रियासत की थीं इसकी सबसे बड़ी पहचान थी इसपर बनी दो राजचिह्न मछलियां। बता दें कि साल 1936 से 1947 के बीच जो डाक टिकट जारी हुई उसमें बाघ और चित्तीदार हिरण जैसे वन्यजीवों को भी खास जगह दी गई। 

गलत डाक टिकट भी हुईं लाखों में नीलाम 

गलत वर्तनी और प्रिटिंग वाली डाक टिकट व्यर्थ नहीं गईं, बल्कि इनकी नीलामी लाखों में हुई। किसी डाक टिकट पर NAWAB की जगह NWAB लिखा था तो किसी पर BEGUM की जगह BEGAN। NWAB वाली करीब 20 डाक टिकट साल 2020 में नीलाम की गई थीं, उसे लंदन की ग्रोसवेनर फिलैटेलिक ऑक्शंस में ₹1.43 लाख रु. में खरीदा गया। 

वहीं, BEGAN या BFGAM जैसे नामों वाली करीब 20 डाक टिकटों की साल 2023 में ₹54,500 में नीलामी की गई। NWAB वर्तनी वाली एक शीट को ₹2.80 लाख में नीलाम किया गया था।