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'बदलूराम का बदन...': शहादत के बाद कैसे एक सिपाही ने बचाई पूरी रेजिमेंट की जान? हैरान कर देगी इस गाने की कहानी

Published: Wed, 16 Sep 2026 09:32 AM (IST)

असम रेजिमेंट के 'बदलू राम का बदन' गाने के पीछे एक दिलचस्प कहानी छिपी है।

क्या है 'बदलूराम का बदन' गाने की कहानी (Picture Courtesy: YouTube)

क्या है 'बदलूराम का बदन' गाने की कहानी (Picture Courtesy: YouTube)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। असम रेजिमेंट का मशहूर मार्चिंग सॉन्ग बदलूराम का बदन सिर्फ एक गाना नहीं है। ये गाना द्वीतिय विश्व युद्ध के दौरान एक भारतीय सैनिक के साहस और बलिदा की कहानी है। ये गाना आज भी असम रेजिमेंट में बहुत गर्व और जोश के साथ गाया जाता है। आइए जानें क्या है बदलूराम का बदन गाने के पीछे की कहानी। 

कौन थे सिपाही बदलूराम?

ये कहानी द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान की है। उस समय भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था और ब्रिटेन भी युद्ध का हिस्सा था। जापान के खिलाफ जंग में भारतीय सेना भी उतरी थी, जिसमें देश के पूर्वी छोड़ पर असम रेजिमेंट तैनात थी। इस रेजिमेंट में राइफलमैन बदलूराम भी शामिल थे, जो युद्ध के दौरान शहीद हो गए थे।

क्वाटरमास्टर की समझदारी

सेना के हर यूनिट के लिए राशन का हिसाब रखने के लिए एक क्वाटरमार्सटर होता था। जब कोई सैनिक शहीद होता, तो उसका नाम रोल से हटाकर उच्च अधिकारियों को रिपोर्ट किया जाता था, ताकि उसके हिस्से का राशन आना बंद हो जाए। 

हालांकि, असम रेजिमेंट के क्वाटरमास्टर ने अपनी बुद्धिमानी से भविष्य का अंदाजा लगा लिया था और बदलूराम का नाम लिस्ट से नहीं हटाया। इसके कारण बदलूराम के नाम का राशन लगातार रेजिमेंट को मिलता रहा और उनके हिस्से का राशन लगातार जमा होता रहा। 

घेराबंदी और बदलूराम का राशन

युद्ध के दौरान पूर्वोत्तर भारत के कोहिमा और इंफाल के क्षेत्रों में जापानी सेना ने भीषण आक्रमण किया और ब्रिटिश आर्मी की सप्लाई लाइन को काट दिया। ये इलाका घने जंगलों से घिरा हुआ था और सैनिकों के लिए राशन पहुंचाना काफी मुश्किल हो गया था।

रेजिमेंट पूरी तरह कट चुकी थी और बाहर से खाना या राशन आना बिल्कुल नामुमकिन हो गया था। तब बदलूराम के हिस्से का जमा राशन सैनिकों के काम आया। कई दिनों तक चली इस घेराबंदी के दौरान असम रेजिमेंट के जवानों ने वही राशन खाकर अपनी जान बचाई और युद्ध में टिकी रही। 

बलिदान और कृतज्ञता का प्रतीक

अगर बदलूराम का राशन न होता, तो भुखमरी के कारण रेजिमेंट का टिक पाना नामुमकिन था। युद्ध के बाद राइफलमैन बदलूराम के लिए सम्मान जाहिर करने के लिए जवानों ये गाना तैयार किया- 

"बदलूराम का बदन जमीन के नीचे है

तो हमको उसका राशन मिलता है।"

गाने में बदलूराम के बलिदान और उनके लिए सेना की कृतज्ञता को बयां किया गया है। कृतज्ञता, बलिदान और हास्य से भरपूर ये गाना असम रेजिमेंट का हिस्सा है।