अवधी भाषा का वो लोकगीत, जिसके हर एक शब्द में छिपा है बेटी का दर्द, समाज को दिखाता है आईना
लोकगीत खुशी या जश्न के मौके पर ही नहीं गाए जाते, कभी-कभी ये समाज को आईना दिखाते हैं।

समाज की कुरीतियों को दर्शाता अवधी लोकगीत (Image Source: AI Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। लोकगीत सिर्फ शादी-ब्याह जैसे शुभ अवसरों पर ही नहीं गाए जाते, कई बार ये समाज की दुर्दशा के बारे में भी बताते हैं। आज हम ऐसे ही एक अवधी लोकगीत की बात करेंगे, जो शादी की उम्र को लेकर बेटी की आवाज बना था। यह गीत मनोरंजन भले ही नहीं करता, पर समाज को अपनी सदियों पुरानी कुरीतियों पर सोचने को मजबूर करता है।
समाज की कुरीतियों को दर्शाता अवधी लोकगीत
यहां बात अवधी लोकगीत ‘अबहीं बारी है हमारी उमिरिया बाबा…..’ की हो रही है, जिसे समाज सुधार गीत से जोड़कर देखा जाता है। जब-जब बात ग्रामीण इलाकों में बेटियों की कम उम्र में शादी को लेकर हुई, तब-तब लोकगायकों ने लड़कियों के दु:ख को शब्दों में परिवर्तित कर एक गीत की रचना कर दी। हम यह भी कह सकते हैं कि ये गीत खुद बेटियों की ही आवाज हैं।
शब्दों में छिपा है गहरा मतलब
इस गीत की शुरुआत ‘अबहीं बारी है हमारी उमिरिया बाबा, डारो शादी की अबहीं ना बेडिया बाबा’ से होती है। इसमें लड़की अपने पिता से कह रही है कि अभी तो उसकी खेलने-कूदने की उम्र है, इसलिए इतनी जल्दी मुझे शादी की बेड़ियों में मत बांधो।
‘मै तोरी बगिया की नाजुक कलिया, डोले फिरूँ तोरे अँगना महलिया, तोहरे घरवा की हम हैं अंजोरिया बाबा’ इसके बाद गीत में बेटी पिता के घर में अपने महत्व को समझाने की कोशिश कर रही है।
अपने अधिकार की गुहार लगाता है यह गीत
इसके बाद की पंक्तियां न केवल मार्मिक हैं, वह अपने अधिकार की भी गुहार लगाती नजर आती हैं:
‘कच्चा घडा जैसन हमरी बदनिया
गलि जाई बाबा परी जब पनिया
छाई हमरे जीवन मे अन्हरिया बाबा’
इन पंक्तियों का मतलब एकदम साफ है कि बेटी अपने ऊपर अधिकार जता रही है। वह कह रही है कि उसका शरीर अभी कच्चे घड़े जैसा है, अगर इसपर गृहस्थी रूपी पानी पड़ा तो यह गल जाएगा और उसके जीवन अंधकार में चला जाएगा।
अवधि लोकगीत में स्त्री प्रतिरोध का स्वर
पुरुष प्रधान समाज में जहां फेमिनिज्म को समाज का विरोधी स्वर माना जाता है, वहीं यह अवधी लोकगीत इस बात का प्रमाण है कि सदियों पहले भी स्त्रियों के लिए आवाज उठाई जा रही थी। बस उसका अंदाज भाषण या कोई लेख न होकर गीत हुआ करता था, यानी स्त्री प्रतिरोध की यह परंपरा आदिम है।
