सोशल मीडिया पर वायरल यह धुन सुनकर लगेगा ‘दुल्हन रूठी है पिया से’, पर 700 साल पुराने गीत की कहानी है कुछ और
यह जरूरी तो नहीं कि गीत की पंक्तियां उसका वही मतलब कहती हों, कई बार मूल भाव कुछ और भी हो सकता है।

मोहे प्रीत की रीत... गीत 700 साल पहले अमीर खुसरो ने लिखा (Image Source: AI Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आजकल जब भी आप रील्स स्क्रॉल करते होंगे तो जरूर आपने एक धुन सुनी होगी, 'मोहे प्रीत की रीत न भाई सखी...' जाने कैसे यह गीत अचानक से सोशल मीडिया पर वायरल होने लगा। जबकि बहुत कम लोग कई सौ साल पुराने इस गीत का इतिहास जानते हैं।
ऐसे में आइए आपको इस वायरल गीत की कहानी बताते हैं कि आखिर यह गीत किसने और क्यों लिखा।
700 साल पुराना है गीत का इतिहास
इन दिनों वायरल हो रहे इस गीत को आज से 700 साल पहले प्रसिद्ध सूफी संत, कवि और संगीतकार अमीर खुसरो ने लिखा था। मोहे प्रीत की रीत न भाई सखी.....इस सूफी गीत की बीच की पंक्तियां हैं, क्योंकि इसकी शुरुआत जो ‘मैं जानती बिसरत हैं सैय्या, घुँघटा में आग लगा देती…’ से होती है। इसे उस दौर में लोक काव्य में प्रचलित ब्रज और अवधि भाषा में लिखा गया था।
प्रेम में विरह रस का प्रतीक
इस गीत की खासियत है कि यह विरह रस से भरा हुआ है, जिसमें एक नई नवेली दुल्हन अपनी सहेली को मन का हाल सुना रही है।
जो मैं जानती बिसरत हैं सैय्या, घुँघटा में आग लगा देती,
मैं लाज के बंधन तोड़ सखी पिय प्यार को अपने मना लेती।
इस पंक्ति में नई दुल्हन अपनी सखी से कह रही है कि अगर मुझे पता होता कि मेरे पति मुझे इस तरह से भुला देंगे तो मैं पहले ही अपने घूंघट में आग लगा देती। इसका मतलब है कि वो दुनियाभर की लोकलाज को एक तरफ अपने प्रियतम को मना लेती।
मोहे प्रीत की रीत न भाई सखी, मैं तो बन के दुल्हन पछताई सखी।
होती न अगर दुनिया की शरम मैं तो भेज के पतियाँ बुला लेती।
वहीं, सोशल मीडिया पर वायरल इस पंक्ति में दुल्हन कहती है कि उसे प्रेम बिल्कुल भी रास नहीं आ रहा है और वह दुल्हन बनकर पछता रही है। वहीं, अगर उसे इस दुनिया का डर जरा भी न होता तो वह तुरंत एक चिट्ठी लिख अपने प्रियतम को पास बुला लेती।
दुल्हन और पति सांसारिक नहीं
यह सूफी कलाम पढ़ने से ऐसा लग सकता है कि यहां कोई दुल्हन अपनी सखियों से पति के लिए पीड़ा का बखान कर रही है, जबकि इसका मूल भाव कुछ और है। दरअसल, यहां न तो पति सांसारिक है और न दुल्हन ही। ऐसा इसलिए क्योंकि पहले के समय लिखा गया ज्यादातर सूफी काव्य सांसारिक मोह और प्रेम को माध्यम बनाकर अध्यात्म की बात करता था।
ऐसे में इसके असली अर्थ पर जाएं तो अमीर खुसरो ने पति की तुलना ईश्वर से और दुल्हन की तुलना आत्मा से की है, जिसमें मुक्ति पाने की असहनीय पीड़ा है। इस तरह यह गीत किसी पत्नी की अपने पति के लिए पीड़ा के बारे में न बताकर, आत्मा के ईश्वर से मिलन के विरह की कहानी कहता है।
