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मिथिलांचल के इस लोकगीत में सुनाई देती है शादीशुदा महिला की अनकही पीड़ा, 600 साल पहले लिखी गई थी कहानी

Published: Mon, 21 Sep 2026 04:56 PM (IST)

यह गीत मिथिलांचल की संस्कृति का अहम हिस्सा है और समाज की क्रूर प्रथाओं पर प्रकाश डालता है।

इस मैथिली गीत में छिपा है स्त्री का दर्द (Image Source :AI Generated)

इस मैथिली गीत में छिपा है स्त्री का दर्द (Image Source :AI Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। बिहार का उत्तरी हिस्सा मिथिलांचल कहलाता है, जहां की संस्कृति में बच्चे के जन्म पर सोहर, उपनयन संस्कार में जनेऊ गीत तो शादी में विवाह गीत और कोहबर गीत गाए जाते हैं। पर मिथिला के गीत जीवन के इस कालचक्र तक ही सीमित नहीं हैं, ये समाज की दुर्दशा के बारे में भी बताते हैं। 

आज हम ऐसे ही एक मार्मिक लोकगीत की बात करेंगे, जो एक महिला के साथ अन्याय की कहानी बताता है। 

इस मैथिली गीत में छिपा है स्त्री का दर्द 

हम बात कर रहे हैं "पिया मोर बालक, हम तरुणी गे" गीत की, जिसे 'मैथिल कोकिल' कहे जाने वाले महाकवि विद्यापति ने लिखा था। इस गीत में एक महिला की भावनाओं को गहराई से पेश किया गया है। इसमें एक नवविवाहिता स्त्री है जो अपने अकेलेपन, विवशता और समाज की क्रूर प्रथा को उजागर कर रही है। 

क्या कहते हैं इसके बोल? 

यह लोकगीत मिथिलांचल और बिहार के लोक संगीत का अहम हिस्सा माना जाता है, जिसे आज शारदा सिन्हा और मैथिली ठाकुर जैसे गायकों ने भी अपने संगीत में स्थान दिया है। 

‘पिया मोर बालक, हम तरूणि गे!

कौन तप चुकलौं भेलौ जननि गे!’

इस पंक्ति में युवती कहती है कि मेरे पति तो अभी बालक हैं और मैं जवान हो चुकी हूं। मुझसे पिछले जन्म में तपस्या करते हुए ऐसी कौन भूल हुई, जो मुझे यह दुर्भाग्य मिला। 

‘पहिरि लेल सखी दछिन चीर 

पिया के देखैत मोरा दगध शरीर’

इसके बाद युवती अपना शृंगार करने के बाद कहती है कि अपने अबोध बालक पति को देखते ही मेरा तन-मन विरह और उदासी से जलने लग जाता है। 

'पिया लेल गोद कै चलली बाजार 

हटिया के लोग पूछे के लागै तोहार'

गीत की यह लाइन बड़ी ही मार्मिक है क्योंकि नवविवाहित महिला अब अपने पति को गोद में लेकर बाजार को जाती है, जहां लोग उससे सवाल-जवाब कर रहे हैं कि यह बालक तेरा कौन लगता है। 

‘कही हुन बाबा के कीनै धेनु गाय

दुधवा पिआई के पोसत जमाई’

गीत में युवती यहीं नहीं रुकती, वह एक लाइन में अपने पिता पर भी तंज कसते हुए कहती है कि मेरे बाबा को एक गाय खरीदने को कहो ताकि उससे वो मेरे बालक पति का पालन-पोषण कर पाएं। 

गीत के बोल और उसके मतलब पर मतभेद

महाकवि विद्यापति के इस गीत को पढ़कर तो सीधे तौर पर समझ में यही आता है कि यहां एक स्त्री के बेमेल विवाह और बाल विवाह की बात की जा रही है। पर विद्वान इस गीत को सीधे तौर पर नहीं लेते और इसके बोल को जस के तस स्वीकार नहीं करते। उनका मानना है कि महाकवि विद्यापति ने इस गीत में सिर्फ एक स्त्री के वात्सल्य और रति भाव को ही नहीं बताया, उन्होंने पुरुषों के अपरिपक्वता की तरफ भी इशारा किया है। 

"बालक पति" एक अपरिपक्व पुरुष

इस गीत में "बालक पति" एक अपरिपक्व पुरुष का प्रतीक है, जिसे स्त्री की गरिमा और स्वतंत्रता समझ में ही नहीं आती। युवती का पति उम्र में तो बड़ा है, लेकिन मन से अभी भी अबोध बालक समान है। 

इस गीत का एक तीसरा पहलू भी है, क्योंकि इसमें भगवान श्री कृष्ण और गोपियों का जिक्र है तो यह भगवान कृष्ण के बाल रूप और गोपियों के यौवन की पीड़ा भी दर्शाता है। 

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