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दिल की मामूली कमजोरी भी बन सकती है अल्जाइमर का कारण, पढ़ें क्या कहती है नई रिसर्च

Published: Wed, 08 Jul 2026 08:46 AM (IST)

एक नए शोध से पता चला है कि दिल की मामूली कमजोरी भी दिमाग में अल्जाइमर से जुड़े हिस्सों को नुकसान पहुंचा सकती है।

दिल की बीमारी और अल्जाइमर के बीच संबंधों का पता चला (Image Source: AI-Generated)

दिल की बीमारी और अल्जाइमर के बीच संबंधों का पता चला (Image Source: AI-Generated) 

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लाइफस्टाइल डेस्क, प्रेट्र। क्या आप जानते हैं कि आपके दिल की सेहत का सीधा असर आपके दिमाग पर पड़ सकता है? जी हां, हाल ही में हुए एक शोध में यह हैरान करने वाली बात सामने आई है कि दिल की थोड़ी-सी भी परेशानी दिमाग में अल्जाइमर जैसी गंभीर बीमारी से जुड़े हिस्सों को नुकसान पहुंचा सकती है। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि इस नई रिसर्च में और क्या-क्या खुलासे हुए हैं।

दिल और दिमाग का गहरा कनेक्शन

'जर्नल ऑफ न्यूरोसाइंस' में प्रकाशित इस नई स्टडी से दिल की बीमारियों और हमारी सोचने-समझने की क्षमता के बीच एक गहरे संबंध का पता चला है। अध्ययन में यह पाया गया है कि अगर दिल में मामूली सी भी खराबी आ जाए, तो इससे दिमाग के टिश्यू को सूक्ष्म स्तर पर नुकसान पहुंचता है। रिसर्च के अनुसार, दिल की इसी मामूली खराबी और लंबे समय तक याददाश्त के कमजोर रहने के बीच का मुख्य कारण यही टिश्यू का डैमेज होना है।

कैसे हुई यह रिसर्च?

इस महत्वपूर्ण जानकारी को जुटाने के लिए 'लाइपजिंग हार्ट स्टडी' की गई, जिसमें कुल 73 मरीजों को शामिल किया गया था। इन सभी मरीजों की सेहत पर पूरे साढ़े तीन साल तक कड़ी नजर रखी गई।

रिसर्च के दौरान वैज्ञानिकों ने 'इजेक्शन फ्रैक्शन' पर ध्यान दिया। इजेक्शन फ्रैक्शन का मतलब है कि दिल के बाएं हिस्से से हर धड़कन के साथ कितना प्रतिशत खून बाहर पंप हो रहा है। स्टडी में यह संकेत मिला कि जिन प्रतिभागियों में यह खून पंप करने का प्रतिशत कम था, उनके दिमाग के 'ग्रे मैटर' में भविष्य में ज्यादा बदलाव या नुकसान देखने को मिला।

एक्सपर्ट्स की क्या है राय?

जर्मनी के 'मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन कॉग्निटिव एंड ब्रेन साइंसेज' की शोधकर्ता जिया झांग ने इस विषय पर एक नई दिशा दिखाई है। उनका कहना है कि दिल की बीमारी वाले मरीजों में दिमागी खतरों का पता लगाने के लिए अब एक नया तरीका अपनाया जा सकता है। यह तरीका है- दिमाग की माइक्रोस्ट्रक्चरल इंटीग्रिटी पर बारीकी से नजर रखना। इससे समय रहते दिमाग पर पड़ने वाले असर को समझा जा सकता है।

शुरुआती संकेत को न करें नजरअंदाज

इस अध्ययन की सबसे अहम बात यह है कि ये नतीजे उन मरीजों पर भी बिल्कुल सटीक पाए गए, जिन्हें कभी 'क्लिनिकल हार्ट फेलियर' का सामना नहीं करना पड़ा था। इसका सीधा सा मतलब यह है कि अगर दिल के काम करने के तरीके में कोई शुरुआती या मामूली सी भी दिक्कत आती है, तो इसे दिमाग के लिए एक शुरुआती चेतावनी या अलर्ट के तौर पर देखा जाना चाहिए।

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