विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की मानें तो भारत में 20 प्रतिशत से अधिक नई माताएं किसी-न-किसी तरह से प्रसवोत्तर अवसाद से ग्रस्त हैं। दरअसल, भारत में इस पर जागरुकता का घोर अभाव है। सबसे बड़ी समस्या है- हमारे समाज खासकर घर के पुरुषों का यह स्वीकार नहीं कर पाना कि बच्चे के जन्म के बाद मां मानसिक, शारीरिक एवं व्यावहारिक उतार-चढ़ाव से गुजर रही होती है, जो कई बार मां को गंभीर उदासी के भंवर में धकेल देता है। 

क्या है प्रसवोत्तर अवसाद?

मातृ एवं शिशु देखभाल के क्षेत्र में एक दशक से अधिक का अनुभव रखने वाले गुरुग्राम स्थित मेडहार्बर अस्पताल के संस्थापक एवं सीईओ निशांत गुप्ता कहते हैं, ‘प्रसव के तीन-चार हफ्ते बाद मांओं में उत्पन्न शारीरिक, भावनात्मक और व्यावहारिक परिवर्तनों के मिले-जुले रूप को प्रसवोत्तर अवसाद कहते हैं। चिकित्सकीय रूप से यह हार्माेन में अचानक गिरावट से संबंधित परिस्थिति है, लेकिन एक मां के जीवन में हो रहे सामाजिक और मनोवैज्ञानिक परिवर्तनों के कारण इसका असर अधिक है।

सोने में परेशानी, भूख में बदलाव, थकान या बार-बार मूड में बदलाव इसकी प्रमुख पहचान है। इसे रोकने के लिए जरूरी है कि मां को परिवार, खासकर पति द्वारा भरपूर भावनात्मक और शारीरिक सहयोग मिले। जच्चा-बच्चा के साथ अधिक-से-अधिक समय बिताया जाए, मां को सुखी एवं खुशहाल भविष्य के प्रति आश्वस्त किया जाए। इसके अलावा, स्थिति गंभीर होने पर मनोवैज्ञानिक परामर्श और दवाओं द्वारा इसका इलाज किया जा सकता है।’

भारत में वर्कप्लेस पर मातृत्व अवकाश की सबसे अच्छी नीतियों में से एक होने के बावजूद कॉरपोरेट हलकों में भी इस मुद्दे पर शायद ही कोई चर्चा हुई हो। हालांकि, आईटीसी समर्थित मदर स्पर्श जैसे कुछ ब्रांड ने हाल ही में #MomYouAreNotAlone अभियान शुरू किया है, ताकि नई माताओं और जागरूक लोगों में प्रसवोत्तर अवसाद पर स्वस्थ चर्चा शुरू की जा सके।

मदर स्पर्श के सह-संस्थापक और सीईओ डॉ हिमांशु गांधी के अनुसार, ‘मां बनना हर महिला के लिए एक नई शुरुआत है। यह मां के लिए बहुत सारा उत्साह, जिम्मेदारी, अपेक्षा और कभी-कभी सामाजिक दबाव भी लाता है। ऐसी परिस्थिति में नई माताओं को चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, फिर भी मां बनना तो जरूरी है। नई मां को अपनी नई भूमिका और जिम्मेदारियों में तालमेल बिठाने में मानसिक तंदुरुस्ती की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है। फैमिली सपोर्ट में कमी (शारीरिक और भावनात्मक), हार्माेनल चेंज, नींद की कमी और कई अन्य कारक प्रसवोत्तर अवसाद और चिंता को जन्म दे सकते हैं। #MomYouAreNotAlone का उद्देश्य मां को जच्चा-बच्चा दोनों की देखभाल करने के लिए प्रोत्साहित

करना है।

इस अभियान से जुड़ी मेटरनल चाइल्ड वेलनेस कोच डॉ. महिमा बक्शी कहती हैं, ‘प्रसवोत्तर अवसाद के बारे में खुलकर बात नहीं की जाती है। मैंने बहुत-सी माताओं को देखा है जिन्हें कहा जाता है कि वे इस विषय पर ज्यादा बात न करें या न पढ़ें। हमें महिलाओं को इसके बारे में पढ़ने या बात करने से रोकने के बजाय इस पर खुलकर बात करने के लिए उन्हें प्रेरित करने की जरूरत है। यह अभियान नई मां के मानसिक स्वास्थ्य एवं उनकी प्रसवोत्तर यात्रा पर चर्चा को सामान्य चर्चा का हिस्सा बनाने के बारे में है।  

याद रखें, प्रसवोत्तर अवसाद वास्तविक समस्या है और इसलिए इस पर चर्चा जरूरी है। अच्छी तरह से खाना, प्रसवोत्तर व्यायाम, चलना, ध्यान, शांत रहने की तकनीक और अपने लिए समय निकालने जैसी छोटी चीजें प्रसवोत्तर अवसाद को रोकने में प्रमुख भूमिका निभा सकती हैं।’ 

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Edited By: Priyanka Singh