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भारत में हर 68 में से 1 बच्चा ऑटिज्म का शिकार, डॉक्टर से जानें इसके जेनेटिक कारण और शुरुआती लक्षण

Published: Tue, 31 Mar 2026 11:00 AM (IST)

क्या जन्म के बाद से शिशु की गतिविधियां असामान्य हैं, क्या वह लोगों को देखकर हंसता-बोलता नहीं है या कोई ...और पढ़ें

बच्चों में बढ़ रहे हैं ऑटिज्म के मामले (Picture Courtesy: Freepik)

बच्चों में बढ़ रहे हैं ऑटिज्म के मामले (Picture Courtesy: Freepik)

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संक्षेप में पढ़ें

लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। बीते कुछ वर्षों में बच्चों में आटिज्म स्पेक्ट्रम डिसआर्डर (एएसडी) के मामले बढ़ गए हैं। शिशु के जन्म लेने के नौ महीने बाद से ही इस समस्या के संकेत दिखने लगते हैं, लेकिन अभिभावक उन्हें समझ नहीं पाते। 

हालांकि, तीन से चार साल की उम्र होते ही स्थिति साफ हो जाती है। अध्ययनों के अनुसार भारत में हर 68 में से एक बच्चा आटिस्टिक पाया जाता है। आंकड़ों के मुताबिक लड़कियों के मुकाबले लड़कों में यह समस्या अधिक दिखती है। आइए ऑटिज्म के बारे में डॉ. ओम साईं रमेश वल्लमकोंडा (बाल मनोरोग विभाग, लेडी हार्डिंग मेडिकल कालेज, दिल्ली) से जानते हैं। 

आनुवंशिक कारण हैं जिम्मेदार

जन्म से ही कुछ बच्चे आटिस्टिक क्यों होते हैं इसके पीछे कई कारण बताए जाते हैं, लेकिन जेनेटिक को अहम वजह माना गया है। जेनेटिक मतलब, जब माता-पिता के जीन से यह समस्या शिशु में आती है तब उसे जेनेटिक कहते हैं। अगर एक बच्चा पहले से आटिस्टिक है तो दूसरे बच्चे के भी आटिस्टिक होने की आशंका बढ़ जाती है।

अधिकांश मामलों में डीएनए में कई परिवर्तन आटिज्म के खतरे को बढ़ाते हैं। डीएनए में होने वाले अधिकांश परिवर्तन अपने आप आटिज्म का कारण नहीं बनते, बल्कि कई अन्य जीनों और पर्यावरणीय कारकों के साथ मिलकर बनते हैं। माता-पिता की दिनचर्या, खान पान, रहन सहन भी इस समस्या के लिए उतने ही जिम्मेदार बताए जाते हैं। कुछ बच्चों को मोनोजेनेटिक विकार और फ्रेजाइल एक्स सिंड्रोम की वजह से भी आटिज्म हो सकता है। हालांकि अब तक इस बीमारी के पीछे की ठोस वजह सामने नहीं आई है।

Autism (1)

(AI Generated Image)

हंसने, प्रतिक्रिया देने में अक्षम

  • बच्चे के जन्म के कुछ महीनों बाद से ही आटिज्म के लक्षण दिखाई देने लगते हैं, जैसे कम हंसना, आंखें चुराना, बातें न करना आदि।
  • जब शिशु किसी की गोद में जाकर हंसता नहीं या फिर आंखों से आंख नहीं मिलाता।
  • शिशु सुनता जरूर है लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं देता, तो भी आटिज्म हो सकता है।
  • कम बोलना या बोलने में कठिनाई होना भी हो सकता है।
  • छोटी-छोटी बातों पर बहुत जल्दी गुस्सा आ सकता है।
  • सोने में या नींद बनाए रखने में बहुत कठिनाई हो सकती है।
  • खाने-पीने में दिक्कत हो सकती है।
  • एक ही बात को बार बार दोहराते रहना जैसे लक्षण दिखते हैं।

दवा नहीं, थेरेपी है समाधान

भारत में आटिज्म के उपचार के रूप में केवल आक्युपेशनल और बिहेवियरल थेरेपी को ही सबसे ज्यादा कारगर माना गया है। इन थेरेपी के जरिए बच्चों को लोगों से संवाद करने, प्रतिक्रिया देने और हंसने में मदद की जाती है। ये थेरेपी आटिज्म से पीड़ित बच्चों की दैनिक गतिविधियों में भाग लेने की क्षमता को सुधारने में मदद करती है।

पेशेवर मनोचिकित्सकों की आवश्यकता

यह कहा जा सकता है कि दवाओं से इस बीमारी का इलाज संभव नहीं है। केवल थेरेपी और परिवार की मदद से ही बच्चा बेहतर महसूस कर सकता है, लेकिन थेरेपी के लिए कुशल और पेशेवर मनोचिकित्सकों की आवश्यकता है, जिसकी देश में काफी कमी है। बच्चा आटिस्टिक है या नहीं, इसकी पुष्टि करने के लिए कोई जांच भी नहीं होती है। केवल बच्चे के हाव-भाव और माता-पिता संग बातचीत करने के बाद ही स्थिति समझ आती है।