नई दिल्ली, लाइफस्टाइल डेस्क। अच्छी डाइट का पालन करना, हेल्दी रुटीन फॉलो करना और एक अच्छी लाइफस्टाइल जीने से ही अच्छी सेहत पाई जा सकती है। ऐसा न होने पर लगातार बीमारियों के शिकार होते हैं। ऐसी कई बीमारियां हैं जिसमें अतिरिक्त अटेंशन और देखभाल की ज़रूरत पड़ती है। इसमें से कई बीमारियों को साइलेंट किलर माना जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि इनके कोई शुरुआती लक्षण नहीं होते और यह अचानक गंभीर हो जाती हैं और कई बार मौत का कारण भी बनती हैं।

इस तरह के रोग धीरे-धीरे आपको मौत के करीब ले सकते हैं, इसलिए इन बामारियों के बारे में जानकारी रखना और इनकी प्रति सतर्क रहना बेहद ज़रूरी है। तो आइए जानें 6 ऐसी ही बीमारियों के बारे में जिन्हें साइलेंट किलर कहा जाता है और इनसे कैसे बचा जा सकता है।

हाई ब्लड प्रेशर

उच्च रक्तचाप या हाइपरटेंशन सबसे ख़तरनाक स्वास्थ्य स्थितियों में से एक है जो अन्य पुरानी बीमारियों को जन्म दे सकती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का अनुमान है कि दुनिया भर में 30-79 वर्ष की आयु के 1.28 बिलियन वयस्क ऐसे हैं, जो हाई ब्लड प्रेशर के शिकार हैं। हाई बीपी को साइलेंट किलर क्यों माना जाता है, इसका कारण यह है कि यह बिना किसी खास लक्षण के पैदा होता है। नुकसान हो जाने के बाद ही लोगों को स्थिति की गंभीरता का एहसास होता है।

इसे समय पर पहचानना मुश्किल है, इसलिए समय-समय पर टेस्ट और रोज़ाना ब्लड प्रेशर चेक करवाना ज़रूरी है। इसके अलावा पोटैशियम, फाइबर और प्रोटीन से भरपूर डाइट लेनी चाहिए। कम नमक और हेल्दी वज़न बनाए रखना भी ज़रूरी है।

कोरोनरी आर्ट्री डिज़ीज़

दिल से जुड़ी ज़्यादातक बीमारियां जानलेवा होती हैं। कोरोनरी आर्ट्री बीमारी भी उनमें से एक है। यह एक ऐसी स्थिति है, जिसमें हृदय को रक्त और ऑक्सीजन की आपूर्ति करने वाली कोरोनरी धमनियां सिकुड़ जाती हैं, जिससे सीने में दर्द (एनजाइना) या दिल का दौरा पड़ता है, जो प्रकट होने वाले पहले लक्षण हैं।

उचित जांच और हृदय-स्वस्थ जीवनशैली के बिना, कोरोनरी धमनी की बीमारी को रोकना लगभग असंभव है। यहां तक ​​​​कि जब इस स्थिति से पीड़ित व्यक्ति को त्वरित उपचार दिया जाता है, तब भी वे हृदय गति रुकने और arrhythmia के शिकार हो सकते हैं।

अगर आप हाई बीपी या फिर हाई कोलेस्ट्रोल के शिकार है, तो रोज़ाना चेकअप ज़रूर कराएं। लाइफस्टाइल में ज़रूरी बदलाव करें- जैसे स्वस्थ खाना, ज़्यादा एक्सरसाइज़ करना, स्मोकिंग-ड्रिंकिंग न करना और ऐसी ही कई अनहेल्दी एक्टीविटीज़ से दूर रहना।

डायबिटीज़

डायबिटीज़ या हाई ब्लड शुगर स्तर दो तरह के होते है- टाइप-1 और टाइप-2। टाइप-1 डायबिटीज़ में पैंक्रीयाज़ बहुत कम या बिल्कुल भी इंसुलिन का उत्पादन नहीं करता है, जबकि टाइप-2 मधुमेह आपके शरीर द्वारा रक्त शर्करा को संसाधित करने के तरीके को प्रभावित करता है, जिसे ग्लूकोज भी कहा जाता है। टाइप-2 डायबिटीज में मरीज़ को अक्सर शुरुआती लक्षणों को पता नहीं चलता। बीमारी के बढ़ने पर थकान, वज़न कम होना, बार-बार पेशाब आना और प्यास लगती है।

एडवांस डायबिटीज़ शरीर के अन्य अंगों जैसे हृदय, गुर्दे और आपकी दृष्टि को भी प्रभावित कर सकता है।

डायबिटीज़ की वजह अभी भी साफ नहीं है, लेकिन सही डाइट, एक्सरसाइज़, हेल्दी वज़न बनाए रखने और समय-समय पर टेस्ट कराने पर फोकस करने से कॉम्पलीकेशन्स से बचा जा सकता है।

ऑस्टियोपोरोसिस

ऑस्टियोपोरोसिस एक हड्डी से जुड़ी बीमारी है, जिसमें प्रभावित व्यक्ति अक्सर अपनी स्थिति से अनजान होता है, क्योंकि इसके शुरुआती लक्षण या संकेत नहीं होते। जब तक उन्हें फ्रैक्चर नहीं होता, तब तक इस बीमारी का पता नहीं चलता। इसलिए इस बीमारी को भी साइलेंट किलर कहा जाता है। इस बीमारी में न सिर्फ हड्डियां खोकली हो जाती है, बल्कि यह ओरल हेल्थ को भी प्रभावित करता है।

हड्डियों के किसी भी प्रकार के रोगों को रोकने के लिए कैल्शियम और विटामिन डी से भरपूर खाद्य पदार्थ खाना आवश्यक है। साथ ही चलना, टहलना, सीढ़ी चढ़ना, वेट ट्रेनिंग आदि जैसे वर्कआउट भी करना चाहिए। रेगुलर चेकअप भी कराना ज़रूरी है।

स्लीप एपनिया

स्लीप एपनिया एक गंभीर नींद विकार है जहां लोग सोते समय जोर से सांस लेते हैं। इसमें व्यक्ति सोते समय ज़ोर से खर्राटे लेता है, दिन के दौरान अत्यधिक थकावट और भी कई लक्षण महसूस करता है। स्लीप एपनिया से जूझ रहे मरीज़ों की अचानक मृत्यु और सोते समय स्ट्रोक आ सकता है, इसलिए यह बीमारी भी साइलेंट किलर है। ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया का सबसे आम प्रकार है, जहां आपके वायुमार्ग में सोते वक्त बंद हो जाते हैं।

स्लीप एपनिया के हल्के मामलों में लाइफस्टाइल में बदलाव से काफी फर्क पड़ सकता है। वज़न घटाना, अच्छे से खाना, स्मोकिंग छोड़ना और नाक से जुड़ी एलर्जी का सही ट्रीटमेंट करवाना फायदेमंद साबित हो सकता है।

फैटी लीवर

फैटी लीवर एक ऐसी बीमारी है, जो धीरे-धीरे विकसित होती है और इसके कोई शुरुआती लक्षण भी नहीं होते, जो इस साइलेंट किलर बनाता है। फैटी लीवर दो तरह के होते हैं- एल्कोहॉलिक और दूसरा नॉन-एल्कोहॉलिक। जैसा कि नाम से पता चलता है- एल्कोहॉलिक फैटी लीवर बीमारी अत्यधिक शराब के सेवन से होती है और नॉन-एल्कोहॉलिक फैटी लीवर बीमारी का कारण अभी तक साफ नहीं हुआ है। एडवांस स्टेज में दोनों सिरोसिस का कारण बन सकते हैं, फाइब्रोसिस लीवर की बीमारी का अंतिम चरण होता है।

​​जहां तक फैटी लीवर का सवाल है, डाइट बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। सब्ज़ियों से भरपूर आहार चुनें और अनहेल्दी फैट्स खाने से बचें। हेल्दी वज़न बनाए रखें और रोज़ाना एक्सरसाइज़ करें। समय पर टेस्ट कराते रहें और डॉक्टर की सलाह मानें।

Disclaimer: लेख में उल्लिखित सलाह और सुझाव सिर्फ सामान्य सूचना के उद्देश्य के लिए हैं और इन्हें पेशेवर चिकित्सा सलाह के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए। कोई भी सवाल या परेशानी हो तो हमेशा अपने डॉक्टर से सलाह लें।

Edited By: Ruhee Parvez