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डायबिटीज जांच के लिए सिर्फ HbA1c टेस्ट काफी नहीं, एनीमिया और जेनेटिक्स के कारण बदल सकते हैं नतीजे

Published: Mon, 16 Feb 2026 10:26 AM (IST)

भारत में डायबिटीज के लिए HbA1c टेस्ट पर पूरी तरह भरोसा करना सही नहीं है, क्योंकि एनीमिया और कुछ जेनेटिक ...और पढ़ें

डायबिटीज की जांच के लिए सिर्फ एक टेस्ट काफी नहीं (Picture Courtesy: Freepik)

डायबिटीज की जांच के लिए सिर्फ एक टेस्ट काफी नहीं (Picture Courtesy: Freepik)

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संक्षेप में पढ़ें

एएनआइ, नई दिल्ली। अगर आप डायबिटीज के लिए एचबीए1सी टेस्ट पर आंख मूंदकर भरोसा करते हैं, तो सावधान हो जाएं, क्योंकि भारत जैसे देश में ये परीक्षण हर बार सही नतीजा देगा, ये तय नहीं है।

द लैंसेट रीजनल हेल्थ साउथईस्ट एशिया जर्नल में प्रकाशित अध्ययन में कहा गया है कि भारत जैसे देश में, जहां खून की कमी (एनीमिया) और कुछ अनुवांशिक रक्त बीमारियां ज्यादा पाई जाती हैं, वे इस टेस्ट की रिपोर्ट में उतार-चढ़ाव कर सकती हैं।

इलाज में चार साल देरी

इसके चलते कभी-कभी डायबिटीज का पता लगाने में चार साल तक की देरी हो सकती है। इसका खामियाजा खासकर महिलाओं और ग्रामीण आबादी को भुगतना पड़ सकता है।

  • आयरन की कमी व जेनेटिक ब्लड डिसआर्डर से आंकड़े प्रभावित होते हैं
  • ग्रामीण व जनजातीय क्षेत्रों में गड़बड़ी की आशंका शहरी अस्पतालों से अधिक बताई गई
  • ओरल ग्लूकोज टालरेंस टेस्ट, घर पर शुगर चेक करना और दूसरे ब्लड टेस्ट भी अपनाने की सलाह
Diabetes Test (1)
(AI Generated Image)

एनीमिया और जेनेटिक्स से नतीजे प्रभावित

गौरतलब है कि एचबीए1सी टेस्ट से पता चलता है कि पिछले 2-3 महीनों में व्यक्ति का औसत ब्लड शुगर कितना रहा। आमतौर पर 5.7 प्रतिशत से कम सामान्य, 5.7 से 6.4 प्री-डायबिटीज और 6.5 प्रतिशत या उससे ज्यादा डायबिटीज माना जाता है। लेकिन जिन लोगों को एनीमिया या खून से जुड़ी जन्मजात बीमारियां हैं, उनमें यह टेस्ट असली शुगर लेवल से अलग नतीजा दे सकता है।

प्रोफेसर अनूप मिश्रा और उनके सहयोगियों के नेतृत्व में किए गए इस शोध में दक्षिण एशिया में टाइप 2 डायबिटीज के निदान या निगरानी के लिए एचबीएसी पर एकमात्र निर्भरता पर सवाल उठाया गया है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि अगर डीक्टर केवल इसी एक टेस्ट पर भरोसा करें तो कई मरीजों में डायबिटीज की पहचान देर से हो सकती है या गलत भी हो सकती है। लाल रक्त कणिकाओं की उम्र और संख्या में बदलाव भी रिपोर्ट को प्रभावित करते हैं।

विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि भारत के कई इलाकों में आयरन की कमी बहुत आम है, जिससे एचबीएसी का स्तर असल से ज्यादा दिख सकता है। साथ ही कुछ एंजाइम की कमी वाले लोगों में डायबिटीज की पहचान कई साल टल सकती है। अलग-अलग लैब में टेस्ट की गुणवत्ता भी एक जैसी नहीं होती, जिससे भ्रम बढ़ सकता है।

एक टेस्ट पर निर्भर न रहें 

शोध में सलाह दी गई है कि डायबिटीज की जांच के लिए सिर्फ एक टेस्ट पर निर्भर न रहें । जरूरत के हिसाब से ओरल ग्लूकोज टालरेंस टेस्ट, घर पर शुगर चेक करना और दूसरे ब्लड टेस्ट भी साथ में किए जाएं। बड़े अस्पतालों में लगातार शुगर मानिटर करने वाली मशीन जैसे विकल्प भी उपयोगी हो सकते हैं। 

निष्कर्ष यह है कि जहां एनीमिया और खून से जुड़ी समस्याएं ज्यादा हैं, वहां डायबिटीज की सही पहचान के लिए कई तरह की जांचों को मिलाकर देखना ज्यादा सुरक्षित और भरोसेमंद तरीका है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का यह सुझाव है कि डायबिटीज की जांच के लिए एक समग्र दृष्टिकोण अपनाना चाहिए, जिससे मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य परिणाम मिल सकें।