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क्या आपका बच्चा भी उम्र से पहले बड़ा दिखने लगा है? हल्के में न लें, हो सकता है 'अर्ली प्यूबर्टी' का शिकार

Published: Tue, 18 Aug 2026 04:00 PM (GMT+05:30)

शरीर और मस्तिष्क का विकास उम्र के साथ होता है, लेकिन समय पूर्व ही किसी बच्चे में वयस्क जैसे बदलाव दिखने लगे, तो इसके गंभीर दुष्परिणाम हो सकते हैं।

कम उम्र में ही बड़े दिखने लगे हैं बच्चे? (AI Generated Image)

कम उम्र में ही बड़े दिखने लगे हैं बच्चे? (AI Generated Image)

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समय कम है?

जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

संक्षेप में पढ़ें

लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। किसी बच्चे की छोटी उम्र में भारी शरीर, आवाज में भारीपन, औसत से अधिक ऊंचाई क्या आपको असहज करता है? यह सामान्य और नजरअंदाज करने वाली बात नहीं है। कम उम्र में वयस्कों की तरह दिखना न केवल देखने वाले को, बल्कि स्वयं उन बच्चों को भी परेशान कर देता है। 

उम्र से बड़े दिखने पर बच्चे मानसिक दबाव में रहने लगते हैं। उन्हें मेलजोल में भी कठिनाई आती है। चिड़चिड़ापन और एंग्जाइटी जैसे समस्याएं हो सकती हैं। बता दें कि बच्चे अपने शरीर और मन के साथ तालमेल बिठा सकें इसके लिए जरूरी है कि उनका शारीरिक और मानसिक विकास उम्र के साथ यानी प्राकृतिक ढंग से हो।

छोटी उम्र में ही वयस्कों जैसे लक्षण और उनके व्यवहार बच्चों के जीवन की चुनौतियों को बढ़ा सकता है। यह उन्हें कई सारी बीमारियों के गिरफ्त में भी धकेल सकता है। उचित समय पर ध्यान नहीं देने पर मोटापा, इंसुलिन प्रतिरोध, लाइफस्टाइल से होने वाली अनेक लाइलाज बीमारियों का खतरा मंडराने लगता है। खासकर लड़कियों की बात करें तो भविष्य में स्तन या ओवेरियन कैंसर का खतरा कई गुणा तक बढ़ सकता है।

हार्मोन असंतुलन है बड़ा कारण

बीते दशकों में बच्चों की सामान्य दिनचर्या तेजी से बदली है, जैसे घर के खाने से दूरी, बाहर खाने का चलन, रोजमर्रा के भोजन में जंक फूड का बढ़ता हिस्सा, स्क्रीन टाइम में बढ़ोत्तरी आदि नई मुसीबतें पैदा कर रहा है। खराब खानपान और बढ़े हुए स्क्रीन टाइम के कारण उनकी निष्क्रियता बढ़ रही है। 

बच्चे खेलकूद में भाग लेने से बचने लगे हैं, जिससे वे तेजी से मोटापे का शिकार हो रहे हैं। मोटापा हार्मोन असंतुलन पैदा करता है जो अर्ली प्यूबर्टी का एक बड़ा कारण है। बता दें कि हार्मोन केवल लंबाई बढ़ने तक सीमित नहीं होता। शरीर में अलग-अलग तरह के हार्मोन होते हैं, जो शारीरिक विकास से लेकर मस्तिष्क के सुचारु संचालन, या कहें ये हर कार्यप्रणाली को प्रभावित करते हैं।

ब्यूर्टी प्रोडक्टस और हेल्थ ड्रिंक से रहें सावधान

मोटापा हार्मोन की स्वाभाविक प्रक्रिया को बाधित कर देता है। लड़कियों में अर्ली प्यूबर्टी आने का सबसे बड़ा कारण मोटापे को माना जाता है। लंबाई बढ़ाने वाले हेल्थ ड्रिंक में भी ग्रोथ हार्मोन मिले होते हैं जो कि बच्चों में अर्ली प्यूबर्टी लाने का कारण है। प्रोटीन पाउडर का भी बहुतायत प्रयोग घरों में होने लगा है जो कि सही नहीं। इन दिनों बच्चों में खासकर लड़कियों में वयस्क महिलाओं की तरह ब्यूटी प्रोडक्ट के प्रयोग बढ़े हैं। इन उत्पादों में हार्मोन जैसे एस्ट्रोजन का प्रयोग होता है, जो कि अर्ली प्यूबर्टी का खतरा बढ़ाते हैं। इसी तरह, यदि वे हर्बल टी का प्रयोग करते हैं तो इसमें भी एस्ट्रोजन हो सकता है। इसे फाइटो एस्ट्रोजन कहा जाता है। इसी तरह शैंपू में भी ऐसे उत्पाद मिलाए जाते हैं जो शरीर के प्राकृतिक हार्मोन प्रक्रिया को बिगाड़ सकते हैं। हालांकि कुछ बीमारियों, जैसे कि पिट्यूटरी डिजीज बच्चों के हार्मोन की अनियमितता बढ़ा देती है। लड़कियों में स्वत: ही ओवरी हार्मोन बनाना शुरू कर देती है और अर्ली प्यूबर्टी के लक्षण देखे जा सकते हैं, पर इन दिनों जितनी तेज गति से बच्चो में अर्ली प्यूबर्टी के लक्षण देखे जा सकते हैं उन्हें देखकर कहना होगा कि इसका बड़ा कारण उनकी जीवनशैली है।

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डॉ. राजेश खड़गावत, एंडोक्राइनोलाजिस्ट, एम्स, नई दिल्ली

बच्चों के लिए बनाएं नया डाइट प्लान


रिफाइंड मैदा, ब्रेड, बिस्कुट, नूडल्स, पास्ता आदि आज बच्चों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। इनमें वे चीजें नहीं होतीं जो बच्चों के ग्रोथ के लिए जरूरी है। प्रोटीन भी इनमें होते हैं, पर वे स्वस्थ नहीं होते। जब हम अर्ली प्यूबर्टी की बात करते हैं तो इसका सबसे बड़ा खतरा इंसुलिन प्रतिरोध को मानना चाहिए। यह मोटापा बढ़ाता है जो बच्चों की बड़ी समस्या बन रहा है, इसलिए यह समझना है कि बच्चों की पसंद को बंद करना नहीं है बल्कि उन्हें एक स्वस्थ विकल्प देने के बारे में सोचना है। अभिभावकों का उद्देश्य होना चाहिए कि चीनी कम करना है और एडिटिव व प्रिजर्वेटिव पदार्थ, जो कि जंक फूड और डिब्बाबंद फूड में मिले होते हैं उनसे दूरी बनानी है। सोडा, कैंडी को भी धीरे-धीरे करके कम करें जो कि हार्मोन प्रक्रिया को बाधित करते हैं। बच्चों के डाइट प्लान को नया बनाएं। छोटी उम्र से ही उन्हें अधिक चीनी या नमक वाले पदार्थो से दूरी रखने के लिए प्रोत्साहित करें। यह समझना है कि पिज्जा, बर्गर खराब नहीं होते, बल्कि इनके बनाने के तरीके को बदल दें। मैदा की जगह अनाज का पिज्जा बेस बनाएं, उसमें ढेर सारी सब्जियां डालें। इसी तरह बर्गर बन भी हेल्दी बनाएं। मैदा से दूरी बनाएं, मोटे अनाज वाले बन भी बाजार में मिल जाते हैं।

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डॉ. रीतिका समादार, न्यूट्रिशनिस्ट, मैक्स अस्पताल, नई दिल्ली

इन लक्षणों के प्रति रहें सतर्क

लड़कियों में 8-13 साल के बीच और लड़कों में 9-14 साल के बीच प्यूबर्टी की शुरुआत होती है। अगर इस उम्र से पहले प्यूबर्टी के लक्षण दिखने लगें तो यही कहलाती है अर्ली प्यूबर्टी। इसके मुख्य लक्षण हैं- लड़कियों में स्तनों का विकास, मासिक धर्म की शुरुआत, तेजी से लंबाई में बढ़ोत्तरी आदि। लड़कों के आवाज में भारीपन, मांसपेशियों का विकास, दाढ़ी-मूंछ आना। ऐसे बच्चों के पसीने से दुर्गंध आने लगती है, मुंहासे आने की शुरुआत भी होने लगती है।

प्लास्टिक से दूरी क्यों है जरूरी?

बच्चों को प्लास्टिक के बोतल, लंच बाक्स या प्लास्टिक पैकेट में बंद खाना देते हैं तो आज ही इस पर रोक लगाएं। दरअसल, इनमें ऐसे रसायन हो सकते हैं जो भोजन या पानी में मिलकर शरीर के प्राकृतिक हार्मोन के कार्य में बाधा पहुंचा सकते हैं। बता दें कि प्लास्टिक से बिस्फेनाल, थैलेटस जैसे हानिकारक रसायन होते हैं।

नींद रहे अबाधित और गुणवत्तापूर्ण

हार्मोन में बदलाव और अर्ली प्यूबर्टी का बड़ा कारण नींद की कमी हो सकती है। बता दें कि नींद शरीर के हार्मोनल तंत्र को संचालित करने में प्रमुख भूमिका निभाती है। यदि नींद अच्छी न हो तो हार्मोन तंत्र बाधित हो सकता है। मोटापा और इंसुलिन रेजिस्टेंस का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में जरूरी है कि बच्चों के स्क्रीन टाइम को कम करने के तरीके अपनाएं। इनसे निकलने वाली नीली रोशनी नींद लाने वाले हार्मोन मेलाटोलिन को बाधित कर देती है।

सचेत करता है पीजीआई रोहतक का शोध

पीजीआईएमएस के पीडियाट्रिक एंडोक्रायनोलाजी विभाग में पिछले एक साल में अर्ली प्यूबर्टी के कई मामले सामने आए हैं। इनमें आठ साल से पहले मासिक धर्म के साथ थायरॉइड की समस्या भी देखने को मिली है। कम उम्र में बच्चियों में यौवनावस्था के लक्षण दिखाई दे रहे हैं। यहां तक कि अब चार साल की उम्र में ही बच्चियों को पीरियड्स और सात साल तक की उम्र की बच्चियों में थायरॉयड की समस्या देखने को मिल रही है।

पैकेज्ड मीट व डेयरी उत्पादों में मिले होते हैं हार्मोन

सामान्य तौर पर लड़कियों में यौवनावस्था आठ से 13 साल की उम्र के बीच शुरू होती है। यदि इससे पूर्व बच्ची में स्तन का विकास, शरीर पर बाल आना, अचानक लंबाई बढ़ना, त्वचा तैलीय होना, शरीर से बड़ों जैसी गंध आना, मूड स्विंग्स या पीरियड शुरू हो जाएं, तो इसे समय पूर्व यौवन या प्रीकोशियस प्यूबर्टी कहा जाता है। इन दिनों खराब डाइट, अधिक स्क्रीन प्रयोग व शारीरिक गतिविधियों के कमी के साथ पैकेज्ड मीट व डेयरी उत्पादों में हार्मोन की मौजूदगी भी हार्मोन असंतुलन का खतरा बढ़ा रहा है।

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डॉ. कुंदन मित्तल, चिकित्सा अधीक्षक, पीजीआइएमएस रोहतक

खेलकूद को दें बढ़ावा

कुलपति डॉ. एच. के. अग्रवाल, पीजीआईएमएस रोहतक, बताते हैं कि स्वस्थ भारत अभियान के तहत पीजीआई बच्चों के स्वास्थ्य को प्राथमिकता दे रहा है। अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चों को पौष्टिक आहार दें, जंक फूड और स्क्रीन टाइम कम करें और खेल-कूद को बढ़ावा दें। अर्ली प्यूबर्टी की समय पर पहचान और सही इलाज से बच्चों की सेहत को खराब होने से समय रहते बचाया जा सकता है और उनका भविष्य सुरक्षित किया जा सकता है।

थायरॉइड की वजह से भी हो सकती है बिल्डिंग

डॉ. अंजलि वर्मा, पीडियाट्रिक एंडोक्रायनोलाजी विभाग, पीजीआइएमएस बताती हैं कि हमारे पास ऐसी बच्चियों के केस आए हैं जिनकी हमने मेडिकल हिस्ट्री, शारीरिक विकास और हार्मोन टेस्ट के आधार पर जांच की। समय पर इलाज किया जाए तो असंतुलित होते हार्मोंस को नियंत्रित किया जा सकता है। कम उम्र में ब्लीडिंग को हमेशा यौवनारंभ समझना भी सही नहीं कहा सकता। दरअसल, कभी-कभी थायरॉइड जैसी हार्मोन संबंधी बीमारियों की वजह से भी ऐसा हो सकता है, इसलिए सही कारण जानने के लिए विस्तृत जांच जरूरी है।

यूरोपियन सोसाइटी फॉर पीडियाट्रिक के अनुसार, अर्ली प्यूबर्टी का कारण स्मार्ट गैजेट्स यानी मोबाइल, लैपटॉप, टैबलेट या टीवी का बढ़ता उपयोग भी है। इसे भारत के संदर्भ में देखा जा सकता है जहां अधिकांश बच्चों की पढ़ाई मोबाइल, लैपटॉप या टेबलेट से भी हो रही है।

इनपुट सहयोग : रोहतक से प्रिया पंवार