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क्या सचमुच इंसान खुली आंखों से भी देख सकता है सपने? यहां पढ़ें दिमाग का ये हैरान करने वाला खेल

Published: Sun, 10 May 2026 07:00 PM (IST)

एक स्टडी में पता चला है कि सपने सिर्फ नींद में ही नहीं, बल्कि जागते हुए भी आ सकते हैं। इसके पीछे दिमाग के काम करने का तरीका जिम्मेदार है।

जागते हुए दिमाग में कैसे आते हैं सपने? (AI Generated Image)

जागते हुए दिमाग में कैसे आते हैं सपने? (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। अब तक हम सभी यही मानते आए हैं कि सपनों की दुनिया का रास्ता गहरी नींद की गलियों से होकर ही गुजरता है। यानी हम सपने सिर्फ तभी देखते हैं, जब हम नींद में होते हैं, लेकिन हाल ही में हुई एक नई साइंटिफिक स्टडी ने इस पुरानी धारणा को पूरी तरह से चुनौती दे दी है। 

शोधकर्ताओं ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया है कि इंसान जागते हुए भी बिल्कुल सपनों जैसा अनुभव कर सकता है। सुनने में यह भले ही किसी साइंस फिक्शन जैसा हैरान करने वाला लग रहा हो, लेकिन इसके पीछे भी आपके दिमाग का ही खेल है। आइए जानें इस दिलचस्प खोज के बारे में।

नींद और जागने की धुंधली होती सीमाएं

वैज्ञानिकों के अनुसार, हमारे दिमाग के काम करने का तरीका इतना मुश्किल है कि इसकी कुछ अवस्थाएं नींद और जागने की सीमाओं में नहीं बंधी होतीं। पेरिस ब्रेन इंस्टीट्यूट से जुड़े इस अध्ययन के मुख्य लेखक, निकोलस डेकेट का कहना है कि सपनों से जुड़ी मानसिक स्थितियां केवल सोते समय ही नहीं, बल्कि जागते समय भी उतनी ही प्रभावी और असरदार हो सकती हैं। इसका मतलब है कि हमारा दिमाग उस समय भी सपनों जैसी मानसिक स्थिति में जा सकता है जब हम पूरी तरह होश में होते हैं।

92 लोगों पर की गई खास रिसर्च

इस रहस्य से पर्दा उठाने के लिए वैज्ञानिकों ने 92 ऐसे लोगों को शोध का हिस्सा बनाया, जिन्हें दिन में झपकी लेने की आदत थी। इस प्रयोग के दौरान उनके दिमाग की गतिविधियों पर पैनी नजर रखने के लिए ईईजी कैप का इस्तेमाल किया गया। यह कैप दिमाग में होने वाली हर छोटी-बड़ी हलचल को रिकॉर्ड करती है।

दिमाग की 4 अनोखी अवस्थाएं

रिसर्च के दौरान वैज्ञानिकों ने दिमाग की गतिविधि के आधार पर 4 अलग-अलग मानसिक अवस्थाओं की पहचान की है। ये अवस्थाएं यह समझने में मदद करती हैं कि कैसे हमारा दिमाग जागते हुए और नींद के बीच की धुंधली स्थिति में सपनों का अनुभव कर लेता है।

यह अध्ययन इस बात की ओर इशारा करता है कि सपना देखना केवल एक शारीरिक प्रक्रिया नहीं है जो बिस्तर पर लेटने के बाद शुरू होती है, बल्कि यह दिमाग की एक ऐसी मानसिक स्थिति है जो किसी भी समय एक्टिव हो सकती है।