क्या सच में कुत्ते सूंघकर लगा सकते हैं कैंसर का पता? भारत में हो रही है इस खास तकनीक पर रिसर्च
भारत में एक हेल्थ-टेक स्टार्टअप कुत्तों और एआई की मदद से कैंसर का पता लगाने की तकनीक पर शोध कर रहा है।

कुत्तों की सूंघने की क्षमता से कैंसर का पता (Picture Courtesy: Freepik)

समय कम है?
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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। कुत्तों की सूंघने की क्षमता बहुत तेज होती है। इसलिए आपने देखा होगा कि किसी चोरी वगैरह के सुराग ढूंढ़ने में उनकी इस क्षमता का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन क्या ये कैंसर जैसी बीमारी का भी सूंघकर पता लगा सकते हैं? हॉलीवुड की एक फिल्म ‘द आर्ट ऑफ रेसिंग इन द रेन’ में भी ऐसा दिखाया है कि एक कुत्ता अपनी मालकिन के कैंसर को सूंघकर पहचान लेता है।
कुत्ते सचमुच ऐसा कर सकते हैं या नहीं, इसका पता लगाने के लिए भारत का एक हेल्थ-टेक स्टार्टअप ट्रेंड कुत्तों और एआई की मदद ले रहा है। हालांकि, अभी ये तकनीक किसी मेडिकल डायग्नोसिस के लिए तैयार नहीं है, लेकिन कैंसर की पहचान में इसे एक मददगार टूल माना जा रहा है। आइए जानें इस बारे में।
शरीर की गंध और कुत्तों की सूंघने की क्षमता
ये बात हम बहुत पहले से जानते हैं कि कोई भी बीमारी शरीर के केमिकल सिग्नेचर को बदल देती है। हमारे शरीर के अंदर होने वाली प्रक्रियाएं वोलेटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड्स पैदा करती हैं, जो सांस, पसीने, पेशाब और दूसरे बॉडी फ्लूएड्स के जरिए बाहर निकलते हैं। कैंसर इन प्रक्रियाओं में बदलाव करता है, जिससे शरीर से निकलने वाले इन कंपाउंड्स में भी बदलाव आता है।
कुत्ते अपनी सूंघने की क्षमता के लिए जाने ही जाते हैं, तो अब उनकी इस क्षमता को मेडिकल क्षेत्र में इस्तेमाल करने के लिए एक खास तकनीक तैयार की गई है।
कैसे काम करती है ये तकनीक?
ये प्रक्रिया शुरुआत में काफी सिंपल है। एक व्यक्ति को लगभग 10 मिनट तक कॉटन मास्क पहनकर सामान्य बातचीत करने और गहरी सांस लेने के लिए कहा जाता है। मास्क व्यक्ति की सांस में मौजूद कंपाउंड्स को पकड़ लेता है, जिसे लैब में भेजा जाता है, जहां ट्रेंड डॉग्स इस मास्क को सूंघते हैं।
इस दौरान कुत्तों को एक खास सूट पहनाया जाता है, जो सूंघने के दौरान उनकी ब्रेन एक्टिविटीज, हार्ट रेट, सांस की गति और बॉडी लैंग्वेज को रिकॉर्ड करता है। ये सारा डेटा एआई मॉडल में डाला जाता है, जो एक वीओसी रिस्क स्कोर जेनरेट करता है।
कैंसर डिटेक्शन में सफलता के आंकड़े
इस साल अप्रैल में जर्नल ऑफ क्लिनिकल ऑन्कोलॉजी में पब्लिश एक स्टडी के मुताबिक, इस सिस्टम ने 10 में से 9 कैंसर मामलों की सही पहचान की। साथ ही, जिन लोगों को कैंसर नहीं था, उनमें भी 10 में से 9 मामलों की सही पहचान की।
कर्नाटक के 6 अस्पतालों में तीन हजार से ज्यादा लोगों पर ये स्टडी हुई, जिसमें लास्ट टेस्टिंग ग्रुप के 283 मरीजों में बायोप्सी के जरिए पहले ही कैंसर का पता लगाया जा चुका था। इस स्टडी में सबसे खास बात ये रही कि कैंसर के सभी स्टेजेस में इसका प्रदर्शन एक जैसा ही रहा।
