इन्फ्लुएंसर्स की देखा-देखी करवा रहे हैं मेडिकल टेस्ट? बेवजह का मरीज न बना दे सेहत की जरूरत से ज्यादा फिक्र
सोशल मीडिया पर इन्फ्लुएंसर्स की देखा-देखी बेवजह की मेडिकल जांचें लोगों को मानसिक तनाव का शिकार बना रही हैं।

सोशल मीडिया के दबाव में कहीं आप भी तो नहीं बन रहे 'ओवर-स्क्रीनिंग' के शिकार? (Image Source: AI-Generated)

समय कम है?
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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। क्या आप भी सोशल मीडिया पर इन्फ्लुएंसर्स और सेलिब्रिटीज को देखकर अपनी सेहत को लेकर जरूरत से ज्यादा फिक्रमंद हो गए हैं? अगर हां, तो थोड़ा सावधान हो जाइए।
आजकल लोग मशहूर हस्तियों की देखा-देखी बेवजह की मेडिकल जांचें करवा रहे हैं। असल में, सेहत पर यह जरूरत से ज्यादा ध्यान फायदा पहुंचाने की बजाय, लोगों को भारी मानसिक तनाव का शिकार बना रहा है।

(Image Source: AI-Generated)
सोशल मीडिया का दबाव और 'ओवर-स्क्रीनिंग' का खौफ
लॉस एंजेलिस का ही एक हालिया मामला लीजिए। एक व्यक्ति ने हेल्थ-अवेयरनेस के नाम पर और सोशल मीडिया के प्रभाव में आकर एक आलीशान लैब में लाखों रुपये खर्च करके अपना 'फुल-बॉडी एमआरआई' करवा लिया। उसे लगा कि वह अपनी सेहत के लिए एक बहुत अच्छा कदम उठा रहा है, लेकिन जब रिपोर्ट में फेफड़ों के पास एक छोटा-सा 'नोड्यूल' और किडनी में मामूली 'सिस्ट' दिखा, तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।
वह व्यक्ति खुद को गंभीर रूप से बीमार समझने लगा। अगले तीन महीने डॉक्टरों के क्लिनिक के चक्कर काटने, और भी महंगे टेस्ट करवाने और भारी तनाव के साये में गुजरे। अंत में सच्चाई क्या निकली? वे गांठें बिल्कुल बेअसर और मामूली थीं, जो अक्सर बढ़ती उम्र के साथ शरीर में अपने आप बन जाती हैं। मेडिकल भाषा में इसी बेवजह की परेशानी को 'ओवर-स्क्रीनिंग' कहा जाता है- यानी बिना जरूरत के जांच करवाना और शरीर की ऐसी बेअसर विकृतियों को खोज निकालना, जिनका कोई नुकसान नहीं है।
जांच का असली मकसद बनाम मार्केटिंग का खेल
मेडिकल स्क्रीनिंग का असल मकसद उन बीमारियों को शुरुआती स्टेज में पकड़ना होता है, जिनके लक्षण बाहर से नजर नहीं आते। उदाहरण के तौर पर, ब्लड शुगर या हाई बीपी की जांच। ये ऐसी बीमारियां हैं जो खामोशी से हमारे दिल और आंखों को नुकसान पहुंचाती हैं। अगर समय रहते इनका पता चल जाए, तो बहुत सस्ती दवाओं और लाइफस्टाइल में मामूली बदलाव करके इन्हें रोका जा सकता है।
लेकिन आज के दौर की हकीकत कुछ और ही है। बड़ी-बड़ी टेस्टिंग कंपनियां और 'टेक-इन्फ्लुएंसर्स' अपने मुनाफे के लिए इन महंगे और गैर-जरूरी टेस्ट्स को बढ़ावा देने में पूरी ताकत झोंक रहे हैं।
वियरेबल गैजेट्स और हेल्थ डेटा की लत
दिक्कत सिर्फ महंगे टेस्ट्स तक सीमित नहीं है। स्मार्टवॉच और 'वियरेबल डिवाइस' का बढ़ता जुनून भी एक नई मुसीबत बन गया है। आज ये उपकरण हमारी दिनचर्या का अहम हिस्सा बन चुके हैं। हालांकि, डॉक्टर्स का स्पष्ट कहना है कि इन गैजेट्स द्वारा दिखाए जाने वाले पैमानों में से बहुत कम चीजें ही मेडिकल नजरिए से काम की होती हैं। समस्या यह है कि लोग बार-बार अपना हेल्थ डेटा चेक करने के आदी हो गए हैं, जिससे उनके जीवन में बेवजह की चिंता और तनाव बढ़ रहा है।
परफेक्ट नींद की चाहत ने उड़ाई रातों की नींद
आजकल नींद की क्वालिटी पर नजर रखने वाले हाई-टेक टूल्स का चलन जोरों पर है, लेकिन कई बार ये उपकरण इतनी ज्यादा चिंता पैदा कर देते हैं कि इंसान की बची-खुची नींद भी खराब हो जाती है।
एक्सपर्ट्स ने इस नई समस्या को ऑर्थोसोमनिया का नाम दिया है। यह स्लीप ट्रैकर के डेटा के आधार पर 'परफेक्ट नींद' हासिल करने की एक ऐसी जुनूनी कोशिश है, जो इंसान का मानसिक सुकून और वास्तविक नींद दोनों बिगाड़ कर रख देती है।
