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मिट्टी की हांडी और धीमी आंच का जादू: चंबल की रसोई से लौटे 'चिकन चुकरिया' जैसे 24 भूले-बिसरे स्वाद

Published: Sun, 08 Mar 2026 07:30 AM (IST)Updated: Sun, 08 Mar 2026 07:46 AM (IST)

जब हम चंबल का नाम सुनते हैं, तो दिमाग में बीहड़, बहादुरी और इतिहास की तस्वीरें कौंधती हैं। लेकिन अब ...और पढ़ें

चंबल की मिट्टी से निकलकर आए वो 24 पकवान, जो कभी राजपरिवारों की पसंद थे (Image Source: AI-Generated)

चंबल की मिट्टी से निकलकर आए वो 24 पकवान, जो कभी राजपरिवारों की पसंद थे (Image Source: AI-Generated) 

HighLights

  1. IHM ग्वालियर ने 24 लुप्त चंबल व्यंजनों को पुनर्जीवित किया

  2. अटेर किले के शाही रसोइयों के वंशजों से मिले सुराग

  3. धीमी आंच, मिट्टी के बर्तनों में पकने वाले व्यंजन

चेतना राठौर, नई दिल्ली। आधुनिकता की दौड़ और कुकर-माइक्रोवेव की सीटी में चंबल के जो पारंपरिक स्वाद कहीं दब गए थे, उन्हें ग्वालियर के इंस्टीट्यूट आफ होटल मैनेजमेंट (आइएचएम) के प्रोफेसरों ने फिर से जीवित कर दिया है।इस खोज की सबसे दिलचस्प बात यह है कि इन व्यंजनों का सुराग अटेर के ऐतिहासिक किले के उन परिवारों से मिला, जिनके पूर्वज कभी राजपरिवार के शाही रसोइए हुआ करते थे। प्रोफेसरों की टीम ने भिंड, मुरैना और श्योपुर के सुदूर गांवों की खाक छानी ताकि उन 24 विलुप्त व्यंजनों को खोजा जा सके, जिन्हें नई पीढ़ी पूरी तरह भूल चुकी है।

Slow Cooked Forgotten Gem

(Image Source: AI-Generated) 

तकनीक ने छीनी थी खुशबू

शोधकर्ताओं के अनुसार, रसोई में आए तकनीकी बदलावों-जैसे माइक्रोवेव और प्रेशर कुकर-ने धीमी आंच पर पकने वाले इन व्यंजनों को हमसे दूर कर दिया। पीतल और मिट्टी के बर्तनों की जगह एल्युमीनियम ने ले ली, जिससे खाने का असली पोषण और सोंधापन गायब हो गया। आइएचएम, ग्वालियर द्वारा तैयार यह ड्राफ्ट अब परिषद के पास है। उम्मीद है कि जल्द ही चंबल के ये 'देसी सुपरफूड्स' मध्य प्रदेश पर्यटन विभाग के होटलों और बड़े फूड फेस्टिवल्स का हिस्सा बनेंगे। यह न केवल लुप्त होती संस्कृति का पुनरुद्धार है, बल्कि चंबल के पर्यटन को स्वाद का नया आयाम देने की कोशिश भी है।

गांवों से निकले भूले-बिसरे वाले स्वाद

रिसर्च टीम जब भिंड के धूल भरे रास्तों से होकर गांवों तक पहुंची, तो विरासत की परतों से कुछ ऐसे स्वाद निकले जो आज के 'इंस्टेंट फूड' के दौर में चमत्कार जैसे लगते हैं। उदाहरणस्वरूप मेहगांव में कभी चचेड़ा की सब्जी हर घर की पसंद थी। औषधीय गुणों से भरपूर यह सब्जी आज थालियों से गायब है। शोधकर्ताओं ने पाया कि जिसे लोग आज भूल चुके हैं, वह कभी चंबल के लोगों की लंबी उम्र और मजबूती का राज हुआ करता था। इसी तरह मुस्तरा गांव के पुराने राजपूत परिवारों ने एक अनोखे काम्बिनेशन का खुलासा किया। जहां सेव के लड्डू पारंपरिक मिठास थे, वहीं झौरी नाम का व्यंजन असली आकर्षण रहा। इसे मिट्टी की हांडी में बेहद धीमी आंच पर पकाया जाता था, जिससे मिट्टी की सोंधी खुशबू सीधे खाने में उतर आती थी।

हांडी का जादू- दाल और चिकन चुकरिया

दाल तो हर घर में बनती है, लेकिन भिंड की 'दाल चुकरिया' खास है। अरहर की दाल को मिट्टी की मटकी में पानी के साथ उबाला जाता था। टीम को पता चला कि मिट्टी के बर्तन पोषक तत्वों को नष्ट नहीं होने देते थे। वहीं, मांसाहारी शौकीनों के लिए 'चिकन चुकरिया' किसी उपलब्धि से कम नहीं है। इसकी खासियत इसके मसाले नहीं, बल्कि बनाने का 'यूनिक मेथड' है। चूल्हे की दहकती आंच पर मटकी में घी और प्याज को मसालों के साथ फ्राई करने की वह तकनीक अब केवल कुछ हाथों में बची है।

रसोई की जान, पोषण का खजाना

जिन 24 व्यंजनों का ड्राफ्ट तैयार कर परिषद को भेजा गया है, उनमें प्रकृति और स्वास्थ्य का अद्भुत संगम है, उदाहरणस्वरूप:

  • मसालेदार चचेड़ा और चेंच की भाजी: स्थानीय वनस्पतियों से तैयार ये व्यंजन कभी चंबल की रसोई की जान हुआ करते थे।
  • नोनिया का झोल और खाटा: इमली, मट्ठे और देसी मसालों के मेल से बने ये व्यंजन सादगी में बेमिसाल हैं।
  • समा की खीर और चौउलाइ: व्रत-त्योहारों पर बनने वाले ये पकवान पोषण का खजाना हैं।

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